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26-09-2018
School Education : मध्यान्ह भोजन के साथ अब बच्चों को मिलेगा खीर , अक्टूबर से लागू होगी योजना

बिलासपुर। अब प्रदेश के बच्चे मध्यान्ह भोजन के साथ साथ हर सप्ताह खीर का भी लुत्फ उठाएंगे। जी हां, प्रदेश के 10 जिले कोरबा, राजनांदगांव, महासमुंद, कोंडागांव, नारायणपुर,बस्तर,दंतेवाड़ा बीजापुर और सुकमा के बच्चों को अब मध्यान्ह भोजन के साथ साथ अक्टूबर के पहले सप्ताह से खीर भी मिलेगा । जिला खनिज निधि से इसके लिए दूध पाउडर उपलब्ध कराया जाएगा अभी फिलहाल 3 जिलों में 9 लाख 36 हजार बच्चों को मध्यान भोजन का लाभ मिलता है  इस योजना के क्रियान्वयन के लिए देवभोग दुग्ध महासंघ को प्रति छात्र प्रति सप्ताह 200 मिलीलीटर दूध तैयार किए जाने हेतु 20 ग्राम दूध पाउडर उपलब्ध कराने को कहा जाएगा और महासंघ 500 ग्राम या 1 किलोग्राम के पैक में दूध पाउडर उपलब्ध कराएगा और इसके लिए विभाग द्वारा दुग्ध महासंघ को 350 रुपये प्रति किलो के हिसाब से भुगतान किया जाएगा, इसके अलावा विभाग ने शक्कर की भी व्यवस्था की है ।

चूंकि योजना बच्चों के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ी हुई है इसलिए स्कूल शिक्षा सचिव गौरव द्विवेदी ने इस संबंध में स्पष्ट और विस्तृत आदेश जारी किया है और स्कूल और संकुल को भी इस बात का विशेष ध्यान रखने को कहा है की योजना में किसी प्रकार की कोई कोताही न हो इसीलिए स्कूलों को दूध का प्रयोग करने से पहले सही तरीके से पैकेट की जांच करने और आवश्यक मात्रा का ही भंडारण करने का निर्देश दिया गया है , फिलहाल तो लाभ केवल 10 जिलों के ही बच्चों को मिलना है लेकिन यदि यह योजना सफल होती है तो भविष्य में अन्य जिलों के बच्चों को भी इसका लाभ मिल सकता है ।


01-09-2018
Halhshthi Festival : बच्चों के स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए माताओं ने रखा कमरछठ का उपवास

बिलासपुर। संतान की दीर्घायु एवं सुख समृद्धि की कामना को लेकर शुक्रवार व शनिवार को दो दिन हलषष्ठी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। मां वैसे तो दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है। मां को प्रेम जताने की जरूरत नही परंतु साल में आज का दिन वो अपने बच्चों के लिए वर्त रख अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं। हर वर्ष भाद्र माष के कृष्णपक्ष के षष्ठी के दिन माताएं खमरछठ का उपवास रख बुरी नजर और लम्बी उम्र की कामना करती हैं। जिले के मंदिरों, सामुदायिक भवनों, और पंडितों के घरों में महिलाऐं पूजन के लिए जाती बरबस ही दिखाई देती हैं।

पूजा अर्चना के बाद अपने बच्चों को पोता मारती हैं जिससे बाधाएं न आये। उसके बाद शाम में परसह चावल की खिचडी़, भैंस की दही और मुनगा भाजी की सब्जी बनाकर फलाहार स्वरूप ग्रहण करती है। और इन्हीं चीजों प्रसाद के रुप में परिजनों को बांटती हैं।

क्यों हलषष्ठी व्रत रखती है माताएं

प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका मन गौ-रस (दूध-दही) बेचने में लगा हुआ था। उसने सोचा कि यदि प्रसव हो गया तो गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा।

यह सोचकर उसने दूध-दही के घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए चल दी किन्तु कुछ दूर पहुंचने पर उसे असहनीय प्रसव पीड़ा हुई। वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां एक बच्चे को जन्म दिया।

वह बच्चे को वहीं छोड़कर पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई। संयोग से उस दिन हलषष्ठी थी। गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने सीधे-सादे गांव वालों में बेच दिया।

उधर जिस झरबेरी के नीचे उसने बच्चे को छोड़ा था, उसके समीप ही खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक उसके बैल भड़क उठे और हल का फल शरीर में घुसने से वह बालक मर गया।

इस घटना से किसान बहुत दुखी हुआ, फिर भी उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया। उसने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेट में टांके लगाए और उसे वहीं छोड़कर चला गया।

कुछ देर बाद ग्वालिन दूध बेचकर वहां आ पहुंची। बच्चे की ऐसी दशा देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसके पाप की सजा है। वह सोचने लगी कि यदि मैंने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो मेरे बच्चे की यह दशा न होती। अतः मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए।

ऐसा निश्चय कर वह उस गांव में पहुंची, जहां उसने दूध-दही बेचा था। वह गली-गली घूमकर अपनी करतूत और उसके फलस्वरूप मिले दंड का बखान करने लगी। तब स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ और उस पर रहम खाकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया।

बहुत-सी स्त्रियों द्वारा आशीर्वाद लेकर जब वह पुनः झरबेरी के नीचे पहुंची तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है। तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्म हत्या के समान समझा और कभी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया।

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