स्प्रिचुअल हेल्थ से मिलती है मन को शांति : रामनाथ

रायपुर। स्प्रिचुअल हेल्थ को लेकर लोगों की बढ़ती जागरूकता उत्साहजनक है। कथा के बाद भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आध्यात्म से जुड़ी शंकाओं और दुविधाओं को दूर करने के लिए आते हैं। स्वस्फूर्त चर्चा करते हैं। यह उतना ही जरूरी है, जितना कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हम सजग रहते हैं और थोड़ी से परेशानी आने पर डॉक्टर के पास जाते हैं।
महाराष्ट्र मंडल के शिवाजी महाराज सभागृह में जारी रामकथा के अंतिम दिन आचार्य रामनाथ रामचंद्र अय्यर ने इस आशय के विचार व्यक्त करते हुए धर्मावलंबी के रूप में हमारी जीवनशैली कैसी होनी चाहिए पर मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि हर घर में पूजा यजमान को ही करनी चाहिए। शाम को दीया बत्ती भी उनकी ही ओर से होना चाहिए। घर के संचालन सहित सभी बाहरी कामकाज यजमान को करना चाहिए। घर की लक्ष्मी को प्रतिदिन तुलसी में पानी डालना, हल्दी-कुंकू लगाना चाहिए। इसी तरह दरवाजे पर आने वाले भिक्षु को दान भी उसे ही देना चाहिए। घर में आने वाले अतिथि का आत्मीय स्वागत करने से लेकर उसे सुस्वाद भोजन कराने की जिम्मेदारी घर की स्त्री की होती है। वैसे भी धर्म शास्त्रों में उसे अन्नपूर्णा का दर्जा प्राप्त है, जिनके हाथ में कलछी है।

आचार्य अय्यर ने जोर देकर कहा कि कभी भी पुत्र और पुत्री में भेद नहीं करना चाहिए। स्मरण रखना चाहिए कि लड़का यदि राम होता है, तो उसका रामत्व सीता से ही पूरा होता है। कबीर ने कहा कि लड़का एक वंश को चलाता है, तो लड़की दो वंशों को तारती है। उन्होंने भगवान का शाब्दिक अर्थ बताते हुए कहा कि भग का अर्थ ऐश्वर्य है अर्थात जब भी आप भगवान के दर्शन करें, तो दान स्वरूप कुछ न कुछ अर्पण करें। इसी तरह आरती लेते समय भी सिर्फ हाथ घुमाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री न करें, बल्कि आरती की थाल में कुछ न कुछ डालें।
रामनाथ रामचंद्र ने कहा कि शास्त्रों में लिखा है कि पांच वर्ष की आयु तक बच्चों को लाड़ करें। 5 से 16 वर्ष की आयु तक संस्कारवान बनाने के लिए यथासंभव प्रयत्न करें। 16 वर्ष के बाद उन्हें अपना मित्र बनाएं और बराबरी का भरोसा देने के लिए उनके कंधों पर हाथ भी रखें। अब इतना भी बराबरी का भरोसा न दें कि वह आपके कंधों पर हाथ रखे, यह अधर्म होगा। रामकथा के अंतिम दिन के यजमान अभय काले और अरुण पराडकर रहे। हरे रंग के ड्रेस कोड में बड़ी संख्या में भक्तजनों ने रामकथा का श्रवण किया।







