जिसने प्रभु के स्वभाव को जान लिया वह प्रभुमयी हो जाएगा – दीदी मां मंदाकिनी

रायपुर। हम मंदिर जाते हैं इसलिए कि बस प्रभु के दर्शन करने हैं,लेकिन उन्हे पाने के लिए जो पुरुषार्थ चाहिए उसके लिए हमें अपने जीवन में भगवान श्रीराम को बसाना होगा। कथा श्रवण करने के लिए जहां भी जाते हैं तो एक जिज्ञासा रहती है कि प्रभु को हम कैसे पा लें,कैसे अपना बना लें? आत्मचिंतन के जिस मार्ग पर हम चल रहे हैं देखें वहां हमारी भक्तिसाधना कहां तक पहुंची है। ये जो सूक्ष्म नेत्र हैं जिसके द्वारा हम संसार को देख रहे हैं। ये नेत्र ईश्वर को देखने के लिए श्रेष्ठ हैं कि नहीं या उनके दर्शन के लिए विशेष ब्रम्ह मार्ग की आवश्यकता होगी। यदि हमने अपने सूक्ष्म नेत्रों से प्रभु को देख लिया तो समझो प्रभु से परिचय हो गया। अब प्रभु के स्वभाव को जानने का अवसर मिल गया तो हम निश्चित रुप से प्रभुमयी हो जायेंगे। भक्ति रस में ऐसे डूब जायेंगे कि कोई संदेह नहीं। ये भगवान शंकर का दावा है कि क्योकि बचपन में भगवान श्रीराम का उन्होने दर्शन किए थे तब से उनके भक्त हो गए और बाद में हनुमान का अवतार लेकर पूरे समय श्रीराम की सेवा की।
सिंधु भवन शंकरनगर में आयोजित श्रीराम कथा में मानस मर्मज्ञ दीदी मां मंदाकिनी ने बताया कि भौतिक जीवन में हम सब के पास कुछ न कुछ काम हैं,लेकिन कुछ समय तो प्रभु के लिए निकालें। यदि अभी तक मानस को अपने जीवन में स्थान नहीं दिया है तो देकर देखिए। रामचरित मानस की एक चौपाई ही सही रोजाना सुबह पढ़ लें देखिए अपने जीवन में परिवर्तन स्वंय महूसस करेंगे। इसीलिए रामकिंकर जी महाराज ने मानस के एक ग्रंथ से 100 ग्रंथों का निर्माण किया है कि ताकि जनमानस आसानी और सरल तरीके से उसे समझ सकें।

माता सीता से सीखें पति का आदर कैसे करना चाहिए
हर व्यक्ति चाहता है कि जो हम चाहते है वह ईश्वर करें और संकट उस समय शुरु होता है जब व्यक्ति जो चाहता है और ईश्वर वह नहीं करते हैं। प्रभु से जो सच्चा प्रेम करते है वह उनकी जरुर सुनते है। माता सीता से अब की नारियों को सिखना चाहिए कि पति का आदर कैसे करें ? जब 14 वर्ष वनवास के दौरान एक गांव में पहुंचे थे तब वहां की किशोरियों ने माता सीता को घेर लिया और उन पर सवालों की झड़ी लगा दी। आप लोग अपना परिचय दें,माता सीता ने सबसे पहले लक्ष्मण का परिचय कराया कि ये मेरे देवर है और जो सामने मुझे देख रहे है वह उनके बड़े भाई है। जब राम जी का परिचय देने लगीं तो माता सीता ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और सिर को पूरा ढककर उनका परिचय दिया। इससे यह जानें कि हिन्दु धर्म में पत्नियां अपने पति का नाम नहीं लेती है और उनके सामने सिर पर ढककर रहती है,अब की बात वे नहीं कह सकतीं। किशोरियां भगवान राम का परिचय ही प्राप्त नहीं करना चाहती है बल्कि वे यह भी देखना चाहती थीं कि उनसे कैसे जुड़ सकती है-उनके दर्शन कर सकती हैं। प्रसंगवश दीदी मां ने यह बताया कि श्रीराम तब तक सीताजी से बंधे थे जब तक उनके सिर पर घूंघट नहीं था जैसे ही हुआ वे भक्तों के हो गए। भक्तों की भक्ति में इतना प्रेम होता है कि वे भगवान को भी बांध कर रख सकते हैं।
एक वाक्या सुनाते हुए उन्होने कहा कि अगर आप किसी व्यक्ति से आकृष्ट हो गए तो उन्हें जानने के लिए उनका परिचय प्राप्त करना जरुरी होता है और उसके लिए आप हर प्रयास करते हैं। यही बात अगर हमारी आज की युवा पीढ़ी के संदर्भ में कही जाए तो आजकल टच स्क्रीन मोबाइल फोन का जमाना आ गया है। कुछ ही देर लगता है उस व्यक्ति से परिचय करने में क्योंकि फोन नंबर का आदान प्रदान होते ही सारा परिचय सचित्र जीवनी हो जाता है कुछ कहने बोलने की बात ही नहीं।







