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उत्तम मानस से होगा चरित्र का निर्माण : रामनाथ रामचंद्र

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रायपुर। राम चरित्र मानस सिर्फ एक धर्मग्रंथ या काव्य नहीं, अपितु हमारे जीवन का आधार है। राम चरित्र मानस में मानस का अर्थ अंतर्मन से है। हमारा मन अगर अच्छा होगा, तो हमारा चरित्र भी उत्तम होगा। उत्तम चरित्र से हम राम के वंशज कहलाएंगे, यानी हम राम चरित्र मानस को अपने जीवन में उतारने में सफल होंगे। उक्ताशय के विचार महाराष्ट्र मंडल के छत्रपति शिवाजी महाराज सभागृह में आयोजित श्री वाल्मिकी रामायण कथा के दौरान पुणे से पहुंचे कथावाचक आचार्य रामनाथ रामचंद्र अय्यर ने कहीं।
आचार्य अय्यर ने कहा कि महर्षि वाल्मिकी, जो पहले डाकू रत्नाकर ने नाम से जाने जाते थे, उन्होंने नारद ऋषि के कहने पर अपने मानस को उत्तम किया। डाकू होने के कारण उनके मुख से राम का नाम नहीं निकल रहा था, तो नारद जी ने उन्हें मरा-मरा उच्चारण करने को कहा। चार बार मरा-मरा बोलने पर तीन बार राम का नाम निकल ही रहा था। अपनी कठोर साधना से डाकू रत्नाकर ने अपने मानस को अच्छा किया और फिर उनके श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण हुआ। बाद में वे महर्षि वाल्मिकी कहलाए और रामायण जैसे महाकाव्य की रचना की। महर्षि वाल्मिकी का समूचा जीवन हमें इस बात की सीख देता है कि यदि हम अपने चरित्र निर्माण को लेकर तटस्थ रहे, तो अपने जीवन की रचना महाकाव्य की तरह कर सकते हैं।
पांच दिवसीय महर्षि वाल्मिकी रामायण कथा का शुभारंभ गणेश वंदना और रामस्तुति के साथ हुआ। मंडल के सभासद दत्त प्रसन्न राजवाड़े और दीपाली राजवाड़े की पुत्री प्रचिति ने सुंदर शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत कर वातावरण को राममय बना दिया। कथावाचक अय्यर ने कहा कि भगवान राम का नाम राजा दशरथ या माता कौशल्या ने नहीं, बल्कि कुलगुरु वशिष्ठ ने रखा था। राम को गोद में लेते ही उनके पूरे जीवन का वैभव उनके मानस पटल पर उतर आया और अंत:करण की आवाज पर उनके मुख पर राम नाम निकल आया।
रामनाथ अय्यर ने कहा कि जीवन में नाम का अत्यधिक महत्व होता हैं, क्योंकि वहीं हमारे व्यक्तित्व और चरित्र को भी प्रभावित व परिभाषित करता है। विडंबना है कि नई पीढ़ी अपने बच्चों के नाम अंग्रेजी शब्दावली के आधार पर रखती है। इनमें बहुत से रशियन भी होते हैं। आचार्य अय्यर ने कथा के पहले दिन भगवान राम द्वारा मां सीता के परित्याग की कथा सुनाई।

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