मेंबरशिप फीस पर टैक्स नियम स्पष्ट: एनजीओ मेम्बरशिप पर इनकम टैक्स की छूट तो जीएसटी 18 प्रतिशत लगेगा

रायपुर। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं, ट्रेड एसोसिएशन, क्लब और रेजिडेंशियल वेलफेयर सोसायटी द्वारा ली जाने वाली मेंबरशिप फीस पर टैक्स नियमों को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। टैक्स विशेषज्ञ सीए चेतन तारवानी के अनुसार, मेंबरशिप फीस पर इनकम टैक्स और जीएसटी के अलग-अलग प्रावधान लागू होते हैं, जिन्हें समझना संस्थाओं के लिए बेहद आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि इनकम टैक्स के तहत, यदि कोई संस्था अपने सदस्यों से प्राप्त मेंबरशिप फीस को उन्हीं सदस्यों के हित में खर्च कर देती है, तो इसे आय नहीं माना जाता और इस पर इनकम टैक्स लागू नहीं होता।। इसके अलावा, यदि संस्था अपने सदस्यों के अलावा अन्य स्रोतों से आय अर्जित करती है, जैसे प्रॉपर्टी को किराए पर देना या जमा राशि पर ब्याज प्राप्त करना, तो ऐसी आय पर इनकम टैक्स लागू होता है। वहीं, यदि संस्था का खर्च उसकी आय से अधिक हो जाता है, तो इस स्थिति में हुए नुकसान को अन्य टैक्सेबल आय के साथ निर्धारित सीमा तक समायोजित किया जा सकता है।
एनजीओ को प्राप्त दान पर इनकम टैक्स देय नहीं है हालांकि, यदि संस्था दान के बदले किसी प्रकार की सुविधा प्रदान करती है, जय दानदाता का विज्ञापन छापना तो यह आय की श्रेणी में आती है और उस पर इनकम टैक्स देय होता है
जीएसटी के प्रावधानों के अनुसार, वर्ष 2021 के संशोधन के बाद संस्था और उसके सदस्यों को अलग-अलग इकाइयों के रूप में माना जाता है। ऐसे में यदि कोई संस्था अपने सदस्यों से मेंबरशिप फीस वसूलती है, तो उस पर 18 प्रतिशत जीएसटी लागू होता है, बशर्ते संस्था जीएसटी में पंजीकृत हो। जिन संस्थाओं की वार्षिक कुल प्राप्ति 20 लाख रुपये से अधिक होती है, उनके लिए जीएसटी पंजीयन अनिवार्य है।
रेजिडेंशियल वेलफेयर सोसायटी के मामलों में विशेष प्रावधान लागू होते हैं। यदि कोई रेजिडेंशियल वेलफेयर सोसायटी जीएसटी में पंजीकृत है और किसी सदस्य से मासिक मेंटेनेंस शुल्क 7500 रुपये से अधिक लिया जाता है, तो पूरे मेंटेनेंस शुल्क पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाया जाता है। इसके अलावा, संस्थाओं को प्राप्त होने वाले डोनेशन पर सामान्यत: जीएसटी लागू नहीं होता, क्योंकि इसके बदले में कोई सेवा या वस्तु प्रदान नहीं की जाती। हालांकि, यदि डोनेशन के बदले किसी प्रकार का लाभ, प्रचार या विज्ञापन प्रेषित किया जाता है, तो इसे स्पॉन्सरशिप माना जाएगा और उस पर जीएसटी लागू होगा। वहीं, यदि मेंबरशिप फीस सीधे सामाजिक कार्यों जैसे गरीबों की सहायता, भोजन वितरण आदि में खर्च की जाती है तो ऐसी राशि को डोनेशन माना जाता है और उस पर जीएसटी नहीं लगता।
कर विशेषज्ञ चेतन तारवानीका कहना है कि संस्थाओं को इन नियमों की सही जानकारी रखनी चाहिए और जीएसटी के दायरे में आने पर समय पर पंजीयन कराना चाहिए। नियमों की अनदेखी करने पर भविष्य में विभाग द्वारा टैक्स वसूली की कार्रवाई की जा सकती है। इसलिए सभी संस्थाओं को अपने वित्तीय लेन-देन को पारदर्शी रखते हुए कानून के प्रावधानों का पालन करना आवश्यक है।







