धरोहर समिति बस्तर की विलुप्त होती देसी धान की पहचान और संरक्षण

बस्तर में पारंपरिक देसी धान की किस्में विलुप्ति के कगार पर हैं, लेकिन कोंडागांव के किसान शिवनाथ यादव और उनकी ‘धरोहर समिति’ ने इस संकट के खिलाफ मजबूत कदम उठाए हैं। पिछले 25 वर्षों में उन्होंने 290 देसी व विलुप्त होती धान की किस्मों को संजोया है और 44 किस्मों पर शोध जारी है। धरोहर समिति का उद्देश्य विलुप्त होती देसी किस्मों को बचाना और किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर पारंपरिक खेती की ओर प्रेरित करना है। यह प्रयास केवल बीज संग्रहण तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक ज्ञान, पर्यावरण संरक्षण और किसानों के अधिकारों से जुड़ा एक व्यापक आंदोलन बन चुका है। राष्ट्रीय स्तर पर भी इस कार्य को पहचान मिली है, और पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण ने 2016 में समिति को प्रशस्ति पत्र और प्रोत्साहन राशि दी। शिवनाथ यादव बताते हैं कि पारंपरिक खेती में मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और रासायनिक खाद व दवाओं के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है।







