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ट्विशा शर्मा की मौत एक पहेली

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  • संजय दुबे
    मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक नवविवाहित युवती की मृत्यु ने एक बार फिर विवाह नामक प्रथा, परिवार रूपी संस्था और ऐसी घटने वाली घटनाओं के बाद होने वाले मीडिया ट्रायल को चर्चित बना दिया है।
    महज पांच माह पहले हुए विवाह के बाद युवती ने तथाकथित पारिवारिक विवाद के चलते आत्महत्या कर ली।
    एक परिवार की बेटी के विवाह के इतने कम समय के बाद ऐसा कदम उठाना निश्चित रूप से प्रश्न चिन्ह तो खड़ा करता है कि ससुराल में कौन सी परिस्थितियां ऐसी बनी जिसके चलते युवती ने अपने आपको खत्म कर लिया या उसे खत्म कर दिया(ये पुलिस के लिए जांच का विषय है)
    पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार अन्याय बर्दाश्त के बाहर की बात है। खास कर मीडिया के द्वारा । जब भी ऐसी घटना घटती है जिसमें शक की गुंजाइश पांच फीसदी भी हो, प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक सहित सोशल मीडिया में सनसनीखेज खबर बन जाती है। भोपाल में घटी घटना भी सुर्खियों में है। हर कोई विशेषज्ञ बन अपनी प्रतिक्रिया परोस रहा है।
    थोड़ा सा पीछे चलते है। विवाह कराने वाली एजेंसी के माध्यम से दो भिन्न भिन्न जाति और परंपरा वाले परिवार के बीच बात बनती है। विवाह संपन्न होता है । लड़के का परिवार कानूनी पेशे से जुड़ा हुआ है।लड़की का परिवार सेना से संबंध रखता है।लड़का,वकील है ।लड़की मिस पुणे रही हुई है
    विवाह, एक जुआं है, ये सार्वभौमिक सत्य है।पुरुष और स्त्री का लैंगिक तौर पर संबंध को मान्यता देने की विवाह, मान्य परंपरा है। परिवार निर्माण सहित नये रिश्तों की बुनियाद माना जात है -विवाह
    वो जमाना गया जब विवाह के बाद लड़की को समझाइश दी जाती थी कि दो कंधों में डोली मां बाप के घर से उठ रही है, चार कंधों पर पति के घर से जाना है। अब मां बाप स्वयं ही कहते है कि मायके में शोषण बर्दाश्त नहीं करना। हमारा घर खुला है।
    वर्तमान दौर में माइक्रो परिवार जन्म के चुका है। मां बाप और एक दो संतान। कुनबा खत्म हो चुका है, समाज का सरोकार रहा नहीं। मेल जोल है तो सामाजिक कार्यक्रमों में।संपर्क है तो सोशल मीडिया के जरिए।भीड़ में है लेकिन अकेले है। मां बाप का सामाजिक नियंत्रण संतानों पर कम है खुले दिल से कहे तो है ही नहीं। जेन जी, अल्फा जी का दौर है। जो तय करे वह व्यवस्था है।
    पुरुष तो चरित्र से ही लांछित है।उसके बारे में जो भी सुनाया जाए, स्वीकार्य है।न तो विरोध होता है न ही असहमति होती है।स्त्रियों की आर्थिक स्वालबन ने उन्हें नई जीवन शैली दी है। वे तथाकथित गुलाम नहीं होना चाहती।बराबरी, कई जगहों पर बराबरी से भी अधिक अधिकार चाहती है। असहमति और विरोध के उनके अपने विचार है।
    विवाह के बाद आज के दौर में लड़कियां जितनी आजादी ले रही है। वह नया दौर है। विवाहित लड़कियों को जितनी आजादी दी जा रही है वह भी नया दौर है । लड़का सहित उसका परिवार, होते हुए परिवर्तन को कछुआ गति से देख रहा है, बर्दाश्त कर पा रहा है, या मन मनोस कर झेल रहा है।
    एक बात स्पष्ट है कि विवाह के पूर्व वधु के लड़कों के साथ मित्रता को विवाह के बाद वर बर्दाश्त नहीं कर पाता है।ये पुरुष वर्ग की कमजोरी है। चांद पर कदम रख लेने से विज्ञान आधुनिक हो सकता है आदमी नहीं। यही बात विवाह के बाद पनपते अलगाव का कारण बनता है।वधु भी नहीं चाहती है कि वर, विवाह के बाद महिला मित्रो से बात करे, संबंध बना कर रखे।ये वजह शक का आधार बनती है।
    विवाह के बाद संतान भी एक मुद्दा है। परिवार के बड़े सदस्य रिश्तों में दादा दादी बनना चाहते है। मरने से पहले नाती नातिन का मुंह देखना चाहते है।वधु के लिए विवाह के पहले साल में मातृत्व का बोझ उठाना निजी जिंदगी में अवरोध बनते दिखता है। नव विवाहित दंपत्ति संतान बिना चार पांच साल जीवन का आनंद लेना चाहता है।
    ये सब कारण टूटन के बनते है।
    आजकल, विवाह के बाद अलगाव, तलाक सामान्य सी बाते हो गई है।इन्हें वैचारिक मतभेद,विवादों का सुखद अंत माना जाता है। ससुराल से बैंड बाजा के साथ घर वापसी करवाई जाती है। द्विशा ऐसा क्यों नहीं कर पाई?
    दोनों पक्षों की मांओं के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। वर की मां कानून के पेशे से संबंध रखती है। उनके घर में जो घटना घटी उसका न्यायिक पहलू देख समझ रही है। चू लड़की की सास है इस कारण कानूनी रूप से घेरे में है। इतने अल्प समय में किसी दूसरे घर की बेटी, उनके घर में विवाह के पांच महीने बाद तथाकथित आत्म हत्या कर ली है या उसकी हत्या कर दी गई है। इस कारण कानून के बने नियमों के अनुसार घेरे में आना पड़ेगा
    दूसरी तरफ द्विशा की मां है। अपनी बेटी के रग रग से वाकिफ होंगी।लड़की का चरित्र कैसा है, व्यवहार कैसा है, सब कुछ जानती होंगी, चाहे उसे बताया जाए या न बताया जाए। इस मामले जो चैट है वे लड़की की मां का सामाजिक पक्ष को जाहिर करता है। पति से होते विवाद को पति के मां से बताने की समझाइश, बहुत कुछ बाते बोलती है।
    मध्य प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की अनुशंसा का दी है। द्विशा की सास को सेवा निवृत्ति के बाद अध्यक्ष उपभोक्ता फोरम से हटा दिया गया है। समर्थ का अधिवक्ता लाइसेंस सस्पेंड कर दिया गया है। उच्च न्यायालय जबलपुर में समर्पण का सुझाव कानूनी दांवपेच ही था, असफल रहा। मृतक का दोबारा पोस्ट मार्टम दिल्ली एम्स के डॉक्टर की टीम करेगी।सीबीआई को आगे जांच करना है। सीबीआई जिसने आरुषि तलवार मामले में जांच की थी। यहां भी राज्य की पुलिस की जांच के कई दिनों बाद सीबीआई को अपने ढंग से जांच करना है।साक्ष्य जुटाना है। आत्महत्या है क्यों है? हत्या है तो कैसे हुई?
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