GLIBS
23-11-2020
धूप न सेकने की वजह से विटामिन डी की कमी का शिकार होते हैं लोग ऊपर से पौष्टिक आहार की कमी, बीमार तो होंगे ही

रायपुर। शहरों में रहनेवाले करीब 80-90 फीसदी लोग विटमिन डी की कमी से होने वाली समस्याओं से जूझ रहे हैं। वजह, अब लोग धूप में ज्यादा नहीं निकलते और न ही पौष्टिक खाना खाते हैं। दिक्कत यह है कि ज्यादातर लोगों को इसकी जानकारी ही नहीं होती या फिर वे जानकर भी इस बात को मानने को तैयार नहीं होते कि धूप न सेंकने की वजह से भी वे बीमार पड़ सकते हैं। विटमिन डी की सबसे बड़ी खासियत है कि यह शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व भी है और हॉर्मोन भी। इतना ही नहीं यह सूर्य से मिलने वाला इकलौता विटमिन भी है। सूर्य के अलावा यह विटमिन बादाम, अंडा, मछली, आदि में मिलता है। शरीर के लिए जरूरी विटमिन डी का 80 प्रतिशत हिस्सा धूप से मिलता है, जबकि डायट से 20 प्रतिशत।

17-10-2020
डब्ल्यूएचओ ने दी जानकारी, मास्क लगाकर व्यायाम न करें

रायपुर/बालोद। कोरोना आपदा काल में संक्रमण से बचाव के लिए पौष्टिक आहार व फिटनेस के प्रति लोग अधिक जागरूक हुए हैं। वहीं अब खेल परिसर, पार्क व जिम भी खुल चुके हैं। लोग अपने फिटनेस को ध्यान में रखते हुए इन जगहों पर व्यायाम के लिए पहुंच रहे हैं। ऐसी जगहों पर भी कोरोना संक्रमण से बचाव के सभी सुरक्षात्मक उपायों का पालन करना आवश्यक है। यह जरूर है कि हम संक्रमण से बचाव की सही जानकारी रखें, क्योंकि जानकारी के अभाव में सुरक्षात्मक उपायों जैसे मास्क के इस्तेमाल को लेकर अब भी भ्रम की स्थिति भी बनी हुई है। हमें उन गतिविधियों के बारे में भी जानना चाहिए जब हमें मास्क नहीं लगाना है। वहीं कहां पर मास्क लगाना जरूरी है इसकी भी जानकारी होनी चाहिए।

व्यायाम के समय मास्क लगाना नहीं है जरूरी :
शासकीय आयुर्वेदिक कॉलेज रायपुर की योग प्रशिक्षक डॉ सुनीता जैन बताती हैं विश्व स्वास्थ्य संगठन ने व्यायाम के दौरान मास्क लगाने को लेकर साफ तौर पर मना किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है मास्क लगाकर व्यायाम करने से श्वसन प्रक्रिया पर भार पड़ता है और सांस लेने में अधिक जोर लगाना होता है। साथ ही व्यायाम के दौरान बहने वाले पसीने के कारण मास्क के भींग जाने पर उसमें सूक्ष्मजीव पनपने की संभावना अधिक होती है और यह संक्रमण के जोखिम को बढ़ाता है। व्यायाम के दौरान भी 6 गज की दूरी रखने के नियम का पालन करना आवश्यक है। यह भी कहा है कि बच्चों को भी शारीरिक गतिविधियों जैसे दौड़ने व खेलने के दौरान मास्क नहीं पहनना चाहिए। उन्हें संक्रमण से जुड़ी अन्य सुरक्षा के उपायों की जानकारी देते हुए नियमित हाथ धोने व शारीरिक दूरी के नियमों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। योग प्रशिक्षक डॉ जैन ने बताया व्यायाम व योग करते समय कमरे में हवादार खिड़कियां आमने सामने होनी चाहिए। ताकि कमरे से हवा का आना जाना लगा रहे। व्यायाम करते समय खुले और एकांत स्थान में करने से संक्रमण का खतरा कम रहता है। अकेले रहने पर मास्क लगाने की जरुरत नहीं है।

शरीर में ऑक्सीजन की हो जाती है कमी :
जिला अस्पताल बालोद के सिविल सर्जन डॉ. बीएल रात्रे का कहना है मास्क लगाकर भारी भरकम एक्सरसाइज नहीं करने की सलाह देते हैं। इससे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम पहुंचती है। फेफड़ों पर दबाव बढ़ता है तथा शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड निकलने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। खून में ऑक्सीजन की कमी से चक्कर आना, बेहोश होना, सिर व फेफड़ों के हिस्सों में दर्द की शिकायत हो सकती है। डॉ. रात्रे ने कहा मास्क का इस्तेमाल बाजार हाट व यात्रा आदि के दौरान किया जाना सही है। या उन जगहों पर जहां श्वसन प्रक्रिया पर कोई दबाव नहीं पड़ रहा हो और सांस लेने में आप सामान्य महसूस कर रहे हों।

इन उपायों का कर सकते हैं इस्तेमाल:
जिम में भारी भरकम व्यायाम के समय मास्क नहीं लगाए। व्यायाम के समय शारीरिक दूरी का पालन करें। खेल परिसर में खेलते समय या पार्क में जॉगिंग या वॉक के समय मास्क को चेहरे से हटा लें। लेकिन किसी अन्य से बात करते समय नाक व मुंह अवश्य ढंके। लॉकडाउन के बाद फिर से जिम जा रहे तो शुरुआत हल्के व्यायाम से करें।साइकलिंग, जॉगिंग, रनिंग, वॉकिंग, बैडमिंडन, बास्केटबॉल, फुटबॉल, टेनिस या वैसे सभी प्रकार के खेल जिसमें दौड़ने की जरूरत होती है, के दौरान ध्यान रखें कि मांसपेशियों में खिंचाव नहीं हो। सार्वजनिक स्वीमिंग पूल में जाने से बचें। ऐसी जगहों पर व्यायाम करें जहां अधिक भीड़ नहीं होती है।

02-10-2020
कलेक्टर ने किया आंगनबाड़ी केंद्रों का निरीक्षण,पौष्टिक आहार की ली जानकारी

बीजापुर। कलेक्टर रितेश कुमार अग्रवाल ने ग्राम पंचायत इटपाल अन्तर्गत माँझी गुड़ा,नयापारा, एवं मदारपारा आंगनबाड़ी केंद्रों का औचक निरीक्षण किया। केन्द्रों में संचालित हो रहे विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन का जायजा लेते हुए कार्यकर्ता एवं सुपरवाइजर से मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान द्वारा दी जाने वाली गरम भोजन,अतिरिक्त पौष्टिक आहार चिकी,बिस्किट के वितरण के बारे में जानकारी ली। लाभान्वित होने वाले हितग्राहियों,एनीमिक महिलाओं एवं बच्चों का सम्मान भी किया। कार्यकर्ता एवं सुपरवाइजर को शासन के योजनाओं का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन कर हितग्राहियों को लाभ पहुंचाने के लिए कहा। कलेक्टर ने नयापारा आंगनबाड़ी केंद्र में एनीमिक महिलाओं से बातचीत कर स्वास्थ्य संबंधी हालचाल पूछा। निरीक्षण के दौरान उपस्थित जिला कार्यक्रम अधिकारी को दिशा निर्देश दिए।

 

15-09-2020
घर में ही मौजूद है पोषण के सारे आहार, गृह भ्रमण और बैठकों के माध्यम से दी जा रही जानकारी

रायपुर। प्रदेश में महिला एवं बाल विकास विभाग के द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय पोषण माह के तहत शिशुवती माताओं को पौष्टिक आहार के साथ-साथ पौष्टिक आहार बनाने की सीख भी मिल रही है । साथ ही गर्भवती महिलाओं को गर्भ में पल रहे शिशु की उचित देखभाल के साथ स्वस्थ शिशु के लिए किन पौष्टिक आहार का उपयोग करना है के बारे में भी गृह भ्रमण और बैठकों के माध्यम से जानकारी दी जा रही है। इसी कड़ी में विकाखण्ड अभनपुर के सेक्टर तोरला की ग्राम पंचायत टीला में आंगनबाड़ी क्रमांक 1 से 4 तक में कई गतिविधियों का आयोजन किया गया।  इस दौरान शिशुवती माता जानकी निराला कहती हैं, मुनगा फली हमारे घर के आंगन और खेत में लगी हुई है लेकिन उसके महत्व के बारे में हमें नहीं पता था । ग्राम में चल रहे राष्ट्रीय पोषण माह के दौरान पौष्टिक आहार की जानकारी आंगनबाड़ी दीदी से मिली। दीदी ने बताया इसकी पत्तियों में प्रोटीन विटामिन बी 6, विटामिन सी, विटामिन ए, विटामिन ई, आयरन, मैग्नीशियम पोटेशियम, जिंक जैसे तत्व पाये जाते हैं। इसकी फली में विटामिन ई और मुनगा की पत्ती में कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। मुनगा में एंटी ओग्सिडेंट बायोएक्टिव प्लांट कंपाउंड होते हैं। यह पत्तियां प्रोटीन का भी अच्छा स्रोत है। एक कप पानी में 2 ग्राम प्रोटीन होता है। यह प्रोटीन किसी भी प्रकार से मांसाहारी स्रोत से मिले प्रोटीन से कम नहीं है क्योंकि इसमें सभी आवश्यक एमिनों एसिड पाए जाते हैं। जो हमारे शरीर को स्वस्थ रखने में मददगार होते हैं ।

वहीं 6 माह की गर्भवती सुजाता कहती हैं कि गृह भेंट के दौरान आंगनबाड़ी और मितानिन दीदी ने बताया कि गर्भवती महिलाओं और उनके बच्चे के लिए मुनगा भाजी कितना लाभकारी है। बच्चा हो जाने के उपरांत दूध पिलाने वाली मां के लिए भी मुनगा भाजी अमृत के समान है । दीदी ने बताया मुनगा की पत्ती को घी में गर्म करके प्रसूता स्त्री को दिए जाने का पुराना रिवाज है। इससे दूध की कमीं नहीं होती और जन्म के बाद भी कमजोरी और थकान का भी निवारण होता है। साथ ही बच्चा भी स्वस्थ रहता है और वजन भी बढ़ता है। मुनगा में पाये जाने वाला पर्याप्त कैल्शियम किसी भी अन्य कैल्शियम पूरक से कई गुना अच्छा है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता करुणा सोनी ने बताया विभाग द्वारा विभिन्न गतिविधियां का आयोजित किया जा रहा है। ग्राम में सुपोषण के बारे में जागरूकता लाने के लिए स्कूली बच्चों के सहयोग से चित्रकारी, स्लोगन तथा रंगोली द्वारा संदेश बनवाये गये और व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से भी पोषण से संबंधित जागरूकता संदेश दिए जा रहे हैं। 

ग्राम में सुपोषण चौपाल कृषक बैठक का भी आयोजन किया जा रहा है। सुपोषण चौपाल में पौष्टिक आहार से संबंधित जानकारियां दी जा रही है। सुपोषण से संबंधित इन रचनात्मक गतिविधियों के द्वारा महिलाओं तथा बच्चों मे सुपोषण के बारे मे जागरूकता लाई जा रही है। ऐसी बैठकों के माध्यम से ग्राम पंचायत द्वारा मुनगा, केला, आम और सब्जी भाजी के पेड़ एवं बीजों का वितरण भी किया जा रहा है। चौपाल और कृषक बैठक के माध्यम से जैविक खेती को बढ़ावा, शारीरिक दूरी अपनाकर कृषि कार्यों के साथ-साथ हाथ को अच्छे से धोना । जगह-जगह गुटका खा कर थूकने से होने वाले दुष्परिणामों के बारे में भी जागरूक किया जा रहा है ।कोरोना महामारी के इस दौर मे कोविड-19 के संबंधित गाइड लाइन का पालन कर सभी गतिविधियां सम्पन्न की जा रही है। सुपोषण के बारे मे जागरूकता लाने तथा बच्चों, महिलाओं को कुपोषण से बचाने के चित्रकारी, सुपोषण से संबंधित स्लोगन तथा रचनात्मक चित्रकारी को बच्चों के साथ बड़े भी रूचि लेकर सुपोषण का महत्व समझ रहे हैं। बच्चों तथा महिलाओं को कुपोषण से मुक्ति दिलाने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा घर-घर जाकर पौष्टिक आहार “रेडी टू ईट” का वितरण किया भी किया जा रहा है।

11-09-2020
सुपोषण का महत्व समझाने दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में पहुंच रहे पोषण रथ

रायपुर। जागरुकता और सही पोषण के प्रति जानकारी के अभाव के कारण कुपोषण एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। इसके प्रति जनजागरुकता के लिए राष्ट्रीय पोषण माह 2020 का आयोजन किया जा रहा है। इस माह के दौरान छत्तीसगढ़ में पोषण रथ गांव-गांव पहुंचकर लोगों को सुपोषण का महत्व समझाा रहे हैं। रायपुर,बालोद सहित दंतेवाड़ा,बलरामपुर,कोरबा जैसे दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में ये रथ ऑडियो के माध्यम से पोषण और स्वच्छता का संदेश पहुंचा रहे हैं। पोषण रथ के माध्यम से राज्य शासन की सुपोषण संबंधी योजनाओं और महत्वपूर्ण जानकारियों का प्रचार किया जा रहा है। पोषण रथ से बच्चे के पहले 1 हजार दिवस में सही पोषण के महत्व का संदेश गांव-गांव में समझाया जा रहा है। इस दौरान एनिमिया, डायरिया, स्वच्छता तथा पौष्टिक आहार, साफ-सफाई पर आधारित संदेशों का भी प्रचार किया जा रहा है।

04-09-2020
मां को मिल रही पौष्टिक आहार बनाने की सीख, कुपोषित शिशुओं को मिल रहा पौष्टिक आहार

रायपुर। जिले में कुपोषित शिशुओं को चिन्हित कर पोषण पुनर्वास केंद्र के माध्यम से मां को पौष्टिक आहार बनाने और बच्चों को समय समय पर भोजन करवाने की सीख के साथ बच्चे को कुपोषण मुक्त करने का कार्य किया जा रहा है। जिले में संचालित दो पोषण पुनर्वास केंद्रों में गैर कोविड गतिविधियों संचालित किया जा रहा है। पोषण पुनर्वास केंद्र, जिला अस्पताल कालीबाड़ी में किलकारी करते 9 माह के संजय (बदला हुआ नाम) और 2 वर्ष की सुनीता (बदला हुआ नाम) के माता पिता खुश है कि उनके बच्चे खाना खाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। संजय की मां बताती हैं उनका बच्चा कुछ नहीं खाता था, जबरदस्ती खिलाओ तो रोने लगता और कमजोर होता जा रहा था। जब उसका वजन कराया गया तो वजन और आयु के अनुसार उसका वजन सामान्य से कम निकला। 26 अगस्त को जब हम पोषण पुनर्वास केंद्र में आए तब हमारे बच्चे का फिर से वजन लिया गया तब उसका का वजन 5.7 किलोग्राम निकला । नियमित रूप और नियमित अंतराल से मिले पोषण आहार के कारण 3 सितंबर को 5.96 किलोग्राम वजन हो गया है ।

ऐसी ही कुछ कहानी सुनीता की भी है। बच्ची 2 वर्ष की है लेकिन वज़न और ऊंचाई के अनुसार उसका वजन सामान्य से कम है । सुनीता का स्वभाव चिड़चिड़ा और खाना खाने की इच्छा बिल्कुल नहीं होती है। सुनीता की मां बताती है सुनीता को कुछ भी खाने को दो तो नहीं खाती थी। जब हम 26 अगस्त को यहाँ आये तब इसका का वजन 8.2 किलोग्राम था जो अब 3 सितंबर को बढ़कर 8.64 किलोग्राम हो गया है। बच्चों की माताओं ने बताया यहां पर जिस तरह से भोजन दिया जाता है वह भोजन हम घर पर भी बना सकते हैं लेकिन उनको इसकी जानकारी नहीं थी। साथ ही वह लोग यह समझते थे कि बच्चे एक बार में ही पूरा खाना खा लेते हैं लेकिन ऐसा नही है। यहां आकर पता चला बच्चों को नियमित अंतराल से थोड़ा थोड़ा भोजन खिलाने से बच्चों को लाभ होता है । एक साथ भोजन खिला देने से बच्चा भोजन नहीं पचा पाता है और या तो वह उस भोजन को बाहर निकाल देता है या उसकी तबीयत खराब हो जाती है ।
डाइटिशियन पूनम कहती हैं एडमिशन के समय बच्चों को हल्की सर्दी और बुखार भी होता है । कुपोषण में अक्सर ऐसी शिकायत हो जाती है । 

एडमिशन के बाद शिशु का उपचार शुरू किया । उपचारात्मक डाईट एफ-75 और एफ-100 कहलाती है । ज़्यादातर उपचारात्मक डाईट एफ-75 से खान-पान कराना शुरू किया जाता। दो से तीन घंटे में थोड़ी-थोड़ी डाइट बच्चे को दी जाती है । इसमें विशेष रुप से खिचड़ी हलवा, दलिया दिया जाता है । साथ ही डिस्चार्ज के समय यह भी ध्यान रखा जाता है एडमिशन के समय और डिस्चार्ज के बीच में कुपोषित बच्चे के वज़न में  15 प्रतिशत की वृद्धि हुई या नही हुई है । यदि नहीं हुई होती है तो उसको 1 सप्ताह के लिए और एडमिट रखा जाता है । कभी-कभी एक माह तक भी एडमिट रखा जाता है । ऐसी स्थिति में जो व्यक्ति (बच्चे की मॉ ) को कार्य क्षतिपूर्ति के रूप में 15 दिन का 150 रुपये प्रतिदिन दिया जाता है । पोषण पुनर्वास केंद्र से डिस्चार्ज होने के पूर्व मां को घर पर बनने वाले पौष्टिक आहार की जानकारी भी विशेष रुप से दी जाती है । साथ ही माता को भी पौष्टिक आहार कैसे बनाया जाए और खाया जाए पर भी बताया जाता है । डाइटिशियन पूनम का कहना है बच्चों की माताओं को पता ही नहीं होता है कि उनका बच्चा कुपोषित है या हो रहा है । आंगनबाड़ी या मितानिन के माध्यम से उनको जानकारी मिलती है कि उनका बच्चा कुपोषित है । हमारे कार्यकर्ता भी बच्चों के खानपान के बारे में बताते हैं ।कुपोषित बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रो, मितानिनों  या शिशु संरक्षण माह के दौरान चिन्हित और अस्पतालों के माध्यम से चिन्हित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंन्द्र भेजा जाता है। 

उपचार और निःशुल्क दवाईयां मिलती है
शिशुओं के शारीरिक विकास के थैरेपिक फूड और दूध, खिचड़ी, हलवा दलिया दिया जाता है। यहां विशेंष रूप से चिकित्सकीय देख रेख में नियमित स्वास्थ्य जांच की जाती है। साथ ही कुपोषण का उपचार एवं निःशुल्क दवाईयां भी दी जाती है।

क्या है कुपोषण 
शरीर को लंबे समय तक संतुलित आहार नहीं मिलना कुपोषण कहलाता है। शरीर बीमारियों का शिकार होने लग जाता है। स्त्रियों और बच्चों में यह रोग अधिक देखने को मिलता है । कुपोषित बच्चों को दो प्रकार से नापते हैं। बच्चों को वजन और आयु, वजन और लम्बाई के अनुसार कुपोषण निर्धारित किया जाता  है ।

कैसे पहचाने कुपोषण 
थकान का रहना, मांसपेशियां मेंढीलापन, चिड़चिड़ापन, बालों में सूखापन, चेहरे पर चमक की कमी होना, शरीर में सूजन, आंखों के चारों तरफ कालापन होना, हाथ पैरों का पतला होना, किसी भी काम करने में मन नालगना, शारीरिक विकास में कमी, नींद का ज़्यादा आना कुपोषण के लक्षण है।

कोविड महामारी से बचाने में किया जा रहा दिशा- निर्देशों का पालन 
कोविड महामारी के दौरान भी खुले हैं पोषण पुनर्वास केंद्र में संक्रमण को रोकने के लिए दिए निर्देश का पालन किया जा रहा है । कुपोषण से ग्रस्त बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण कोरोना महामारी के समय उन्हें देखभाल की अत्यंत आवश्यक है। साथ ही माताओं को कुपोषित बच्चों के खान-पान व साफ़-सफाई से सम्बंधित ज़रूरी संदेश भी दिए जा रहे हैं। उचित चिकित्सीय देखरेख को सुनिश्चित करने के निर्देश का पालन भी किया जा रहा हैं।

एनएफएचएस- 4 के अनुसार
एनएफएचएस-4 (2015-16) के अनुसार रायपुर में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे जो कम वजन वाले हैं (वजन-आयु) शहरी क्षेत्र में 32.4 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्र में 39.8 प्रतिशत है वहीं ज़िले में कुल 37.4प्रतिशत है ।

07-07-2020
वन ग्राम लोहझर के कुपोषित बच्चे हुए सामान्य,मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान का असर दिखने लगा

रायपुर/गरियाबंद। मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान अंतर्गत मिले पौष्टिक आहार, बिस्कीट, सोया,चिकी और देवभोग ‘घी‘ का असर साफ दिखने लगा है। आज से छः माह पहले इस केन्द्र में 1 गंभीर कुपोषित और 2 मध्यम कुपोषित बच्चे दर्ज थे। सतत निगरानी,आंगनबाड़ी कार्यकर्ता तथा पर्यवेक्षक के मेहनत से तीन माह में ही सभी बच्चे सामान्य श्रेणी में आ गए है। छुरा परियोजना के सेक्टर सोरिद अंतर्गत वंनाचल क्षेत्र में स्थित ग्राम वन लोहझर-02 (करपीदादर) आंगनबाड़ी केंद्र का यह प्रयास रंग लाया है। सेक्टर की पर्यवेक्षक खिलेश्वरी साहू बताती है कि इस केन्द्र में छः माह से तीन वर्ष के कुल 14 बच्चे और तीन से छः वर्ष के कुल 15 बच्चे दर्ज है।

इस केंद्र में तीन कुपोषित बच्चों खुमेश कुमार,संजय और राजलक्ष्मी को सामान्य श्रेणी में लाने के लिए उच्च अधिकारियों के मार्गदर्शन में हम सब एक टीम की तरह एक जुट हुए और लगातार इन बच्चों पर केन्द्रित होकर कार्य करते रहे। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और मितानिन के द्वारा बच्चों के घर जाकर लगातार सम्पर्क किया गया एवं बच्चों की देखभाल,साफ-सफाई, स्वच्छता, स्वास्थ्य आदि के बारे में प्रदर्शन और समझाइश दी गई। इससे  बच्चों के स्वास्थ्य में काफी सुधार देखा गया और वे पूरी तरह कुपोषण से मुक्त हो गए। उन्होंने बताया कि इसके अलावा आंगनबाड़ी केन्द्रों में बच्चों को विभिन्न गतिविधियों के द्वारा शिक्षा भी दिया जा रहा है। इससे उनके शरीरिक और मानसिक विकास होता है। जिले के सभी आंगनबाड़ी केन्द्रों में मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान अंतर्गत पौष्टिक आहार प्रदाय किया जा रहा है। इससे कुपोषित बच्चे तेजी से सामान्य हो रहे है। कोविड-19 के कारण बच्चों को उनके घर पर ही पौष्टिक आहार पहुंचा के दिया जा रहा है। साथ ही गर्भवती और शिशुवती माताओं को भी पौष्टिक आहार घरों तक पहुंचाकर दिया जा रहा है। ऐसे समय में मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान की सार्थकता साबित हो रही है।

 

09-06-2020
पोषण पुनर्वास केंद्र में मिल रही कुपोषित बच्चों को तंदुरुस्त बनाने की सीख

रायपुर। लॉक डाउन के बाद शुरु हुई गैर कोविड-19 गतिविधियों के अंतर्गत पोषण पुनर्वास केंद्र में बैठे 16-माह के लकी (बदला हुआ नाम) के माता और पता आज बहुत खुश है। उनकी ख़ुशी का कारण उनका बेटा है जिसका वज़न अब बढकर 7.4 किलो हुआ है|लकी पोषण पुनर्वास केंन्द्र में आने से पूर्व कुपोषण का शिकार था । उसका वज़न केवल 6.6 किलो था और वह सुस्त और चिड़चिड़ा था। केंन्द्र में 15 दिन नियमित पोषण आहार के खान-पान, चिकित्सकीय जांच से लकी स्वस्थ्य हुआ है।रायपुर के जिला अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र की डाइटिशियन पूनम बताती है 20 मई को भर्ती होने के बाद से ही लकी का उपचार शुरू किया। हमने उसे उपचारात्मक डाइट एफ-75 से खान-पान कराना शुरू किया। हर दो घंटे में बच्चे को थोडा-थोडा खाना दिया गया,जिसमें खिचड़ी,हलवा,और दलिया शामिल है। पोषण पुनर्वास केंन्द्र में देखरेख के साथ चिकित्सकों द्वारा प्रतिदिन स्वास्थ्य जांच करने के साथ ही उपचार भी किया जाता रहा। यह सब निशुल्क दिया जाता है।’वर्तमान में पोषण पुनर्वास केंद्र में आने वाले लोगों और कुपोषित बच्चों को कोविड-19 के संक्रमण से बचने से रोकथाम और बचाव के बारे में भी जागरूक किया जा रहा है ।

पोषण पुनर्वास केंद्र से डिस्चार्ज होने के पूर्व,बच्चे की मां को घर पर बनने वाले पौष्टिक आहार की जानकारी दी जाती है और पौष्टिक आहार बनाना सिखाया जाता है। पूनम का कहना है शुरुआत में माता के अंदर बहुत ज्यादा झिझक रहती है उससे बात कर के धीरे-धीरे झिझक को तोड़ा जाता है। माता और पिता के मानसिक तनाव को भी कम किया जाता है। धीरे-धीरे उनसे दोस्ती करके उनको स्वस्थ परिवारिक जीवन शैली के बारे में भी बताया जाता है।आमतौर पर कुपोषित बच्चों को 15 दिन तक पुनर्वास केंद्र में रखा जाता है। अगर बच्चे का वज़न 15 प्रतिशत तक बढ जाए तो बच्चे को घर भेजा जाता है वरना 10 दिन तक और रखा जाता है। कभी कभी तो एक महीने तक भी रखा जा सकता है।मितानिन और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को कुपोषित बच्चों की पहचान करने की ट्रेनिंग दी जाती है और वह समुदाय से ऐसे बच्चों को पुनर्वास केंद्र तक भेजते हैं।

घर भेजे जाने के बाद भी इन्ही के माध्यम से स्वस्थ हुए बच्चों की जानकारी भी नियमित रूप से ली जाती है।लकी की मॉ रूकमणी (बदला हुआ नाम) ने बताया वह बेटे के स्वास्थ्य को लेकर काफी चिंतित थी। स्वास्थ्य जॉच के लियें निजी अस्पताल भी गये थे लेकिन कोई सही परामर्श नहीं मिला। निरंतर वजन में कमी के साथ शारीरिक रूप से कमजोरी स्पष्ट झलक रही थी। इसी बीच पारा की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कम्लेश्वरी साहू ने पोषण पुनर्वास केंद्र के बारे में बताया। आंगनवाडी कार्यकर्ता ने बताया पोषण पुनर्वास केंद्र में बच्चों के साथ माताओं के लिए ठहरने एवं भोजन की व्यवस्था की गई थी। इस दौरान रुकमनी को रूपये 150 प्रति दिन के दर से दिए जाते हैं।कमलेश्वरी दीदी के कहने पर ही हम बच्चे को केंद्र पर लाये। अब उसकी सेहत में काफी सुधार हुआ है। कोविड महामारी के दौरान अब पोषण पुनर्वास केंद्र में संक्रमण को रोकने के लिए दिए निर्देश का पालन किया जा रहा है । कुपोषण से ग्रस्त बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण कोरोना महामारी के समय उन्हें देखभाल की अत्यंत आवश्यक है।

01-06-2020
ग्रामीण क्षेत्रों में बने क्वारंटाइन सेंटर्स में दिया जा रहा है भाजी-भात

रायपुर/बिलासपुर। पंचायतों में बने क्वारंटाइन सेंटर्स में इन दिनों लोगों का खास ख्याल रखा जा रहा है। उन्हें पौष्टिक आहार दिए जा रहे है। इससे संक्रमण के खतरे से बचने में सहुलियत हो। ग्रामीण क्षेत्रों में सदियों से भाजी को पौष्टिक आहार माना जाता है। यही कारण है कि पंचायतों ने अब क्वारंटाइन सेंटर में रूके मजदूरों को भाजी भात खिलाना शुरू कर दिया है, जिससे बाहर से आए उनके लोग बीमार ना हो। उल्लेखनीय है कि प्रदेश की चेंच भाजी, चौलाई भाजी आदि को रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला माना जाता है। इस हिसाब से ग्रामीणों का लोकल तरीका कोरोना से लड़ने में बेहद कारगर माना जा रहा है।

25-05-2020
क्वारेंटाइन गर्भवती महिलाओं और शिशुवती माताओं और बच्चों के लिए खास व्यवस्था

कवर्धा। कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी संक्रमण के दौरान संपूर्ण देश में चौथे चरण का लॉकडाउन हैं। प्रवासी मजदूरों और दूसरे राज्यों में फंसे हुए लोगों को उनके गृह ग्राम तक  पहुंचाने का कार्य किया जा रहा है। कोरोना वायरस के संक्रमण के संचरण की संभावना को रोकने के लिए बाहर से आए हुए लोगों को ऐसे समय में क्वारेंटाइन सेंटर में रखने की सलाह दी जा रही है। जिले के क्वारेंटाइन सेंटर में रहने वाली महिलाओं (शिशुवती एवं गर्भवती) के खानपान पर विशेष ध्यान देते हुए कवर्धा जिला प्रशासन की ओर से पौष्टिक आहार किट दिया जा रहा है।

कबीरधाम जिले के क्वारेंटाइन सेंटर में रहने वाले सभी को सामान्य भोजन तो दिया जा रहा है और उनके स्वास्थ्य की देखभाल भी की जा रही है। शासन के निर्देश पर जिला प्रशासन कवर्धा एवं स्वास्थ्य विभाग कवर्धा की ओर से सभी क्वारेंटाइन सेंटरों की निरीक्षण कर वहां ऐसी महिलाओं को चिन्हांकित किया गया। इसके बाद विशेष आहार किट उनको दिए जाने का फैसला लिया गया। रविवार से इसकी शुरूआत कवर्धा ब्लॉक के ग्राम पंचायत दशरंपुर और गुड़ा से कर दी गई है। साथ ही गर्भवतियों की विशेष देखभाल करने संबंधित ग्राम पंचायत क्षेत्र में कार्यरत स्वास्थ्य कार्यकर्ता एवं मितानिनों को जिम्मेदारी दी गई है।

पौष्टिक आहार किट है खास

जिला कार्यक्रम अधिकारी नीलू धृतलहरे के मुताबिक सभी क्वारेंटाइन सेंटर के गर्भवती महिलाओं की सूची तैयार की गई है, जिसके बाद काफी संख्या में महिलाओं के गर्भवती होने की जानकारी मिली है। उन महिलाओं को विशेष किट प्रदान किया जा रहा है। “पौष्टिक आहार किट” में मूंगफली दाना, गुड़ पापड़ी, चना, प्रोटीन पाउडर, दूध पाउडर, खजूर हैं। इसके अलावा होने वाले बच्चे के लिए भी एक जोड़ी कपड़ा दिया जा रहा है।

15-05-2020
महिलाओं की आय का जरिया बना रेडी-टू-ईट

रायपुर/राजनांदगांव।  सुपोषण की इस राह से सरकार ने महिला समूहों को जोड़कर उनके लिए स्वालंबन का नया आधार तैयार किया है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पहल पर बच्चों और महिलाओं को पौष्टिक आहार और टेक होम राशन के रूप में रेडी-टू-इट उपलब्ध कराकर उन्हें कुपोषण मुक्त रखने का प्रयास लगातार किया जा रहा है। स्व-सहायता समूह की महिलाएं रेडी-टू-ईट बनाकर आंगनबाड़ी में सप्लाई का कार्य निर्बाध रूप कर रही हैं। इससे महिलाओं और बच्चों में कुपोषण मुक्ति के साथ महिलाओं की समृद्धि की नई राह खुली है। सरकार की ओर से सुपोषण और महिला स्वालंबन की एक राह करने से दोहरा लाभ महिलाओं और बच्चों को मिल रहा है।  राजनांदगांव जिले के ग्राम खुटेरी विकासखण्ड में भी जय माँ दुर्गा स्व सहायता समूह की महिलाएं रेडी-टू-ईट निर्माण का कार्य निर्बाध रूप से कर रही हैं। समूह में कुल 14 महिलाएं है, जिनकी ओर से प्रति माह 35 क्विंटल रेडी-टू-ईट का निर्माण किया जाता है।

प्रति किलो 42 रूपए की दर से 35 क्विंटल के निर्माण पर 1 लाख 47 हजार रूपए की लागत आती है। सप्लाई के एवज में 50 रूपए की दर से 1 लाख 75 हजार रूपए का भुगतान प्राप्त होता है। इस प्रकार उन्हें प्रतिमाह 28 हजार की शुद्ध आय प्राप्त होती है। महिलाएं माह में करीब 15 दिन तक रेडी-टू-ईट निर्माण का कार्य करती हैं। शेष समय महिलाएं खेती,पारिवारिक कार्य या मजदूरी करती हैं।राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत के समूह को आर्थिक सहायता के रूप में 15 हजार रूपए की चक्रीय निधि की अनुदान राशि,1 लाख 60 हजार रूपए की सीआईएफ राशि और 2 लाख 10 हजार रूपए न्यूनतम ब्याज दर पर बैंक लोन दिलाया गया ताकि समूह के पास पर्याप्त राशि उपलब्ध रहे।

समूह से प्रति माह लगभग 35 क्विंटल रेडी-टू-ईट का निर्माण किया जाता है। रेडी-टू-ईट के निर्माण में 42 रूपए प्रति किलो की लागत आती है। महिलाएं निर्माण सामग्री जैसे अनाज, तेल, नमक, गुड़ सभी बाजार से थोक रेट में खरीदती हैं। समूह द्वारा रेडी-टू-ईट निर्माण में साफ-सफाई का विशेष ध्यान दिया जाता है,इसके लिए सभी सदस्यों की जिम्मेदारी तय होती है। एन.आर.एल.एम. योजना के आधिकारियों की पर से भी नियमित अंतराल में समूह की गतिविधियों और आय व्यय का निरीक्षण कर आवश्यक सुझाव दिया जाता है। यह समूह के सुव्यवस्थित संचालन और मजबूत आर्थिक आधार को प्रदर्शित करता है।

 

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