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नक्सलवाद के खात्मे के बाद अंतिम छोर पर स्थित गोगुंडा में बदलाव दिखने लगा 

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सुकमा। जिले के कोंटा विकासखंड के अंतिम छोर पर स्थित गोगुंडा पंचायत और उससे जुड़े मीचिगुड़ा गांव में बदलाव दिखने लगा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में नक्सलवाद के खात्मे के बाद प्रशासन ने जिस तरह इस क्षेत्र को मुख्यधारा से जोडऩे का बीड़ा उठाया, वह अब जमीन पर दिखने लगा है। एक करोड़ रुपये की लागत से यहां विकास कार्यों को स्वीकृति मिली है, जहां कभी स्कूल और आंगनबाड़ी की कल्पना भी मुश्किल थी, वहां अब बच्चों की किलकारियां गूंज रही हैं। पीडीएस भवन बन रहा है, ताकि राशन के लिए दूर-दूर भटकना न पड़े। गांव में दो महीने पहले आई बिजली ने भी जीवन को नई रोशनी दी है। जहां पहले अंधेरा ही अंधेरा था, वहां अब रोशनी है सिर्फ बल्ब की नहीं, बल्कि उम्मीदों की अब बच्चे पढ़ पा रहे हैं, महिलाएं घर के काम आसानी से कर पा रही हैं और गांव में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है।
नक्सल क्षेत्र में बड़ी स्क्रीन पर पहली बार फिल्में देखना, क्रिकेट मैच का आनंद लेना और देश-दुनिया की खबरों से जुडऩा यह सब उन ग्रामीणों के लिए नया अनुभव है, जिन्होंने अब तक सिर्फ संघर्ष ही देखा था। यह कक्ष सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव और मानसिक सुकून का केंद्र बनने जा रहा है। गोगुंडा में तेंदूपत्ता की खरीदी शुरू हुई है और यह अपने आप में ऐतिहासिक है7 आजादी के बाद पहली बार इस पंचायत में तेंदूपत्ता खरीदा जा रहा है। करीब 200 परिवारों के लिए यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का जरिया बन गया है।
एक समय था जब ग्रामीण डर के साए में जीते थे। फड़ तक जाना भी जोखिम भरा होता था। नक्सलियों के डर से लोग अपनी मेहनत का सही मूल्य नहीं पा पाते थे, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। पूर्व सरपंच माड़वी देवा की आंखों में चमक साफ दिखती है, जब वे बताते हैं कि अब लोग बिना डर के फड़ तक पहुंचते हैं और खुलेआम अपनी उपज बेचते हैं। इस बदलाव में महिलाओं की भूमिका भी बेहद अहम है। मुचाकी गंगी का फड़ मुंशी बनना इस बात का संकेत है कि अब बस्तर की महिलाएं सिर्फ घर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं। मुचाकी देवे और हेमला मंगला जैसी महिलाएं अब आत्मनिर्भर बन रही हैं। उन्हें घर के पास ही काम मिल रहा है, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। यह सब कुछ आसान नहीं था, यह वही इलाका है, जहां कभी नक्सली घटनाएं आम थीं। सड़कें काट दी जाती थीं, पुल उड़ा दिए जाते थे और विकास कार्यों को रोक दिया जाता था। सरकारी अमला यहां आने से कतराता था, लेकिन अब वही प्रशासन यहां डेरा डालकर काम कर रहा है।
कलेक्टर अमित कुमार ने कहा कि गोगुंडा जैसे सुदूर और पूर्व नक्सल प्रभावित क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से जोडऩा हमारी प्राथमिकता है। तेंदूपत्ता खरीदी की शुरुआत और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार यह दिखाता है कि अब यहां विश्वास और शांति का माहौल बना है। हमारा लक्ष्य है कि अंतिम छोर तक हर ग्रामीण को योजनाओं का लाभ मिले।
डीएफओ अक्षय भोसले ने कहा कि गोगुंडा में पहली बार तेंदूपत्ता खरीदी शुरू होना ऐतिहासिक कदम है। इससे स्थानीय ग्रामीणों को सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा और वे आत्मनिर्भर बनेंगे। वन संपदा अब लोगों की आजीविका और विकास का मजबूत आधार बन रही है।

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