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11-03-2020
ज्योतिरादित्य सिंधिया का जाना मध्यप्रदेश में कांग्रेस का और कमज़ोर हो जाना है, सरकार पर नहीं वर्चस्व पर भी संकट

रायपुर। 15 साल मध्यप्रदेश में विपक्ष में रही कांग्रेस सत्ता का सुख ढंग से भोग भी नहीं पाई कि फिर उसे विपक्ष की भूमिका निभाना पड़ सकता है। 15 साल की एंटीइनकंबेंसी के बावजूद शिवराज सिंह बहुत बुरी हार नहीं हारे थे। भाजपा ने कड़ी टक्कर दी थी और बहुमत के पास पहुंचकर भी वह सरकार नहीं बना पाई थी। आंकड़ों का जादू कांग्रेस ने पूरा किया था और सरकार बनाई थी। 15 साल विपक्ष में रहने के बाद ले देकर सत्ता तक पहुंची कांग्रेस फिर टूट का शिकार हो गई है। कांग्रेस जो पहले ही मध्यप्रदेश में गुटबाजी का शिकार रही है इस टूट से उसकी हालत और खस्ता होना तय है। खासकर उसके मजबूत गढ़ ग्वालियर और चंबल अब उसके गढ़ नहीं रह पाएंगे। छत्तीसगढ़ पहले ही मध्यप्रदेश से अलग हो चुका है। मालवा में भाजपा पहले ही मजबूत है और अब ग्वालियर के हाथ से निकल जाने के बाद उसकी हालत की कल्पना की जा सकती है। ज्योतिराज सिंधिया का जाना ना केवल सरकार का जाना है बल्कि पार्टी का एक इलाके में जनाधार खोना भी नजर आ रहा है। कमलनाथ दिग्विजय सिंह की जोड़ी ने जिस तरह ज्योतिरादित्य को किनारे किया था वह आखिर ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने का कारण बन गया। कांग्रेस पहले ही बहुत ज्यादा मजबूत स्थिति में नहीं थी। अब उसके लिए अपनी ताकत बनाए रखना बेहद कठिन काम होगा।

11-03-2020
अब टीम भेजें का होत है जब बीजेपी चुग गई मध्यप्रदेश, कांग्रेस हाईकमान अब जाग जागकर टीम भेज रहा है मध्यप्रदेश

रायपुर। सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या हुआ। यही हाल मध्यप्रदेश में कांग्रेस का है। सरकार का जाना लगभग तय हो चुका है और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अब जाग रहा है। अब शाम को कांग्रेस की एक टीम मध्यप्रदेश आएगी और हालात का जायजा लेगी। स्थिति यह है कि अब सिर्फ जायजा ही लिया जा सकता है। क्योंकि हालात संभालने का समय तो कब का निकल चुका है। हैरानी की बात है 48 घंटों से चला आ रहा है उठापटक का नाटक और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व मूकदर्शक बना देखता रहा। डैमेज कंट्रोल जिनको करना था उन्होंने डैमेज कंट्रोल करने की बजाय ऐसे बयान दे दिए जो आग में घी डालने वाले थे। समझ से परे है 15 साल के संघर्ष के बाद मिली भी सत्ता को इस तरह 1 साल में गुटबाजी के चलते गवा देना।

22-02-2020
बृजमोहन और रमन एक दूसरे की पटखनी देने में आमादा है : विकास तिवारी

रायपुर। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव एवं प्रवक्ता विकास तिवारी ने भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष चुनने में हो रही देरी पर  तंज कसते हुए कहा कि आदिवासी नेतृत्व, सरल एवं सीधे व्यक्ति विक्रम उसेंडी जिन्हें अभी नियुक्त हुए साल भर भी नहीं हुआ है उनको हटाने की तैयारी भारतीय जनता पार्टी के दोनों खेमा रमन और बृजमोहन अग्रवाल में ठान गयी है। जहाँ एक ओर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह अपने समर्थक को प्रदेश अध्यक्ष पद पर काबिज करवाना चाह रहे है वहीं बृजमोहन खेमा भी अपने समर्थक को अध्यक्ष बनाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा चुके हैं।15 साल सत्ता का सुख भोगने के बाद आज भी भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश इकाई विपक्ष की भूमिका अदा नहीं करना चाह रही है और अपनी खुन्नस और गुटबाजी के कारण प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त नहीं किया जा पा रहा है।

प्रवक्ता विकास तिवारी ने कहा कि जहां एक और प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में प्रदेश के किसानों का युवाओं का हित हो रहा है कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मोहन मरकाम के नेतृत्व में पार्टी दिन प्रतिदिन विजय गाथा के नए-नए आयाम गढ़ रही है वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश इकाई में गुटबाजी और खेमे बाजी के चलते पूरी भारतीय जनता पार्टी की भद पिट रही है। इसके कारण भाजपा कार्यकर्ता अवसाद ग्रस्त हो चले हैं यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के बीच लगातार शीत युद्ध कई सालों से चल रहा है, जिसका की परिणाम अभी विधानसभा के उपचुनाव नगरी निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के सूपड़ा साफ होने के बाद यह में बाजी और लड़ाई बढ़ गई है।
प्रवक्ता विकास तिवारी ने कहा कि डॉ रमन सिंह के सामने जैसे ही मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का नाम आता है उनके चेहरे से हंसी गायब हो जाती है जबकि लोकतंत्र में इस प्रकार कि राजनीति का कहीं कोई स्थान नहीं है। भारतीय जनता पार्टी जो 15 साल से सत्ता का सुख भोगी अब विपक्ष में रहते हुए या नहीं तय कर पा रही है कि प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा। जबकि विक्रम उसेंडी का कार्यकाल अभी साल भर का नहीं हुआ है। उनको हटाने की चर्चा को लेकर सर्व आदिवासी समाज में बहुत नाराजगी व्याप्त है। अपने अपने समर्थक को अध्यक्ष पद पर बैठने के लिये अब खुलकर एक दूसरे का विरोध तक कर रहे है। आला नेताओ में लगातार खींचतान हो रही है जिसका नुकसान भाजपा के जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को उठाना पड़ रहा है।

18-02-2020
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी में संघी और गैर संघी के बीच संघर्ष : कांग्रेस

रायपुर। प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भारतीय जनता पार्टी में मची रस्साकशी पर छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस ने इसे गुटबाजी से जोड़ा है। कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि भाजपा में पहले दो गुट थे, अब तीन गुट हैं। केंद्र में आडवाणी गुट, मोदी गुट में लड़ाई पहले से थी, अब जेपी नड्डा का गुट भी मैदान में है। भाजपा के भीतर खाने में संघी और गैर संघी में प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी हथियाने का संघर्ष चल रहा है। इसमें एक ओर संघ इस बात की जद्दोजहद कर रहा है कि किसी संघ समर्थित नेता को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाकर भाजपा संगठन में दबदबा बनाए रखा जाये। तो दूसरी ओर सीधे भाजपा से जुड़ने वाले गैर संघी नेता हैं, जो भाजपा में चल रही संघ की तानाशाही से खफा हैं। 
धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का मसला उनका अंदरूनी मामला है लेकिन छत्तीसगढ़ की जनता ने भाजपा को विपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। कांग्रेस का मानना है कि लोकतंत्र के लिये जरूरी है जिम्मेदार विपक्ष का होना। विपक्ष की सही भूमिका निभाने में अब तक भाजपा असफल रही है।  

28-12-2019
भाजयुमो के प्रदेश महामंत्री वार्ड का चुनाव क्यों नहीं जीत पाए, आखिर भाजपा के ही दिग्गज क्यों हारे?

रायपुर। नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा की हुई दुर्गति में उनके दिग्गजों का बहुत बड़ा हाथ है। परिणामों ने यह बता दिया कि दिग्गज सिर्फ भाजपा के ही हारे हैं। कांग्रेस के सारे दिग्गजों ने अपने किले फतह कर लिये। भाजपा के हारने वालों में एक और बड़ा नाम है संजू नारायण सिंह। भाजयुमो के प्रदेश महामंत्री है वे और शहर जिला अध्यक्ष भी रह चुके हैं। भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा के प्रदेश महामंत्री का यह हाल है कि वह अपने वार्ड में चुनाव नहीं जीत पाए। किसी भी पार्टी की रीढ़ होती है उसकी युवा विंग। भाजयुमो ने बड़े-बड़े नेता देश को दिए हैं। उसी भाजयुमो से संजू नारायण सिंह भी निकले है। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि वह वार्ड का चुनाव भी नहीं जीत पाए। और अगर दिग्गजों की बात करें तो कांग्रेस के सारे दिग्गज अपना अपना चुनाव आसानी से जीत गए।

चाहे पूर्व महापौर प्रमोद दुबे हो या एजाज ढेबर हो या ज्ञानेश शर्मा। सभी चुनाव जीतकर नगर निगम पहुंच चुके हैं। और ताल ठोक कर महापौर की दावेदारी कर रहे हैं। उनकी तुलना में भाजपा के महापौर पद के तमाम दावेदार वार्डो में ही निपट गए है। अब सवाल यह उठता है कि भाजपा के ही दिग्गज क्यों हारे? दरअसल भाजपा के दिग्गजों ने 15 साल के कथित सुशासन में संगठन की शक्ति बढ़ाने से ज्यादा खुद की शक्ति बढ़ाने में ध्यान दिया। और पार्टी की छवि से ज्यादा खुद का प्रचार प्रसार करते रहे। इस बहाने वे जमीनी कार्यकर्ताओं से धीरे-धीरे दूर होते चले गए और जब जमीनी कार्यकर्ता जरूरत पड़ी तो जमीनी कार्यकर्ताओं ने उन्हें जमीन पर ला पटका। अब शायद भाजपा के दिग्गजों को जमीनी हकीकत का पता चल गया है। भाजपा का अभेद्य किला दक्षिण विधानसभा कई जगह से छिन्न-भिन्न हो चुका है। कांग्रेस अपनी सफल रणनीति से नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी की आंतरिक गुटबाजी से ज्यादा सफल हुई है। कांग्रेस की परंपरागत गुटबाजी अब भाजपा की आन बान और शान है। 15 सालों में भाजपा ने अच्छी बात सीखने कि हो ना हो सत्ता की तमाम बुराइयांयो को आत्मसात करने में कोई कमी नहीं की जिसका दुष्परिणाम नगर निकाय चुनाव में साफ नजर आया।

26-12-2019
अपना महापौर बनाने के लिए प्रतिद्वंदियों को निपटाने वालों ने पार्टी को ही निपटा दिया, और अब करेंगे समीक्षा

रायपुर। नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा की हार के लिए उसकी आंतरिक कलह प्रमुख जिम्मेदार मानी जा रही है। भूपेश बघेल सरकार के खिलाफ असंतोष की कोरी कल्पना कर कुछ नेताओं ने नगर निगम में भाजपा की सरकार बनने का सपना पाल लिया था। उसी सपने के तहत वे अपना महापौर बनाने के जुगाड़ में पहले से लग गए थे। महापौर पद की होड़ में एक नहीं कई चेहरे सामने आए थे।उसी से चिंतित होकर समानांतर संगठन चलाने वाले दिग्गजों ने अपने प्रतिनिधियों को ठिकाने लगाने का काम आदतन शुरू कर दिया था। सबसे पहला टारगेट त्रिपुरा के राज्यपाल रमेश बैस के भतीजे ओंकार बैस थे। ओंकार बैस संगठन से जुड़े हुए जमीनी कार्यकर्ता है जिन्होंने बरसो पार्टी की सेवा की है। उसके बाद दूसरा नंबर था राजीव अग्रवाल का वह भी संगठन के ही दावेदार माने जाते थे। उनके अलावा संजय श्रीवास्तव को पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का उम्मीदवार माना जा रहा था। उनके अलावा प्रफुल्ल विश्वकर्मा सूर्यकांत राठौर भी दावेदार थे। इनमें से केवल सूर्यकांत राठौर की जीत पाए लेकिन बाकी दिग्गजों के हारने के कारण राजधानी के नगर निगम में भाजपा महापौर बनाने की दौड़ से ही बाहर हो गई।

ओंकार बैस के खिलाफ निर्दलीय अमर बंसल ने धमाकेदार जीत हासिल की है। अमर बंसल के प्रचार अभियान और जीतने के बाद उनके साथ कौन था यह सारे शहर में साफ़ साफ देखा है। समानांतर संगठन चलाने वाले मठाधीश के समर्थक उनके साथ पूरे समय नजर आए जिन्होंने ओंकार बैस को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कमोबेश यही हाल राजीव अग्रवाल संजय श्रीवास्तव प्रफुल्ल विश्वकर्मा का रहा। अपना महापौर मनाने के जुगाड़ में समानांतर सत्ता के जनक ने कई दिग्गजों को पहले ही रास्ते से हटा दिया। लेकिन इस चक्कर में उन्होंने अपने प्रत्याशी को महापौर पद तक पहुंचाने वाले रास्ते को ही खोद दिया था। अब ना तो उनका चहेता महापौर बन पा रहा है और ना ही वह पार्षद ही बन पाया है। हां इस गुटबाजी के कारण नगर निगम की पिछली सभा की तुलना में भाजपा के पार्षदों की संख्या काफी कम हो गई है। और महापौर बनाना तो उनके लिए अब सपना ही रह गया है। कांग्रेस की हैट्रिक में उनके सपनों को 5 साल के लिए डिब्बाबंद कर दिया है।

24-12-2019
शहरों की पार्टी भाजपा शहरों में भी सिमटने लगी, विधानसभा चुनाव के बाद नगरीय निकायों में भी करारा झटका

रायपुर। शहरों की पार्टी कहलाने वाली भाजपा अब छत्तीसगढ़ के शहरों में भी सिमटती नजर आ रही है। 12 बजे तक के रुझानों में भाजपा कांग्रेस के मुकाबले काफी पीछे नजर आ रही है जो उसके लिए अच्छे संकेत नहीं है। हैरानी की बात यह है बड़े-बड़े दावे करने वाले बड़े-बड़े पदाधिकारियों के इलाकों में भी भाजपा पिछड़ती नजर आ रही है जो उसके भविष्य पर सवालिया निशान लगाता है। नगर निगम नगर पालिका और नगर पंचायतों के कुल 1820 वार्डों में भाजपा एक तिहाई में भी बढ़त नहीं बना पाई है। वह 546 में सिमट कर रह गई है। दूसरी ओर कांग्रेस 742 वार्डों में बढ़त लेकर भाजपा से काफी आगे चल रही है। भाजपा के लिए आत्म चिंतन का समय है और उसे अपने ग्राम पंचायतों के चुनाव में भारी जीत के लिए किए गए दावों पर भी फिर से विचार करना चाहिए।

हार की समीक्षा के बाद क्या होगा यह बाद में पता चलेगा लेकिन नतीजों के पहले भारी-भरकम पदाधिकारियों की बड़ी बैठक और उसके बाद नगरी निकाय चुनाव ग्राम पंचायत के होने वाले चुनाव में भारी जीत के दावे की हवा निकलती साफ दिख रही है। राष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारियों डॉ रमन सिंह सरोज पांडे के इलाके में भी भाजपा की हालत पतली नजर आ रही है। इसमें कोई शक शक नहीं की मुख्यमंत्री भूपेश ने गुटबाजी में उलझी कांग्रेस का नेतृत्व जब से अपने हाथ में लिया था तब से लेकर मुख्यमंत्री बनने के बाद भी एक पल उन्होंने आराम नहीं किया है। वे लगातार अपनी आक्रमक छवि के अनुकूल काम किए जा रहे हैं। वही 15 सालों तक जो सक्रियता पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह की नजर आती थी वह अब नजर नहीं आती और बीते साल में बड़े से बड़े मुद्दों पर भाजपा का कहीं अता-पता नजर नहीं आया। भाजपा कंही निराशा के बिल में दुबकी रही और कांग्रेस लगातार हमले कर अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रही। आक्रामक नेतृत्व जो भूपेश बघेल ने दिया है उसका सुपरिणाम साफ नजर आ रहा है और कांग्रेस से उधार में ली गई गुटबाजी का दुष्परिणाम भाजपा भुगतती नजर आ रही है।

15-12-2019
भूपेश बघेल के चुनावी दंगल में ताल ठोकने से जागी भाजपा, बृजमोहन को बनाया चुनाव संचालन समिति का अध्यक्ष

रायपुर। भूपेश बघेल के नगरीय निकाय चुनावी दंगल में उतर कर ताल ठोकने से भाजपा की कुंभकर्णी नींद टूटती नज़र आ रही है। अब तक असंतुष्टों को मनाने के उलझी भाजपा चुनावी मैदान में कही नज़र नही आ रही थी। जो हाल कभी कांग्रेस का हुआ करता था करीब करीब उसी स्थिति में भाजपा पंहुच चुकी है मगर भूपेश बघेल ने कुशल नेतृत्व का प्रमाण देते हुए कांग्रेस को गुटबाज़ी से कब का उबार लिया है। विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित्त करने के बावजूद भूपेश बघेल भाजपा पर हमला करने का कोई मौका नही चूकते और गुटबाज़ी में उलझी भाजपा डिफेंस भी ढंग से नहीं कर पा रही है। सप्ताह भर बाद मतदान होना है और आज अचानक भूपेश बघेल ने 6 चुनावी सभाओं में ताल ठोंक कर भाजपा को चुनौती दे डाली। भूपेश बघेल की गर्जना से भाजपा की नींद टूटी है और उन्होंने भूपेश के सामने बृजमोहन को खड़ा एक तीर से की निशाने साध दिए है। एक तरफ भूपेश-बृजमोहन की ट्यूनिंग की अफवाहों पर विराम लगाने की दिखावटी कोशिश है तो दूसरी ओर चुनाव के नतीजे विपरीत आने पर उन्हीं अफवाहों का फायदा उठाने की तैयारी भी कर ली गई है। बहरहाल अब तो वाकओवर देती नज़र आ रही भाजपा की नैया बृजमोहन के हाथ में आने से चुनावी दंगल जोरदार हो जाएगा।

08-12-2019
पार्टी विद द डिफरेंस, का सारा डिफरेंस, सारा डिसिप्लिन खत्म, चल रहा है सिर्फ मान मनौव्वल का खेल

रायपुर। अनुशासन के लिए अलग पहचान बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी का अनुशासन अब कहीं नजर नहीं आता है। नज़र आती है सिर्फ बगावत और नाराजगी। पार्टी के बड़े-बड़े नेता नगरीय निकाय चुनाव में फिलहाल रूठे कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों को मनाने में लगे हुए हैं। भाजपा में ऐसी अनुशासनहीनता कभी देखी नहीं गई है। सदर बाजार मंडल सर्वाधिक आक्रामक नजर आ रहा है। और कमोबेश यही स्थिति रायपुर के हर मंडल में व प्रदेश के हर शहरों में बनी हुई है।

गुटबाजी, भीतरघात, अंतरकलह के लिए कभी कांग्रेस बदनाम हुआ करती थी लेकिन भूपेश बघेल ने कांग्रेस की इस बीमारी का जड़ से इलाज कर दिया है। भूपेश बघेल के सक्षम नेतृत्व में कांग्रेस में कहीं भी बगावत के सुर उठते नहीं दिख रहे हैं। वही विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पटखनी खा चुकी भाजपा में गुटबाजी चरम पर है। अभी भी संगठन को अपनी बपौती मानने वाला एक गुट मनमानी पर उतरा हुआ है। जिसका दुष्परिणाम पार्टी में बगावत कार्यकर्ताओं के इस्तीफे और असंतुष्टों के चुनाव लड़ने के रूप में सामने आया है। अब जबकि कांग्रेस के प्रत्याशी प्रचार में जुटे हुए हैं तो ऐसे में भाजपा के नेता अपने रूठे हुए कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को मनाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। यही हाल रहा तो अब तक शहरों की पार्टी शहरों से भी निपट जाएगी।

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