नक्सली दो दशकों में पहली बार बस्तर में शुरु तक नहीं कर पाए टीसीओसी अभियान

जगदलपुर। देश के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित क्षेत्र बस्तर में इस वर्ष विगत दो दशकों में पहली बार ऐसा हुआ है, कि नक्सली अपने सबसे अहम सैन्य अभियान टीसीओसी (टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन) शुरु तक नहीं कर पाए हैं। आमतौर पर यह अभियान 8 मार्च के बाद शुरू होकर जून तक चलता है, लेकिन इस वर्ष मार्च के पहले सप्ताह तक इसके संकेत नहीं मिले हैं । बस्तर में तैनात सुरक्षा एजेंसियां इसे नक्सल संगठन के बड़े कैडर के नक्सलियों के मारे जाने या आत्मसमर्पण करने के बाद चंद नक्सलियों के बचे होने से कमजोर पड़ चुके संगठन का परिणाम मान रही है। बस्तर आईजी सुंदरराज पी. ने बताया कि बस्तर में नक्सल संगठन अब पूरी तरह टूट चुका है। कुछ गिनती के नक्सली बचे हैं, उन्हें न्यूट्रिलाइज करने की प्रक्रिया चल रही है।
दरअसल, टीसीओसी नक्सलियों का वार्षिक सैन्य अभियान माना जाता है। इस दौरान संगठन के शीर्ष नेता जंगलों में बैठक कर रणनीति बनाते हैं, नए कैडर भर्ती किए जाते हैं और सुरक्षाबलों, पुलिस कैंपों तथा विकास कार्यों को निशाना बनाने की योजना बनाई जाती है। जंगलों में गर्मियों में पत्ते झडऩे से दृश्यता बढ़ जाती है, जिससे नक्सली बड़े हमले और घात लगाने की रणनीति अपनाते हैं। विदित हो कि पिछले कुछ वर्षों में नक्सली सुरक्षाबलों की सक्रियता को देखते हुए टीसीओसी को पहले ही शुरू करने लगे थे। कई बार जनवरी में ही इसकी शुरुआत कर दी जाती थी, ताकि गर्मी बढऩे से पहले बड़े हमले किए जा सकें।लेकिन इस वर्ष बस्तर के हालात नक्सलवाद के समाप्ति के तय समय सीमा 31 मार्च समाप्ति की ओर अग्रसर होने के साथ ही पूरी तरह से बदल चुके हैं। बस्तर में जंगलों के बीच खूलेआम लगने वाले नक्सलियों की सभा लगभग समाप्त हो चुके हैं, नक्सली स्मारकों को चुन-चुन कर सुरक्षाबल ध्वस्त कर चुके हैं। नक्सलियों का जंगल में स्वच्छंद विचरण समाप्त हो चुका है, इसकी जगह सुरक्षाबलों के जवान गश्त करते दिखते हैं।इससे बस्तर के लोगों को भी यह विश्वास होने लगा है, कि बस्तर नक्सलवाद से मुक्त हो जायेगा। इसके लिए समय का इंतजार करना होगा।







