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31-08-2020
 मोदी सरकार पर राहुल गांधी ने बोला हमला, कहा- भारतीय अर्थव्यवस्था 40 सालों में पहली बार भारी मंदी में

नई दिल्ली। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं सांसद राहुल गांधी ने एक वीडियो में देश की अर्थव्यवस्था के बारे में बात करते हुए मौजूदा सरकार पर जमकर भड़ास निकाली है। राहुल गांधी ने वीडियो में अर्थव्यवस्था के बारे में बात करते हुए कहा कि, 'जो आर्थिक त्रासदी देश झेल रहा है, उस दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई की आज पुष्टि हो जाएगी। भारतीय अर्थव्यवस्था 40 वर्षों में पहली बार भारी मंदी में है। असत्याग्रही इसका दोष ईश्वर को दे रहे हैं।' राहुल गांधी द्वारा जारी किए गए इस वीडियो में कहा कि'बीजेपी की सरकार ने असंगठित अर्थव्यवस्था पर आक्रमण किया है, और आपको गुलाम बनाने की कोशिश की जा रही है। 2008 में जबरदस्त आर्थिक तूफान पूरी दुनिया में आया। अमेरिका, यूरोप के बैंक गिर गए लेकिन इंडिया को कुछ नहीं हुआ। राहुल गांधी ने कहा कि उस वक्त यूपीए की सरकार थी और मैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने गया और पूछा की पूरी दुनिया में आर्थिक नुकसान हुआ है लेकिन इंडिया में क्यों नहीं हुआ? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा राहुल अगर हिंदुस्तान के अर्थव्यवस्था को समझना चाहते हो तो यह समझना होगा कि भारत में दो अर्थव्यवस्था है।

पहली असंगठित अर्थव्यवस्था और दूसरी संगठित अर्थव्यवस्था। संगठित अर्थव्यवस्था में बड़ी कंपनिया आती हैं, वहीं असंगठित अर्थव्यवस्था में किसान, मजदूर, मीडिल दुकानदार इत्यादि आते हैं। राहुल गांधी ने बताया कि मनमोहन सिंह ने उस वक्त बताया कि जिस दिन तक भारत की असंगठित अर्थव्यवस्था मजबूत है, उस दिन तक हिंदुस्तान को कोई भी आर्थिक नुकसान छू नहीं सकता है। इसके अलावा उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में बीजेपी की तीन नीतियों से असंगठित अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा है। इसमें से उन्होंने बताया कि पहला नोटबंदी दूसरा जीएसटी और तीसरा लॉकडाउन है। इसके अलावा उन्होंने कहा, 'प्रधानमंत्री  को सरकार चलाने के लिए मीडिया की जरूरत है, मार्केटिंग की जरूरत है। मीडिया-मार्केटिंग 15-20 लोग करते हैं। इनफॉर्मल सेक्टर में लाखों करोड़ रुपए हैं। इस सेक्टर को तोड़कर ये लोग पैसा लेना चाहते हैं। इसका नतीजा ये होगा कि हिंदुस्तान रोजगार पैदा नहीं कर पाएगा, क्योंकि इनफॉर्मल सेक्टर 90% से ज्यादा रोजगार देता है।'

 

02-07-2020
कैट के अभियान को मिल रहा अच्छा रिस्पॉन्स, भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों ने एक साथ मिलाया हाथ

रायपुर। कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के 10 जून से जारी चीनी सामान के बहिष्कार के राष्ट्रीय अभियान ''भारतीय सामान- हमारा अभिमान'' में किसान, ट्रांसपोर्ट,लघु उद्धयोग, उपभोक्ता आदि वर्ग के लोगों ने समर्थन दिया है। कैट के साथ इस अभियान में जुड़ने वाले महत्वपूर्ण संगठनों में इंडियन सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन, राष्ट्रीय किसान मंच, कंज्यूमर ऑनलाइन फाउंडेशन, ऑल इंडिया ट्रांसपोर्ट वेलफेयर एसोसिएशन , इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज, एमएसएम ईडेवलपमेंट फोरम,ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन, ऑल इंडिया कॉस्मेटिक्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ,नॉर्थ ईस्ट डेवलपमेंट फोरम , वुमन एंटरप्रीनियोर एसोसिएशन ऑफ इंडिया आदि शामिल हैं। इन सभी संगठनों ने संयुक्त रूप से एक मंच के रूप में और अपने स्वयं के क्षेत्रों में चीनी वस्तुओं के बहिष्कार के राष्ट्रीय अभियान का समर्थन और नेतृत्व करने का निर्णय लिया है। विभिन्न वर्गों के नेताओं ने सर्वसम्मति से कहा है कि चीन को जवाब देने के लिए स्थानीय संसाधनों के विकास को बढ़ावा देने के लिए सभी प्रयास किए जाएंगे।

एक स्वर में इसके प्रति प्रतिबद्दता जाहिर करते हुए सभी ने कहा की चीनी वस्तुओं के बहिष्कार और भारतीय वस्तुओं के उपयोग को हम इसे करने और भारत में यह बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसी क्रम में आगे कैट देश भर में अन्य सामाजिक और धार्मिक संगठनों , बुद्धिजीवियों के समूह आदि को भी इस अभियान से जोड़ेगा । कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमर पारवानी ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों  ने चीनी सामान के बहिष्कार के लिए एक साथ हाथ मिलाया है। यह तय किया जा सके कि भारत किसी भी तरह से चीन पर निर्भर न रहे और अपने बल पर ही देश में प्रतिस्पर्धी मूल्य पर गुणवत्ता के सामान के उत्पादन में निर्भर ही सके। देश में पर्याप्त भूमि और कामगार संसाधन और प्रौद्योगिकी बहुतायत में है, जिसका उपयोग देश में भारतीय वस्तुओं के उत्पादन के लिए एक अल्पावधि, मध्यावधि और दीर्घकालिक रणनीतिक नीति के तहत काम किया जाना जरूरी है। कैट इस मुद्दे पर एक ओर व्यापार और उद्योग को प्रेरित करेगा, दूसरी ओर सरकार से भी आवश्यक सहूलियतें प्रदान करने का आग्रह करेगा।

07-06-2020
सरकार के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की गति और सही दिशा निर्धारित करना अत्यधिक चुनौतीपूर्ण : प्रकाशपुंज पांडेय 

भारतीय अर्थव्यवस्था की मंद पड़ी गति पर राजनीतिक विश्लेषक और समाजसेवी प्रकाशपुंज पांडेय ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि, हमारी अर्थव्यवस्था के लिए पहली चुनौती यह है कि देश में इस वक्त बजट घाटा सकल घरेलू आय के प्रतिशत के रूप में काफी बढ़ गया है। खासकर कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण हुए देशव्यापी लॉक डाउन के कारण स्थिति और बिगड़ रही है। साथ ही राजनीति से प्रेरित लोकलुभावन वादों के कारण उस पर अंकुश लगाना कठिन हो रहा है। इस बजट घाटे का असर मुद्रास्फीति पर तो पड़ेगा ही अन्ततोगत्वा बजट को संतुलित करने के लिए जनहित की कई महत्वपूर्ण योजनाएं स्थगित करनी भी पड़ सकती हैं। इसलिए तो केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि मार्च 2021 तक कोई भी नई सरकारी परियोजनाओं का आरंभ नहीं हो सकता। इससे जनसाधारण की क्षमता और आय पर विपरीत प्रभाव पड़ना अवश्यम्भावी है।

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने कहा कि इसलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि सरकार को अनुपयोगी, लोकलुभावन घोषणाओं पर लगाम लगानी चाहिए और बजट को संतुलित करने के लिए ठोस प्रयत्न करने चाहिए। साथ ही अनावश्यक खर्चों पर भी रोक लगानी चाहिए जैसे लॉकडाउन के समय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बात करके भी काम चलाया जा सकता है, वैसे ही आने वाले समय में जहां जरूरी नहीं हो वहां खर्चों पर लगाम लगाना आवश्यक है। प्रकाशपुन्ज पाण्डेय ने कहा कि दूसरी चुनौती केन्द्र और राज्यों में बढ़ते हुए व्यापारिक ऋण की समस्या है। यद्यपि बजट को संतुलित रखने के लिए और व्यापारिक ऋण की हद बांधने के लिए कई प्रस्ताव पारित किए गए हैं, जिनमें से कइयों को कानूनी दर्जा भी दे दिया गया है, फिर भी केन्द्र और राज्यों की सरकारें निरंतर बड़े प्रमाण में बाजार से ऋण ले रही हैं और इसके कारण केन्द्र और राज्य के बजट का बड़ा भाग ब्याज़ चुकाने में ही खर्च हो रहा है। इस पर रोक लगाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को रोजगार उत्सर्जन और आय के साधन तलाश करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। 

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय के नजरिए से तीसरी चुनौती उद्योगों की मंद विकास गति है। केन्द्र और राज्य सरकारें देश और विदेशों से बड़े उद्योगपतियों को बुलाकर उनसे निवेश की अपेक्षा कर रही हैं। 'मेक इन इण्डिया' के तहत बड़े उद्योगों को कई सुविधाएं और प्रलोभन देकर हर राज्य आमंत्रित कर रहा है। अधिकतर बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ और देश के बड़े उद्योगपति भी, भारत में सस्ता उत्पादन कर विदेश में निर्यात करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। परंतु हकीक़त में देश से औद्योगिक निर्यात बहुत कम हो पाया है, क्योंकि विश्वभर में औद्योगिक पदार्थों की मांग कम हो रही है। फलस्वरूप अनेक प्रलोभनों के बाद भी औद्योगिक उत्पादन में आशातीत वृद्धि नहीं हो रही है। इस नीति की दूसरी कमी है कि बहुत कम प्रमाण में रोजगार सृजन किया जा रहा है जो भारत जैसे देश में, जहां दिनोंदिन बढ़ती हुई संख्या में युवा रोजगार की तलाश में है, एक संकट पैदा कर सकता है। स्पष्टत: जब तक छोटे और मझोले उद्योगों को भी उतना ही प्रोत्साहन नहीं दिया जाएगा जितना कि बड़े उद्योगों को मिल रहा है, भारत की अर्थव्यवस्था की यह कमज़ोरी दूर नहीं हो पाएगी।

प्रकाशपुन्ज पाण्डेय के मुताबिक चौथी चुनौती जो सबसे गंभीर है वह कृषि उत्पादन में आया हुआ स्थगन है। पिछले तीन वर्षों में कृषि में दो-तीन प्रतिशत की वृद्धि भी नहीं हो रही है। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है, क्योंकि उनकी आय बढ़ नहीं पा रही है। खेती के उत्पादन में वृद्धि के लिए अब तक किए गए निवेश का पूरा लाभ किसानों को नहीं मिल रहा है। मसलन, सिंचाई पर खर्च की गई रकम के प्रमाण में सिंचित क्षेत्र की वृद्धि नहीं है और जिसे हम सिंचित क्षेत्र कहते हैं, वहां भी सिंचाई के स्रोतों की फसल में पानी देने की क्षमता कम है। इसी प्रकार कृषि प्रौद्योगिकी की उपलब्धियों की बार-बार घोषणा की जाती है परंतु अब तक किसी भी बड़ी फसल में चमत्कारिक वृद्धि नहीं हुई है। छोटे किसानों की बदहाली और बड़ी संख्या में हो रही किसानों की आत्महत्या स्पष्ट करती है कि इस क्षेत्र में हमारी नीतियाँ सफल नहीं हो रही हैं। साथ ही लॉकडाउन के बाद मज़दूरों को जो क्षति हुई है वह किसी से छिपी नहीं है। अब मज़दूर दूसरे राज्यों में पलायन कम से कम 2 से 3 साल तो नहीं ही करेंगे और उनकी रुचि स्थानीय रोज़गार में ज्यादा बढ़ेगी जिसके कारण औद्योगिक विकास की गति पर शत प्रतिशत पर पड़ेगा। यह भी सरकार के लिए एक सोचनीय विषय है। कोरोनोवायरस के संकट के बाद वैश्विक मंदी का मुकाबला करने और सतत आर्थिक विकास करने में हम तभी सक्षम होंगे जब ऊपर बताई गई कमजोरियों को दूर कर सकेंगे।

20-05-2020
कैब एग्रीगेटर कंपनी ओला करेगा कर्मचारियों की छंटनी

नई दिल्ली। कैब एग्रीगेटर ओला ने बुधवार को कहा कि कंपनी 1,400 कर्मचारियों की छंटनी करेगी। रिपोर्ट के अनुसार ओला के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भावेश अग्रवाल ने अपने कर्मचारियों को लिखे एक नोट में यह घोषणा की है। कंपनी का कहना है कि लॉक डाउन के कारण राजस्व में कमी आई है। बेंगलुरु स्थित कंपनी में छंटनी का ऐलान लॉक डाउन के चौथे चरण में प्रवेश करने के बाद किया गया है। जानकारों का कहना है कि लंबे समय तक शटडाउन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर एक विनाशकारी प्रभाव पड़ा है, क्योंकि व्यवसाय लंबे समय से बंद हैं, हालांकि अब सरकार ने छूट देने की घोषणा की है। कई कंपनियों को अपने खर्च को कम करने और कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। कई ने कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी है। इससे पहले स्विग्गी और जोमैटो ने भी अपने कर्मचारियों की छंटनी का ऐलान किया था।

 

10-02-2020
भाजपा ने विपक्ष पर किया हमला, मंदी को लेकर दिए बयान 

नई दिल्ली। भाजपा के सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त ने रविवार को एक जनसभा में गए थे। संबोधन के दौरान देश में मंदी को लेकर कहा कि लोग कुर्ता और धोती छोड़कर कोट और जैकेट पहनने लगे हैं। इसका मतलब है कि देश में मंदी नहीं है। मंदी को लेकर देश-विदेश में भी चर्चाएं हो रही है। दिल्ली और विश्वभर में मंदी के चर्चे हैं। अगर सचमुच मंदी होती तो हम सब यहां कोट और जैकेट नहीं बल्कि धोती कुर्ता पहनकर आते। मंदी होती तो हम इतने अच्छे कपड़े नहीं खरीद सकते थे। आगे कहा कि देश में 6.5 लाख गांव है न कि केवल दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद जैसे शहर। महात्मा गांधी, डॉ हेडगेवर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और जयप्रकाश नारायण ने गांवों पर ही भरोसा जताया और देश को आजाद कराया। 

बता दें कि इससे पहले कांग्रेस व 19 विपक्षी दलों ने 13 जनवरी को केंद्र सरकार पर भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने का आरोप लगाया था। कहा था कि देश में खतरनाक मंदी है क्योंकि अर्थव्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया गया। 

कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने 6 फरवरी को सरकार पर आर्थिक मंदी की आड़ में कुछ पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया। इस दौरान कहा कि आकांक्षी भारत में घृणा फैलाई जा रही है, रोजगार खत्म हो रहे हैं, जीडीपी नीचे गिर रही है और कृषि क्षेत्र में गिरावाट आ रही है। बजट पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि सामाजिक तनाव और आर्थिक विकास एक साथ नहीं चल सकते। 

07-02-2020
भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोरोना के प्रभाव की आशंका : आरबीआई गवर्नर

नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कोरोना से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचने की आशंका जतायी है। इसके साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि मुकाबले के लिए एक योजना बनाने की जरूरत है। कोरोना वायरस का भारतीय अर्थव्यवस्था पर खराब प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल कोरोना का असर कितना गहरा है, यह अभी अनिश्चित है और इसकी परतें खुलना बाकी हैं। चीन और दूसरे देशों पर कोरोना का असर होने से पर्यटन और वैश्विक कारोबार इसकी चपेट में हैं और साथ ही कच्चे तेल के बाजार पर इसका असर पड़ रहा है। कोरोना वायरस के चलते चीन के मिर्च निर्यात पर असर पड़ा है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की मिर्च मंडियों में भाव नीचे आ गए हैं, जिसके चलते किसानों को भारी नुकसान हो रहा है। आगे कहा गया है कि कोरोना वायरस की वजह से जनवरी के अंत तक कच्चे तेल के भाव नीचे आ गए जबकि सोने के भाव में सुधार देखा गया। घरेलू मोर्चे पर आरबीआई का अंदाजा है कि निजी खपत, वैश्विक व्यापार प्रतिबंधों के कमजोर होने और बजट में उठाए कदमों के चलते जीडीपी में तेजी आ सकती है, जबकि कोरोना वायरस आर्थिक गतिविधियों पर असर डाल सकता है।

21-01-2020
कांग्रेस ने कहा, अब इस कुशासन पीड़ित अर्थव्यवस्था को नागरिकता कौन देगा?

रायपुर। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस ने देश की अर्थव्यवस्था के लिए केन्द्र सरकार पर निशाना साधा है। एनआरसी और मोदी सरकार पर कांग्रेस ने ट्वीट किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था को भी इन्होंने घुसपैठिया घोषित करके रजिस्टर से बाहर कर दिया है। अब इस कुशासन पीड़ित अर्थव्यवस्था को नागरिकता कौन देगा? कांग्रेस ने बीजेपी ले डूबी के हैशटैग से यह ट्वीट किया है। इसमें लिखा कि एक बेकार जीएसटी की लागत धोखाधड़ी और चोरी की वजह से 5 ट्रिलियन का नुकसान हुआ। जीडीपी का 2.4 प्रतिशत या जीएसटी राजस्व का 40 प्रतिशत।

24-12-2019
शेयर बाजार में मायूसी, सेंसेक्स 181 अंक फिसला, निफ्टी 48.20 अंक टूटा

मुंबई। शेयर बाजारों में मंगलवार को भी गिरावट दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) की भारतीय अर्थव्यवस्था पर की गई टिप्पणी का असर घरेलू शेयर बाजारों पर पड़ा। आईएमएफ ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था काफी नरम चल रही है। उतार-चढ़ाव भरे कारोबार में 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 181.40 अंक यानी 0.44 प्रतिशत टूटकर 41,461.26 अंक पर बंद हुआ। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 48.20 अंक यानी 0.39 प्रतिशत की गिरावट के साथ 12,214.55 अंक पर आ गया। कारोबार के अंतिम चार घंटे में रिलायंस इंडज्ञस्ट्रीज और एचडीएफसी बैंक तथा एचडीएफसीजैसे प्रमुख शेयरों में बिकवाली से बाजार नीचे आया। विश्लेषकों के अनुसार साल के समाप्त होने के साथ घरेलू तथा वैश्विक बाजारों में निवेशकों की भागीदारी कम होने तथा बृहस्पतिवार को समाप्त हो रहे वायदा एवं विकल्प खंड सौदों को देखते हुए कारोबारी और निवेशक थोड़े सतर्क हैं। बाजार बुधवार को क्रिसमस के मौके पर बंद रहेगा। 

 

09-12-2019
अखिल भारतीय किसान सभा ने किया 8 जनवरी को ग्रामीण भारत बंद का आह्वान

रायपुर। छत्तीसगढ़ किसान सभा ने 8 जनवरी को ग्रामीण भारत बंद का ऐलान किया है। अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव बादल सरोज ने इस संबंध में पत्रकारवार्ता ली। बादल सरोज ने कहा कि हाल के दिनों में भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े सारे संकेतकों ने समूचे देश को चिंता में डाल दिया है। शुतुरमुर्ग की तरह आंखे बंद करके तूफान के टल जाने की उम्मीद की तरह केन्द्र की मोदी सरकार आचरण कर रही है। मैनुफैक्चरिंग की विकास दर का ऋणात्मक हो जाना, नागरिकों की मासिक खपत में करीब 100 रुपयों की कमी आ जाना, बेरोजगारी दर का तेजी से बढ़ जाना और दैनिक उपभोग की चीजों के दाम में लगातार वृद्धि होते जाना, इसी के उदाहरण हैं। रही-सही पोल जीडीपी ने खोल दी है। बादल सरोज ने कहा कि यह गिरावट सरकार द्वारा अपनाई गई देशी-विदेशी कॉपोर्रेट-हितैषी नीतियों का नतीजा है। इन विनाशकारी नीतियों के उलटने के बजाय मोदी सरकार संकट को और अधिक बढ़ाने के उपाय कर रही है। हाल में रिजर्व बैंक के सुरक्षित भंडार में से पौने दो लाख करोड़ रुपए निकालकर ठीक इतनी ही राशि की सौगातें कॉपोर्रेट कंपनियों को दिया जाना इसी मतिभ्रम की नीतियों को आगे बढ़ाने का उदाहरण है। देश की किसान आबादी की हालत और भी अधिक खराब होती जा रही है। करीब 18 करोड़ किसान परिवारों में से 75 प्रतिशत परिवारों की आय मात्र 5000 रुपए मासिक या उससे भी कम है। उस पर खाद, बीज और कीटनाशकों में विदेशी कॉपोर्रेट कंपनियों को मनमर्जी की कीमतें तय करने की छूट देकर और फसल खरीदी के सारे तंत्र को ध्वस्त करके पूरे देश में खेती को अलाभकारी बनाकर रख दिया गया है।

उन्होंने कहा कि खेती-किसानी का संकट अब सिर्फ कृषि संकट नहीं रह गया है, यह समूचे समाज और सभ्यता का संकट बन गया है। सभ्यता के मूल्यों में चौतरफा गिरावट, हिंसा, उन्माद, उत्पीड़न और अवैधानिकताओं को स्वीकृति मिलना इसी के प्रतिबिंबन हैं। लोगों के आक्रोश को भटकाने के लिए सत्ता अब शिक्षा, शिक्षकों और विश्वविद्यालयों, किताबों और बौद्धिकता को अपने हमले का निशाना बना रही है। देश, समाज और सभ्यता को बचाने के लिए जरूरी है कि इन विनाशकारी नीतियों को बदलकर उनकी जगह जनहितैषी और देशहितैषी नीतियों को लाया जाएं।  इसी मांग को लेकर देश भर के लगभग सारे संगठनों के साझे मंच अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने 8 जनवरी 2020 को गांव-हड़ताल का आह्वान किया है। यह हड़ताल इसी दिन हो रही देश भर के श्रमिकों की देशव्यापी हड़ताल की संगति में होगी। छत्तीसगढ़ में इस ग्रामीण बंद-हड़ताल को कामयाब बनाने के लिए छत्तीसगढ़ किसान सभा ने आज संपन्न अपनी दो-दिवसीय बैठक में विस्तृत अभियान की योजना बनाई है। अखिल भारतीय किसान सभा भूमि अधिकार आंदोलन, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन, वन स्वराज अभियान सहित सभी किसान संगठनों के संपर्क में हैं। ये सभी संगठन मिलकर इस अभियान को आगे बढ़ाएंगे।

बादल सरोज ने कहा कि सारकेगुड़ा मामले में  दोषियों को जेल भेजने में देरी क्यों की जा रही है? सारकेगुड़ा जनसंहार की जांच के लिए बनी न्यायिक आयोग की रिपोर्ट आ गई है। अफसोस की बात है कि अभी तक सरकार ने किसी भी दोषी के खिलाफ मामला दर्ज कर उसे जेल नहीं भेजा है। अखिल भारतीय किसान सभा की मांग है कि उस जनसंहार में शामिल सभी के विरुद्ध सोचे-समझे तरीके से हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए। इसी तरह छत्तीसगढ़ की मंडियों और समितियों में धान उत्पादक किसानों की लूट जारी है। उन्हें लंबे समय तक इंतजार ही नहीं कराया जा रहा, बल्कि 40 किलो की बोरी पर 5-5 किलो अतिरिक्त धान की भी जबरिया वसूली की जा रही है। इसे तत्काल रोका जाये। इस मुद्दे पर छत्तीसगढ़ किसान सभा आंदोलन छेड़ रही है। मंडियों, समितियों, तहसीलों और जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन किए जाएंगे। धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों को बोनस दिए जाने पर छत्तीसगढ़ द्वारा उपार्जित चावल को केंद्र सरकार द्वारा न खरीदने की धमकी देना निंदनीय है। इसे वापस लिया जाना चाहिए और राज्य सरकार को बोनस दिए जाने की इजाजत दी जानी चाहिए। किसान सभा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार फसल की सी-2 लागत मूल्य का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिए जाने की मांग दुहराती है।

उन्होंने कहा कि किसान सभा पूरे प्रदेश में खनन और विकास के नाम पर वनाधिकारों को छीने जाने और विस्थापन पर रोक लगाने की मांग करती है और वनाधिकारों की स्थापना के लिए वन भूमि के व्यक्तिगत और सामुदायिक पट्टों को देने की प्रक्रिया को तेज करने की मांग करती है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पेसा कानून और 5वीं अनुसूची के प्रावधानों और भावना के अनुसार वन भूमि पर काबिज किसी भी आदिवासी व कमजोर तबके के लोगों को बेदखल न किया जाए और ग्राम-सभा की राय को सर्वोच्च माना जाए। हसदेव अरण्य और बैलाडीला की पहाड़ियों को अडानी को न देने की घोषणा राज्य सरकार को करनी चाहिए। किसान सभा इन क्षेत्रों में अपने जीवन-अस्तित्व के लिए आदिवासियों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलनों के समर्थन करती है।

29-11-2019
देश की अर्थव्यवस्था बदहाल, 4.5 फीसदी पर पहुंची जीडीपी

नई दिल्ली। वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा है। जुलाई-सितंबर तिमाही में विकास दर 4.5 फीसदी रही। सुस्ती के चलते पहली तिमाही में विकास दर पांच फीसदी रही थी। वित्त मंत्रालय ने शुक्रवार को इन आंकड़ों को जारी किया था। यह छह साल (26 तिमाही) में सबसे कम है। इससे कम 4.3 फीसदी जनवरी-मार्च 2013 में रही थी। जीडीपी ग्रोथ मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की सुस्ती की वजह से ज्यादा प्रभावित हुई। इस सेक्टर की ग्रोथ (-)1 फीसदी रही। पिछले साल सितंबर तिमाही में 4.9 फीसदी थी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि आज जारी हुए जीडीपी के आंकड़े कहीं से भी मंजूर नहीं है। हमें 8-9 फीसदी से बढऩा चाहिए था। जीडीपी में पहली तिमाही के मुकाबले इस बार आधा फीसदी की ज्यादा गिरावट दूसरी तिमाही में हुई है। केवल आर्थिक नीतियों में बदलाव से इसका हल नहीं निकलेगा। मुख्य आर्थिक सलाहकार केवी सुब्रमण्यम ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल काफी मजबूत हैं। तीसरी तिमाही से जीडीपी में फिर से बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।  सर्वे में कहा गया कि रिजर्व बैंक एक बार फिर रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती कर सकता है। तीन से पांच दिसंबर चलने वाली एमपीसी बैठक में रेपो रेट को घटाकर 4.90 फीसदी पर की जा सकती है। सर्वे में शामिल अधिकतर अर्थशास्त्रियों का कहना है कि घरेलू कर्ज की धीमी रफ्तार और कंपनियों के घटते मुनाफे की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था को रफ्तार पकडऩे में समय लगेगा।

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