ChhattisgarhRegion

भोपालपटनम का पुश्तैनी बांस कला बाजार के अभाव में दम तोड़ रहा

Share

बीजापुर। जिले का भोपालपटनम क्षेत्र कभी बांस शिल्प कला के लिए पहचान रखता था, लेकिन आज अपनी ही पारंपरिक विरासत को बचाने की जंग लड़ रहा है। जिन हाथों ने दशकों तक बांस से टुकनी, सुपा, मुर्गी गुड़ा और घरेलू उपयोग की सामग्री बनाकर गांव-गांव पहचान बनाई, वे हाथ अब रोजी-रोटी के लिए दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं। बाजार में प्लास्टिक के मशीन निर्मित सामानों की बढ़ती मांग ने पुश्तैनी बांस कला को लगभग हाशिए पर पहुंचा दिया है। फिलहाल बांस की धरती पर यह पुश्तैनी हुनर धीरे-धीरे अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है।
भोपालपटनम ब्लॉक के गुल्लागुड़ा, मद्देड़ और रुद्राराम गांवों में बसे बुरुड़ समाज के परिवार पिछले करीब एक सदी से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। ग्रामीण बताते हैं कि तत्कालीन जमींदारों ने महाराष्ट्र के आंकिसा गांव से इन परिवारों को यहां बसाया था ताकि स्थानीय जरूरतों के लिए बांस से घरेलू सामग्री तैयार की जा सके। उस समय इनकी कला गांवों की जरूरत थी, लेकिन अब यही हुनर बाजार के अभाव में दम तोड़ रहा है।
70 वर्षीय कोनम जगैया बताते हैं कि उन्होंने 55 वर्षों तक बांस शिल्प के सहारे परिवार चलाया। इसी काम से बच्चों का पालन-पोषण और बेटियों की शादी हुई, लेकिन अब हालात इतने बदल गए हैं कि तैयार सामान घरों में ही पड़ा रह जाता है। उम्र ढल चुकी है, आंखों की रोशनी कमजोर हो रही है, फिर भी मजबूरी में काम करना पड़ रहा है क्योंकि परिवार के पास न खेती है और न कोई दूसरा सहारा।
प्ररला श्रीनिवास और उनकी पत्नी महेश्वरी भी इसी संकट से गुजर रहे हैं। महेश्वरी दिनभर मेहनत कर सुपा और टुकनी तैयार करती हैं, लेकिन खरीदार नहीं मिलने से मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। उनका कहना है कि मेहनत के मुकाबले आमदनी इतनी कम है कि अब यह काम छोडऩे की नौबत आ गई है।
सबसे ज्यादा चिंता नई पीढ़ी को लेकर है, गांव के युवा कोनम राजेंद्र बताते हैं कि वे इस कला को आगे बढ़ाना चाहते थे, लेकिन बाजार और सरकारी सहयोग के अभाव में अब मजदूरी और छोटे-मोटे व्यवसाय की ओर जाना पड़ रहा है। उन्होंने बैंक से ऋण लेकर छोटी दुकान शुरू की है क्योंकि केवल बांस शिल्प के भरोसे परिवार चलाना संभव नहीं रहा।
विडंबना यह है कि जिस भोपालपटनम क्षेत्र से हर साल बड़ी मात्रा में बांस बाहर के बाजारों तक पहुंचता है, वहीं स्थानीय कलाकार आर्थिक संकट में जीवन बिता रहे हैं। यदि शासन स्तर पर प्रशिक्षण, आधुनिक डिजाइन, ऑनलाइन विपणन और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए तो यही पारंपरिक कला क्षेत्र के सैकड़ों परिवारों को रोजगार दे सकती है।

GLIBS WhatsApp Group
Show More
Back to top button