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नाटक मतलब हम जो टकटकी लगाकर न देखें – कालेले

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रायपुर। 66 वर्षीय महाराष्ट्र नाट्य मंडल के संस्थापक सदस्य 84 वर्षीय वरिष्ठ रंगसाधक अनिल श्रीराम कालेले ने कहा कि हम जो टकटकी लगाकर नहीं देखते, वही नाटक है। टकटकी लगाकर नहीं देखने का आशय नाटक देखते समय त्रुटि नहीं देखने- निकालने को लेकर है। नाटक देखते समय आपकी मानसिेकता गलतियां निकालने की न हो, बल्कि एंजाय करने की हो। इस अवसर पर महाराष्ट्र मंडल के अध्यक्ष अजय मधुकर काले, सचिव चेतन दंडवते, मुख्य समन्वयक श्याम सुंदर खंगन, दिव्यांग बालिका विकास गृह प्रभारी प्रसन्न निमोणकर, संत ज्ञानेश्वर स्कूल के प्रभारी परितोष डोनगांवकर ने कालेले का सूत माला, श्रीफल, शाल और स्मृति चिह्न से सम्मान किया।
महाराष्ट्र नाट्य मंडल के पूर्व सचिव प्रसन्न निमोणकर ने कहा कि नाम में क्या रखा है, कहना ही गलत है। नाम में ही सब कुछ रखा है। बिना नाम के हम कुछ भी नहीं है। तभी तो आज भी लोग बॉबी के डायलॉग प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा को याद करते हैं। अध्यक्ष अजय काले ने कहा कि महाराष्ट्र नाट्य मंडल का गौरवशाली इतिहास है। इसे बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी है। गणेशोत्सव में हमने बेहतरीन मराठी नाटक भानगढ पहावी लपवून का मंचन किया है। उसके बाद मराठी नाट्य प्रेमी एक और मजेदार मराठी नाटक की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
सचेतक रविंद्र ठेंगडी ने कहा कि रंगसाधकों में आपस में मतभेद हो सकते हैं, मनभेद भी संभव है। फिर भी हमें नाटकों को लेकर एक साथ होना चाहिए। किसी भी नाटक का बहिष्कार करना या उसे सेबोटाइज करना, कहीं न कहीं हमारे रंगसाधक होने पर ही प्रश्नचिह्न खड़े करता है। सचिव चेतन दंडवते, मुख्य समन्वयक श्याम सुंदर खंगन, वंदना निमोणकर, प्रिया बक्षी, गौरी क्षीरसागर, अस्मिता कुसरे, अजय पोतदार, प्रवीण क्षीरसागर, सुमीत मोडक समेत सभी रंगसाधकों ने अपने संक्षिप्त संबोधनों में रंगकर्म को लेकर अनुभव साझा किए।

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