धर्म और सत्ता की निर्णायक परीक्षा : स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद

[श्रीविद्यामठ, केदारघाट,वाराणसी] | [माघ शुक्ल द्वादशी 2082 विक्रमी तदनुसार 30 जनवरी 2026 ईसवी]लगता है स्वतन्त्र भारत में गोमाता की रक्षा और गोहत्या बन्दी कानून की माँग करना ही सबसे बडा अपराध हो चुका है। तभी तो जब-जब जिस-जिस ने यह आवाज उठाई सरकारों ने उसे क्रूरता पूर्वक रौंद दिया। उदाहरण 1966 का दिल्ली का गोरक्षा आन्दोलन है जिसमें तत्कालीन सरकार ने जाने कितने गोभक्तों सन्तों को गोलियों से भून दिया और धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज सहित प्रमुख सनातनियों पर भी तरह-तरह के अत्याचार किये और अब उसी आवाज को बुलन्द करने के कारण हमें और हमारा इस कार्य में सहयोग कर रहे गोभक्तों पर भान्ति-भान्ति के अत्याचार और अन्याय हो रहे हैं जिन्हें आप सब देख ही रहे हैं। यहाँ तक कि हमसे हमारे शङ्कराचार्य होने का प्रमाण तक माँगा जा रहा है और हमारी छवि को सनातनी जनता के बीच धूमिल करने के तरह-तरह के प्रयास किये जा रहे हैं। इन सबका नेतृत्व योगी आदित्यनाथ अपने विश्वस्तों रामभद्राचार्य आदि के माध्यम से कर रहे हैं।
हम स्पष्ट करते हैं कि इन सबसे विचलित न होते हुये हम समस्त सनातनियों के सहित गोरक्षा के अपने सङ्कल्प को दृढतापूर्वक बढाते रहेंगे। योगी आदित्यनाथ से हमारा कहना है कि-
“हमारा प्रमाण पत्र तो आपने माँग लिया, अब मुख्यमन्त्री जी को देना होगा अपने ‘हिन्दू’ होने का प्रमाण”
आज एक विशेष प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए परमाराध्य शङ्कराचार्य जी की ओर से सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को कड़ा सन्देश दिया गया। हाल ही में शासन द्वारा शङ्कराचार्य होने की प्रमाणिकता माँगे जाने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए स्पष्ट किया गया कि धर्म सत्ता प्रमाणपत्रों की मोहताज नहीं है, किन्तु सत्ता को अब अपनी धार्मिक निष्ठा सिद्ध करनी होगी।
- प्रमाणपत्र का उत्तर: मर्यादा और चुनौती
“मुख्यमन्त्री आदित्यनाथ जी, आपने हमसे हमारे पद और परम्परा का प्रमाणपत्र माँगा—हमने सहज भाव से वह आपको सौंप दिया। क्योंकि सत्य को साक्ष्य से भय नहीं होता। किन्तु अब समय ‘प्रमाण’ लेने का नहीं, बल्कि आपके ‘प्रमाण’ देने का है। सम्पूर्ण सनातनी समाज अब आपसे आपके ‘हिन्दू’ होने का साक्ष्य माँगता है। हिन्दू होना केवल भाषणों या भगवे तक सीमित नहीं है, इसकी कसौटी ‘गो-सेवा’ और ‘धर्म-रक्षा’ है।” - मुख्य माँगें : गोमाता को सम्मान और रक्त-व्यापार पर विराम
सत्ता के समक्ष दो स्पष्ट और अपरिहार्य शर्तें रखी जा रही हैं: • गोमाता को ‘राज्यमाता’ का आधिकारिक दर्जा: जिस प्रकार हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने देशी गायों को ‘राज्यमाता’ घोषित किया और जिस तरह नेपाल में गाय ‘राष्ट्रीय पशु’ है, उसी तर्ज पर उत्तरप्रदेश में भी गोमाता को ‘राज्यमाता’ का सम्मान मिले।
- मांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबन्ध: उत्तरप्रदेश की पवित्र धरती से होने वाले हर प्रकार के मांस निर्यात (Bovine Meat) पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए।
- तथ्यों का प्रहार: निर्यात के नाम पर गोवंश की हत्या का खेल
प्रेस वार्ता में सरकारी आङ्कड़ों के हवाले से गम्भीर तथ्य उजागर किए जा रहे:
- निर्यात का हब: भारत के कुल मांस निर्यात में उत्तरप्रदेश की हिस्सेदारी 40% से अधिक है। क्या ‘रामराज्य’ का स्वप्न गायों के रक्त से अर्जित विदेशी मुद्रा पर आधारित होगा?
- भैंस के मांस की आड़ में षड्यन्त्र: निर्यात का सारा डेटा ‘भैंस के मांस’ (Buffalo Meat) के नाम पर दर्ज होता है, किंतु यह एक खुला सत्य है कि बिना DNA परीक्षण के इस मांस की आड़ में गोवंश को काटा और भेजा जा रहा है।
- सांख्यिकीय विसङ्गति: राज्य में भैंसों की संख्या और मांस निर्यात की मात्रा में भारी अन्तर है। जब तक हर वधशाला और कण्टेनर का वैज्ञानिक परीक्षण अनिवार्य नहीं होता, तब तक यह सरकार द्वारा दी गई ‘मौन स्वीकृति’ है।
- ४० दिनों का समय और ‘नकली हिन्दू’ की घोषणा
“हम शासन को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए ४० दिनों का समय दे रहे हैं। यदि इन ४० दिनों के भीतर गोमाता को राज्यमाता का दर्जा नहीं मिला और निर्यात बन्दी का शासनादेश जारी नहीं हुआ, तो परिणाम गम्भीर होंगे।”
चेतावनी: “यदि ४० दिन व्यर्थ गए, तो आगामी १०-११ मार्च को लखनऊ की पुण्य धरा पर सम्पूर्ण सन्त समाज का समागम होगा। उस दिन हम मुख्यमन्त्री जी को ‘नकली हिन्दू’ घोषित करने को बाध्य होंगे। जो सरकार गोवंश की रक्षा नहीं कर सकती, उसे हिन्दू कहलाने का नैतिक अधिकार नहीं है और उस योगी को तो बिलकुल नहीं जो गुरु गोरक्षनाथ की पवित्र गद्दी का खुद को महन्त कहता हो ।
जन-जन का आह्वान
“यह केवल एक पद की लड़ाई नहीं, बल्कि सनातन की आत्मा की रक्षा का प्रश्न है। उत्तराखण्ड ने ‘राष्ट्रमाता’ का प्रस्ताव दिया, महाराष्ट्र ने ‘राज्यमाता’ बनाया—तो फिर भगवान राम और कृष्ण की धरती ‘उत्तरप्रदेश’ मांस निर्यात का केन्द्र क्यों बनी हुई है? मुख्यमन्त्री जी, बस कुछ क्षण और प्रतीक्षा है; निर्णय अब आपके हाथ में है कि आप सन्तों के आशीर्वाद के पात्र बनेंगे या इतिहास के कठघरे में नकली हिन्दू के रूप में दर्ज होंगे।”







