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पहाड़ी मैना प्रोजेक्ट विफलता की मिसाल बना

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जगदलपुर। राजकीय पक्षी पहाड़ी मैना के संरक्षण अब विफलता की मिसाल बन गया। जहां लाखों रुपए खर्च होने के बावजूद न तो संरक्षण सफल हुआ और न ही पक्षियों को बचाया जा सका। एक के बाद एक मैना की मौत के बाद अब पिंजरे खाली पड़े हैं और रेस्क्यू सेंटर भी बंद कर दिया गया है। कांगेरघाटी क्षेत्र में पहले से प्राकृतिक आवास होने के बावजूद कृत्रिम केंद्र पर जोर देना सवालों के घेरे में है। कुछ समय तक घायल पक्षियों का उपचार जरूर हुआ, लेकिन परिणाम निराशाजनक रहे। पहाड़ी मैना, जो अपनी अनोखी आवाज के लिए जानी जाती है, पहले ही तस्करी का शिकार हो चुकी है, ऐसे में संरक्षण की यह नाकामी चिंताजनक है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पक्षी शांत वातावरण में ही फलता-फूलता है, जबकि कृत्रिम निगरानी उसके व्यवहार के अनुकूल नहीं है।

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