मुस्लिम वसीयत विवाद में हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला रद्द किया

हाईकोर्ट ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत संपत्ति की वसीयत के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम व्यक्ति अपनी कुल संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही वसीयत के जरिए किसी को दे सकता है, और इससे अधिक हिस्सा देने के लिए अन्य कानूनी वारिसों की स्पष्ट और स्वतंत्र सहमति जरूरी है। बिना सहमति के पूरी संपत्ति की वसीयत अवैध मानी जाएगी। यह फैसला इस्लामी कानून के उस मूल सिद्धांत को मजबूत करता है, जिसका उद्देश्य वारिसों के अधिकारों की सुरक्षा करना है।
कोर्ट ने कोरबा जिले की विधवा जैबुन निशा की अपील को मंजूर करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को रद्द कर दिया। जैबुन निशा 64 वर्ष की हैं और दिवंगत अब्दुल सत्तार लोधिया की पत्नी हैं, जिनकी कोई संतान नहीं थी। अब्दुल सत्तार की निजी संपत्ति पर उनके भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने दावा किया और 27 अप्रैल 2004 की वसीयत पेश की, जिसमें कथित तौर पर पूरी संपत्ति उसका नाम कर दी गई थी। तहसीलदार के आदेश से राजस्व रिकॉर्ड में दोनों का नाम संयुक्त रूप से दर्ज करवा लिया गया।







