मांडवा ग्राम पंचायत में शिक्षा व्यवस्था की विफलता: बच्चे झोपड़ी में पढ़ाई कर रहे

आजादी के 78 साल बाद भी मांडवा ग्राम पंचायत के बोमल्यापाट फाल्या में बच्चे झोपड़ी में पढ़ने को मजबूर हैं। यहां न पक्का स्कूल भवन है, न नियमित शिक्षक, न सड़क, और लगभग 60 बच्चे एक मजदूर की झोपड़ी में बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं। कक्षा 9 की छात्रा सीमा बडोले स्वयं शिक्षिका बनकर बच्चों को पढ़ा रही हैं और उन्हें वन विभाग के एक नाकेदार कैलाश की ओर से मात्र 3000 रुपये प्रतिमाह देने का वादा किया गया है। सरकारी योजनाओं जैसे “धरती आभा” और “डिजिटल इंडिया” के दावे यहाँ खोखले साबित हो रहे हैं। बच्चे बरसात में कीचड़ और गर्मी में तपती जमीन पर पढ़ाई कर रहे हैं। ग्रामीण युवा मास्टर रावत और छात्र राजेश-राहुल का कहना है कि शिक्षा के लिए तत्काल स्कूल भवन, शिक्षक और सड़क की आवश्यकता है। नेपानगर के एसडीएम भागीरथ वाखला ने कहा कि अगर धरती आभा योजना में यह गांव छूट गया है तो प्रस्ताव बनाकर भेजा जाएगा और शिक्षा विभाग से सर्वे कराया जाएगा। आदिवासी विभाग के उपसंचालक भारत जांचपुरे ने भरोसा दिलाया कि बच्चों का भविष्य बर्बाद नहीं होने देंगे और प्रस्ताव के लिए DPC को पत्र भेजा जाएगा। 78 साल बाद भी बच्चों की पढ़ाई झोपड़ी तक सीमित है, और सवाल यही है कि “नया भारत” किसके लिए बन रहा है, जब आदिवासी बच्चों के सपनों की कीमत केवल 3000 रुपये प्रतिमाह है। यह रिपोर्ट सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सिस्टम को आईना है।







