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अनुकंपा नियुक्ति को लेकर उच्च न्यायालय ने सुनाया अहम फैसला, अंबिकापुर नगर निगम में अनुकंपा नियुक्ति के मामले में सख्त हुआ उच्च न्यायालय

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बिलासपुर। मंगलवार को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर अंबिकापुर नगर निगम के सफाई कर्मचारी की मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति पर उच्च न्यायालय की एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए निगम की याचिका को खारिज कर दिया। जिससे याचिकाकर्ता को अनुकंपा नियुक्ति दिये जाने का रास्ता साफ हो गया।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल ने अपने इस फैसले में सपाट शब्दों में कहा कि यदि परिवार का कोई एक सदस्य पहले से सरकारी नौकरी में है तो इसका तात्पर्य यह बिल्कुल नहीं है कि अनुकंपा नियुक्ति का दावा स्वमेव खत्म हो गया। अगर हकीकत में परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा है तो उसकी असली स्थिति जाने बिना केवल नियमों का हवाला देकर आवेदन को खारिज करना सही नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की युगल पीठ ने मंगलवार को इस मामले की सुनवाई की करते हुए अंबिकापुर नगर निगम की अपील को खारिज कर दिया और सिंगल बेंच के पुराने आदेश को सही माना। पीठ ने कहा कि सरकार की अनुकंपा नियुक्ति योजना का असली मकसद मृतक कर्मचारी के परिवार को अचानक आए भारी आर्थिक संकट से बचाना है। अधिकारियों को इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर जमीनी और मानवीय फैसला लेना चाहिए।
यह पूरा मामला अंबिकापुर नगर निगम का है। याचिकाकर्ता के पिता वहां सफाई कर्मचारी के पद पर काम करते थे। नौकरी के दरम्यान अचानक उनका निधन हो गया। इससे उनके परिवार पर आर्थिक बोझ बढ गया। उनके परिवार में पत्नी तीन बेटे और एक बेटी हैं। पूरा परिवार उनकी कमाई पर ही निर्भर था। पिता की मौत के बाद उनके बेटे ने सरकार की अनुकंपा नियुक्ति नीति के तहत नौकरी के लिए आवेदन किया। लेकिन नगर निगम ने यह कहते हुए उसके आवेदन को निरस्त कर दिया कि उसकी मां पहले से ही निगम में सफाई कर्मचारी के रूप में काम कर रही हैं। आवेदन निरस्त होने के बाद याचिकाकर्ता ने दुबारा फिर से निगम में उसके आवेदन पर पुर्नविचार करने को कहा और इसके लिये ऐसे ही एक प्रकरण का हवाला देते हुए बताया कि ठीक ऐसी ही स्थिति वाले दूसरे लोगों को पहले नौकरी दी जा चुकी है। निगम ने जब उसकी नहीं सुनी तो कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा तो सिंगल बेंच ने नगर निगम के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निगम को आदेश दिया कि वह याचिकाकर्ता को नौकरी दे। इस फैसले के खिलाफ नगर निगम कमिश्नर ने डबल बेंच में अपील कर दी थी।
निगम की तरफ से दलील दी गई कि 2013 की नीति के अनुसार अगर परिवार में कोई भी सदस्य सरकारी नौकरी में है तो अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिल सकती। वहीं याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उसकी मां की तनख्वाह बहुत कम है और उससे इतने बड़े परिवार का खर्च नहीं चल सकता। हाईकोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में साफ कहा कि अधिकारियों ने यह जानने की थोड़ी भी कोशिश नहीं की कि परिवार की असली आर्थिक स्थिति क्या है? मुख्य कमाने वाले की मौत के बाद परिवार किन परेशानियों का सामना कर रहा है यह बिल्कुल नहीं देखा गया। अदालत ने कहा कि किसी परिवार के एक सदस्य का कम तनख्वाह वाले पद पर काम करना यह साबित नहीं करता कि परिवार गरीबी से बाहर आ गया है।
हर मामले की अलग अलग जांच होनी चाहिए। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि अनुकंपा नियुक्ति कोई मूल अधिकार नहीं है। बल्कि, यह सरकार की एक कल्याणकारी व्यवस्था है। सिर्फ तकनीकी नियमों के आधार पर किसी जरूरतमंद का आवेदन खारिज करना योजना के खिलाफ होगा। इस तल्ख टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने नगर निगम की अपील खारिज कर दी और याचिकाकर्ता को बड़ी राहत दे दी।

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