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27-08-2018
Assembly Election : पांच सीटों पर चुनाव लड़ेगी माकपा, गठबंधन से नहीं है एतराज

रायपुर। प्रदेश में 2018 में होनी वाले विधानसभा चुनाव के लिए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी प्रदेश के पांच सीटों में अपने दावेदार पेश करेगी। इससे पहले पार्टी केवल दो से तीन सीटों में ही अपने चुनाव लडती आ रही है। वहीं इस बार अपना पैर पसारते हुए पार्टी सीटों पर बढ़ोत्तरी करते हुए पांच सीटों से चुनाव लड़ने की तैयारी में है।

जन आधार नहीं होने से केवल पांच सीटों पर लड़ेगी चुनाव

90 सीट से चुनाव ना लड़ने के विषय में पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते ने कहा है कि हमारे पास अधिक जन आधार नहीं है इसलिए हम पुरे 90 सीटों से चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं, लेकिन इन पांच सीटों के आलवा जो भी पार्टी काबिल होगा और भाजपा के विरुद्ध हमारी लड़ाई लड़ सकेगा उसे हम उस क्षेत्र में अपना समर्थन देंगे। इस बार हम केवल उन्ही सीटों पर चुनाव लड़ने लड़ रहे हैं, जहां पर हमारे लोगों की अधिकता है।

केवल पांच सीटों में प्रत्याशी उतारकर भाजपा को सत्ता से हटाएगी माकपा!

वैसे तो माकपा केवल पांच सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है, लेकिन माकपा का कहना है कि हम भाजपा मुक्त छत्तीसगढ़ देखना चाहती है, इसलिए कांग्रेस और बसपा के प्रत्यशियों को अन्य सीटों पर अपना समर्थन देंगे और अपने तौर पर पूरी तरह से सुनिश्चित करेंगे कि जीत केवल हमारे प्रत्याशियों की ही हो।

माकपा की होगी ये चुनावी रणनीति

चुनावी रणनीति के विषय में संजय पराते ने कहा कि चुनाव को लेकर हमारी बहुत ही स्पष्ट रणनीति है। हम अपनी वाम पंथी लोगों को एक जुट करेंगे और जितनी भी वामपंथी पार्टियां है उसका एक साथ मिलकर समर्थन करेंगे। हमारे कार्यकर्ताओं की संख्या गिन पाना तो कठिन है, लेकिन हम सब एक दुसरे से जुड़े हुए हैं। हम सब अलग-अलग संगठनों के रूप में काम कर रहे हैं।

ये होंगे चुनाव के मुद्दे

संजय पराते ने कहा है कि माकपा शुरू से ही अपने चुनावी मुद्दों को लेकर स्पष्ट रही है। हमेशा से सीपीएम को मुद्दे बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था, मजदूरों से सम्बंधित समस्यों पर आधरित रही है। 15 सालों से भाजपा की सरकार सत्ता में है लेकिन आज तक प्रदेश के युवाओं, किसानों और मजदूरों को केवल छला ही जा रहा है। आज युवा बेरोजगार हैं, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, मजदूरों की चिंता भी भाजपा की सरकार को केवल चुनाव के वक्त ही होती है।

12-01-2018
विधेयक वापसी केवल 'जुमला', आदिवासी विरोधी बदलावों के खिलाफ अभियान चलाएगी माकपा 

रायपुर। भू-राजस्व संहिता संशोधन विधेयक को सरकार द्वारा वापस लिए जाने को महज एक 'जुमला' करार देते हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भाजपा राज में भूमि कानूनों में किए गए सभी परिवर्तनों के खिलाफ अभियान चलाने का फैसला किया है। विधेयक वापसी को माकपा ने प्रदेश में कार्पोरेट राज और विस्थापन के खिलाफ लड़ने वाली सभी ताकतों और खासकर आदिवासियों और किसानों के एकजुट आंदोलन की जीत बताया है.

माकपा राज्य सचिवमंडल संजय पराते ने कहा है कि मोदी सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने में विफल रहने के बाद भाजपा राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर भूमि कानूनों में फेरबदल की मुहिम छेड़ी हुई है, ताकि आदिवासी-भूमि की लूट को पूंजीपतियों और कार्पोरेटों के लिए आसान बनाया जा सके। इस मुहिम में वह न केवल संविधान के प्रावधानों से खिलवाड़ कर रही है, बल्कि आदिवासियों पर बर्बर जुल्म भी ढा रही है। भाजपा राज में छत्तीसगढ़ में 5वीं अनुसूची और पेसा कानून का कोई अर्थ नहीं रह गया है और वनाधिकार कानून के तहत बांटे गए आधे-अधूरे पट्टे भी छीने जा रहे है। बांध, खनन और अभयारण्यों के नाम पर बिना पुनर्वास-पुनर्व्यवस्थापन योजना के उन्हें उजाड़ने की मुहिम अाज भी बदस्तूर जारी है, जबकि वनाधिकार कानूनों के तहत पहले उन्हें पट्टे दिए जाने चाहिए।

05-09-2017
माकपा ने सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ कानून बनाने की मांग की 

रायपुर। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ एक प्रभावी क़ानून बनाने की मांग की है। माकपा ने बयान जारी करते हुए कहा है कि सामाजिक बहिष्कार गरीबों, वंचितों और सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के दमन एवं शोषण का घृणित रूप है। ऐसी कुप्रथा समानता पर आधारित समाज के निर्माण को और मानवाधिकारों को भी न केवल नकारती है, बल्कि कानून के शासन को भी चुनौती है।

माकपा के सचिव संजय पराते का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में भी सामाजिक पंचायतें खाप पंचायतों की तरह काम कर रही हैं। एक सर्वे के अनुसार, सामाजिक बहिष्कार के दंश से प्रदेश के 25 हजार से ज्यादा परिवार पीड़ित हैं। उन्होंने ऐसी कुप्रथाओं से निपटने के लिए एक प्रभावशाली कानून बनाना बहुत जरूरी है, ताकि जाति पंचायतों के फैसलों के नाम पर कानून की अवहेलना करने वालों को दण्डित किया जा सके और पीड़ित लोगों तथा उनके परिवारजनों को एक गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार को सुनिश्चित किया जा सके। 

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