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बस्तर गाेंचा में 16 काे भगवान के 22 विग्रहों के साथ श्रीगाेंचा रथयात्रा की परम्परा का हाेगा निर्वहन

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जगदलपुर । बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर के छ: खंडों श्रीजगन्नाथजी की बड़े गुड़ी, मलकानाथ, अमायत मंदिर, मरेठिया मंदिर, भरतदेव मंदिर, कालिकानाथ मंदिर में भगवान श्री जगन्नाथ स्वामी, बलभद्र व सुभद्रा देवी के विग्रह के अलावा एक मूर्ति केवल जगन्नाथ भगवान के साथ कुल 22 विग्रहों का एक साथ एक ही मंदिर में अलग-अलग खंड़ो में स्थापित होना, पूजित होना तथा इन 22 विग्रहों की एक साथ तीन रथाें में रथारूढ़ कर श्रीगाेंचा रथयात्रा भारत के किसी भी क्षेत्र में ही नहीं हाेती है। यह भी विदित हाे कि विश्व के किसी भी श्रीजगन्नाथ मंदिर में एक साथ 22 विग्रहों की पूजा एवं 22 विग्रहों की एक साथ रथयात्रा नहीं होती, जैसा कि जगदलपुर स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर में होता है। उक्त जानकारी 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष वेदप्रकाश पांडे ने देते हुए बताया कि बस्तर गाेंचा 2026 में तय कार्यक्रम के अनुसार 16 जुलाई काे श्रीजगन्नाथ स्वामी, सुभद्रा व बलभद्र स्वामी के 22 विग्रहों की पूजा व तीन रथाें में रथारूढ़ कर श्रीगाेंचा रथयात्रा की रियासत कालीन परंपरानुसार संपन्न किया जायेगा।
22 विग्रहों का एक साथ एक ही मंदिर में स्थापित होने का है रोचक प्रसंग
360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के पूर्व अध्यक्ष ईश्वर खंखारी ने 22 प्रतिमाओं के एक ही मंदिर में पूजा होने के पीछे का राेचक प्रसंग के बारे में बताते हुए कहा कि जब वर्ष 1408 में राजपरिवार के साथ जिन 360 घर आरण्यक ब्राह्मण परिवारों को लाकर बस्तर में बसाया गया, वे अपने साथ ओडि़सा से भगवान श्रीजगन्नाथ स्वामी, बलभद्र व सुभद्रा देवी की मूर्तियां लेकर आए। भगवान के विग्रहों के साथ बस्तर अंचल में आकर बस गए और अपने आराध्य की पूजा-अर्चना करते रहे । इस दाैरान रियासत कालीन राजाओं की राजधानी जब जगदलपुर स्थानांतरित हुयी, तब वर्तमान श्रीजगन्नाथ मंदिर के समीप घांस फूस से निर्मित मंदिर का निर्माण करके पूजा-अर्चना की जाती थी। कुछ समय पश्चात उस मंदिर में आग लग जाने से मंदिर पूरी तरह नष्ट हो गया । इस घटना के बाद राजा ने समीप ही श्रीजगन्नाथ मंदिर का निर्माण करवाया । भव्य मंदिर के निर्माण की बात जब सारे बस्तर अंचल में फैली तो अंचल के समस्त 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के सदस्याें ने विचार किया कि क्यों न भगवान श्रीजगन्नाथ स्वामी, बलभद्र व सुभद्रा देवी के सभी विग्रहों को मुख्यालय के मंदिर में स्थापित किया जाय। राजपरिवार की अनुमति से अंचल के 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के सदस्यों ने अपने अलग-अलग खंडों का निर्माण करवाकर उसके नामकरण के साथ भगवान श्रीजगन्नाथ स्वामी, बलभद्र व सुभद्रा देवी के विग्रहाें काे स्थापित करवाया जाे आज भी विद्यमान है, एवं रियासत कालीन परंपरानुसार उनकी सेवा जारी है। छ: खंडों के अलावा सातवें खंड का भी निर्माण करवाया गया, जिसमें भगवान श्रीराम की मूर्ति स्थापित की गई । इस तरह एक ही मंदिर के छ: खंडों में भगवान के 22 विग्रहों के दर्शन और पूजन के लाभ के साथ-साथ सातवें खंड में श्रीरामजी की पूजा करने का पुण्य-लाभ आज भी श्रद्धालु प्राप्त कर रहे हैं।
बस्तर दशहरा से जुड़ा हुआ है सातवें खंड में स्थापित श्रीराम मंदिर
360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के वरिष्ठ सदस्य विवेक पांडे ने बताया कि सातवें खंड में स्थापित भगवान श्रीराम मंदिर विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के साथ जुड़ा हुआ है, बस्तर गाेंचा एवं बस्तर दशहरा की शुरूआत बस्तर महाराजा पुरूषाेत्तम देव के द्वारा वर्ष 1408 में जगन्नाथपुरी की यात्रा में पंहुचने पर वहां से रथपति की उपाधि मिलना एवं भगवान श्रीजगन्नाथ स्वामी, सुभद्रा व बलभद्र स्वामी के विग्रह के साथ रथारूढ़ हाेकर बस्तर की वापसी के बाद बस्तर में श्रीजगन्नाथ मंदिर की स्थापना कर जगन्नाथपुरी से लाये गये विग्रहाे काे स्थापित करने बाद से आज पर्यंत तक अनवरत जारी है।
उन्हाेने बताया कि रियासतकालीन परंपरानुसार 75 दिवसिय बस्तर दशहरा के पर्व का सबसे बड़ा आकर्षण दुमंजिला विशालकाय रथ में मां दंतेश्वरी के छत्र काे रथारूढ़ कर रथ पपरिक्रमा से पहले मां दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी छत्र काे लेकर पैदल चलकर बस्तर की मूल देवी माता मावली के मंदिर पंहुचकर पूजा-विधान के बाद मां दंतेश्वरी का छत्र सातवें खंड में स्थापित भगवान श्रीराम मंदिर पंहुचते हैं, जहां पूजा-विधान के बाद ही श्रीजगन्नाथ मंदिर के पश्चिम द्वार से मां दंतेश्वरी का छत्र दुमंजिला विशालकाय रथ में रथारूढ़ करने की परंपरा का निर्वहन शाब्दियाें से अनवरत जारी है, मान्यता है कि मां दंतेश्वरी बस्तर दशहरा में रथ परिक्रमा से पहले बस्तर की मूल देवी माता मावली एवं भगवान विष्णु स्वरूप प्रभु श्रीजगन्नाथ-श्रीराम काे अपने साथ रथारूढ कर परिक्रमा के लिए निकलती हैं।

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