एनसीईआरटी और कई राज्यों के शिक्षा बोर्डों ने बेमेतरा के गंगाराम की गाथा को अपनी पाठ्यपुस्तकों में किया शामिल

बेमेतरा। देश के कुछ हिस्सों में जहां आदमखोर मगरमच्छों का खौफ सुर्खियों में है, वहीं बेमेतरा जिले का बावामोहतरा गांव इंसान और जीव के निस्वार्थ प्रेम की एक ऐतिहासिक मिसाल पेश कर रहा है। यहां गंगाराम नाम का एक सीधा-साधा मगरमच्छ ग्रामीणों के लिए कोई जंगली जीव नहीं, बल्कि परिवार का एक अभिन्न सदस्य था। सैकड़ों डॉक्यूमेंट्री और सोशल मीडिया का हीरो बन चुके गंगाराम की यह कहानी अब राष्ट्रीय स्तर पर जीव-दया का बड़ा उदाहरण बन गई है। एनसीईआरटी और कई राज्यों के शिक्षा बोर्डों ने इस प्रेरक गाथा को अपनी पाठ्यपुस्तकों में शामिल किया है।
इस विशेष पाठ के माध्यम से अब देशभर के स्कूली बच्चों को जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता, निस्वार्थ प्रेम और पर्यावरण संतुलन का व्यावहारिक पाठ पढ़ाया जा रहा है। बेमेतरा के बावामोहतरा गांव की यह अनूठी कहानी आज इस बात का संदेश देती है कि इंसान और जीव-जंतुओं के बीच विश्वास, संवेदनशीलता और अपनापन हो तो सह-अस्तित्व की मिसाल कायम की जा सकती है। गंगाराम की प्रेरक गाथा अब स्कूली बच्चों तक भी पहुंच रही है। पाठ्यक्रम में शामिल इस कहानी के माध्यम से विद्यार्थियों को जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता, प्रकृति के प्रति सम्मान, सह-अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जाएगा। यह कहानी बताती है कि यदि इंसान और वन्यजीव के बीच विश्वास और संवेदनशीलता हो, तो दोनों एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्वक रह सकते हैं।
जनवरी 2019 में 175 वर्ष की लंबी उम्र पूरी कर जब गंगाराम ने अंतिम सांस ली, तो पूरे इलाके में मातम पसर गया था। ग्रामीणों ने नम आंखों से उसे विदाई दी और उसकी याद को अमर रखने के लिए तालाब किनारे समाधि बनाकर बकायदा मूर्ति स्थापित की, जहां आज भी श्रद्धापूर्वक पूजा-पाठ किया जाता है। गांव के बुजुर्ग दीना साहू और अन्य ग्रामीणों के अनुसार, गंगाराम का स्वभाव इतना शांत था कि लोग बिना किसी डर के उसी तालाब में नहाते थे। यदि कोई तैरते समय उससे टकरा भी जाता, तो वह चुपचाप अपना रास्ता बदल लेता था। बच्चों में भी उसका कोई भय नहीं था। कई बार बच्चे उसकी पूंछ पकड़कर तस्वीरें तक खिंचवाते थे।






