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14-01-2020
बसना में निर्दलीयों का पलड़ा रहता है भारी : सम्पत अग्रवाल

रायपुर। बसना में  निर्दलीयों की लगातार जीत के संबंध में नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष सम्पत अग्रवाल ने मंगलवार को पत्रकार वार्ता को संबोधित किया। सम्पत अग्रवाल ने कहा कि प्रदेश में हाल ही में नगरीय निकाय चुनाव हुए हैं। एक ओर सभी नगर निगमों में कांग्रेस पार्टी अपना महापौर बनाकर सरकार के कामकाज का बेहतर परिणाम बता रही है, तो वहीं भाजपा ने भी प्रदेश के सभी 2800 वार्डों में से 1138 पार्षदों के जीत का दावा कर भारतीय जनता पार्टी भी बेहतर स्थिति की बात कर रहे हैं। वहीं नगर पंचायत बसना में 7 निर्दलीय पार्षदों के साथ हमने अपना अध्यक्ष बनाने का ऐतिहासिक कीर्तिमान हासिल किया। सम्पत अग्रवाल ने कहा कि विगत विधानसभा चुनाव में बतौर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े जिसमें कांग्रेस के देवेन्द्र बहादुर सिंह से बहुत ही कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा। वहीं भाजपा प्रत्याशी डीसी पटेल तीसरे स्थान पर रहे थे। सम्पत अग्रवाल ने कहा कि इसके पूर्व वे बसना नगर पंचायत के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

31-12-2019
जो टिकट पाने के लिए हाथ जोड़ते रहे अब उन्ही के हाथ पैर दबाने पड़ रहे है नेताजी को, अब आया है ऊंट पहाड़ के नीचे

रायपुर। नगरीय निकाय चुनाव में कुछ लोग अपनी पार्टी के नेताओं के हाथ जोड़ते रहे कि उन्हें टिकट दे दिया जाए। वे जीत सकते हैं। पर उनकी बातों पर भरोसा ना कर उनकी निष्ठा पर विश्वास ना कर अपने चहेतों को टिकट देने का खामियाजा अब नेताओं को भुगतना पड़ रहा है। जो उनके हाथ जोड़ रहे थे अब उन्हीं लोगों के हाथ पैर दबाने पड़ रहे हैं नेताओं को। अपना महापौर बनाने के लिए दोनों ही पार्टियों को बहुमत के लिए अब निर्दलीयों की तरफ ताकना पड़ रहा है। दूसरी ओर निर्दलीय एकजुट होकर अपनी मांगे और शर्तें सामने रख रहे हैं  और किसी भी सूरत पर दोनों ही पार्टी से बिना समझौते के बात सुनने को तैयार नहीं है। बहुमत चाहिए तो उनकी बात माननी पड़ेगी और हैरानी की बात तो यह है कि भाजपा के पास उनकी पार्टी के बागियों को मना लेने के बावजूद भी बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ये बात अलग है कि खरीद-फरोख्त में माहिर व्यापारी इस मामले में सक्रिय हो गए हैं। वैसे उन्होंने पहले भी अपने दर्जन भर साथियो को दूसरी ओर पहुंचाकर ही दम लिया था ताकि उनका वजूद बना रह सके। खरीद-फरोख्त में एक्सपर्ट होने के बावजूद उनकी बात का असर होता दिख नहीं रहा है। क्योंकि सारे निर्दलीय अब एक साथ इकट्ठा हैं। और पूरी ताकत से अपनी शर्तें और मांगे सामने रख रहे हैं। कायदे से देखा जाए तो अगर ढंग से टिकट बांटते तो अगर जीतने वाले प्रत्याशियों को टिकट देते तो आज उन लोगों के हाथ पांव नहीं दबाने पड़ते जो जो उन्हें नमस्ते करते नहीं थकते थे। जो टिकट के लिए उनके हाथ जोड़ रहे थे। पर अति आत्मविश्वास ले डूबा और अब उन्हें के चरणों में जाना पड़ रहा है जिन्हें दुत्कार दिया था। 

 

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