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03-12-2019
चंद्रयान-2: चांद की सतह मिला विक्रम लैंडर का मलबा, नासा ने जारी की तस्वीर

नई दिल्ली। सितंबर में चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हुए विक्रम लैंडर को अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के एक उपग्रह ने ढूंढ निकाला है। नासा ने अपने लूनर रेकॉन्सेन्स ऑर्बिटर (एलआरओ) द्वारा ली गई एक तस्वीर जारी की है, जिसमें अंतरिक्ष यान से प्रभावित जगह दिखाई पड़ी है। तस्वीर में यान से संबंधित मलबे वाला क्षेत्र को दिखाई पड़ रहा है, जिसमें कई किलोमीटर तक लगभग एक दर्जन से अधिक स्थानों पर मलबा बिखरा हुआ दिखाई पड़ रहा है। नासा ने एक बयान में कहा कि उसने 26 सितंबर को साइट की एक मोज़ेक इमेज जारी की थी और लोगों को लैंडर के संकेतों की खोज करने के लिए आमंत्रित किया। इसके बाद शनमुगा सुब्रमण्यन नाम के एक व्यक्ति ने मलबे की एक सकारात्मक पहचान के साथ एलआरओ परियोजना से संपर्क किया। शानमुगा द्वारा मुख्य दुर्घटनास्थल के उत्तर-पश्चिम में लगभग 750 मीटर की दूरी पर स्थित मलबे को पहले मोज़ेक (1.3 मीटर पिक्सल, 84 डिग्री घटना कोण) में एक एकल उज्ज्वल पिक्सेल पहचान थी। नवंबर मोज़ेक सबसे अच्छा दिखाता है। मलबे के तीन सबसे बड़े टुकड़े 2x2 पिक्सेल के हैं।'' चंद्रयान 2 के साथ भारत अमेरिका चीन और रूस के बाद चौथा ऐसा देख बनने की उम्मीद कर रहा था जो चांद के साउथ पोल पर सफल लैंडिंग करे लेकिन दुर्भाग्यव यह सतह से लगभग 2 किलोमीटर पहले क्षतिग्रस्त हो गया।

 

27-11-2019
भारत ने अंतरिक्ष में लॉन्च किया सैटेलाइट 'कार्टोसैट-3', रखेगा दुश्मन की गतिविधियों पर नजर

नई दिल्ली। भारत ने अंतरिक्ष में एक और इतिहास रचा है। इसरो ने चंद्रयान 2 के बाद तीसरी पीढ़ी के उन्नत भू-सर्वेक्षण उपग्रह काटोर्सैट-3 का लॉन्च किया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मुताबिक, उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी47 के जरिए काटोर्सैट-3 तथा उसके साथ 13 नैनो उपग्रहों को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र के दूसरे लॉन्च पैड से प्रक्षेपण किया गया। पीएसएलवी-सी47 प्रक्षेपण यान पीएसएलवी की एक्सएल श्रेणी की 21वीं उड़ान है। काटोर्सैट-3 तीसरी पीढ़ी का उन्नत उपग्रह है,जिसकी हाई रिजोल्यूशन इमेजिंग क्षमता है। काटोर्सैट-3 को 509 किलोमीटर की ऊंचाई पर भूमध्यरेखा से 97.5 डिग्री की कक्षा में स्थापित किया जाएगा। इसके अलावा पीएसएलवी-सी47 के जरिए अमेरिका के 13 नैनो उपग्रहों का भी प्रक्षेपण किया जाएगा,जिन्हें इसरो की व्यावसायिक इकाई न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड के तहत इस अभियान में शामिल किया गया है।

काटोर्सैट-3 का वजन 1625 किलोग्राम है, जिसे 13 अन्य नैनो उपग्रहों के साथ ध्रुवीय सौर भूस्थैतिक कक्षा में प्रक्षेपित किया जाएगा। 44.4 मीटर ऊंचे पीएसएलवी-सी47 प्रक्षेपण यान का यह 49वां मिशन है। यह उपग्रह काटोर्सैट श्रृंखला का नौंवा उपग्रह है। इसरो का इस वर्ष यह पांचवां प्रक्षेपण अभियान है। कार्टोसैट-3 तीसरी पीढ़ी का बेहद चुस्त और उन्नत उपग्रह है। यह धरती की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें लेने के साथ-साथ उसका मानचित्र तैयार करने की क्षमता रखता है। इसरो ‘कार्टोसैट-3’ सहित 13 अमेरिकी नैनो उपग्रहों की लॉन्चिंग के लिए ‘पीएसएलवी-सी47’ रॉकेट का सहारा लेगा। यह अंतरिक्ष में ‘पीएसएलवी-सी47’ की 49वीं उड़ान होगी। ‘कार्टोसैट-3’ शहरों के नियोजन, ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे के विकास, संसाधनों की आपूर्ति, तटीय भूमि के बेहतर उपयोग और हरियाली के आकलन के साथ-साथ मौसमी बदलावों का अंदाजा लगाने व सैन्य निगरानी में मददगार साबित होगा।

 

09-09-2019
चंद्रयान 2: टूटा नहीं है लैंडर विक्रम, संपर्क साधने की हो रही है पूरी कोशिश

बेंगलुरू। मिशन चंद्रयान 2 को लेकर बड़ी खबर आई है, इसरो सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक लैंडर विक्रम को नुकसान नहीं पहुंचा है और उससे संपर्क साधने की पूरी कोशिश की जा रही है। विक्रम लैंडर चंद्रमा की सतह पर झुका हुआ खड़ा हैैै, साथ ही रोवर प्रज्ञान उसकेे भीतर ही है। इससे पहले आशंका जताई जा रही थी कि विक्रम को हार्ड लैंडिंग के चलते नुकसान पहुंचा होगा। इससे पहले कल ऑर्बिटर ने विक्रम की लोकेशन का पता लगा लिया था। इसरो प्रमुख के. सीवन ने रविवार को इसकी घोषणा की थी। सीवन ने कहा था कि चंद्रमा का चक्कर लगा रहे ऑर्बिटर ने विक्रम की थर्मल तस्वीरें ली हैं। 

 

08-09-2019
चंद्रयान 2 : इसरो के वैज्ञानिकों ने शुरू की जांच

नई दिल्ली। इसरो के वैज्ञानिक अब इस बात बात की जांच कर रहे हैं कि विक्रम लैंडर की लैंडिंग में गड़बड़ी कहां हुई, कैसे हुई और क्यों हुई? इसके लिए इसरो के वैज्ञानिकों ने लंबा-चौड़ा डाटा खंगालना शुरू कर दिया है। इसरो के वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए विक्रम लैंडर के टेलिमेट्रिक डाटा, सिग्नल, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, लिक्विड इंजन का विस्तारपूर्वक अध्ययन कर रहे हैं। विक्रम की लैंडिंग आखिरी पलों में गड़बड़ हुई। ये दिक्कत तब शुरू हुई जब विक्रम लैंडर चांद की सतह से मात्र 2.1 किलोमीटर ऊपर था। अब वैज्ञानिक विक्रम लैंडर के उतरने के रास्ते का विश्लेषण कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक हर सब-सिस्टम के परफॉर्मेंस डाटा में कुछ राज छिपा हो सकता है। यहां लिक्विड इंजन का जिक्र बेहद अहम है। विक्रम लैंडर की लैंडिंग में इसका अहम रोल रहा है। वैज्ञानिक उन सिग्नल या उत्सर्जन संकेतों की जांच कर रहे हैं जिससे कुछ गड़बड़ी का पता चले। इसमें सॉफ्टवेयर की समस्या, हार्डवेयर की खराबी शामिल हो सकती है। इसमें आखिरी के 2.1 किलोमीटर के आंकड़े ज्यादा महत्व हैं। विक्रम लैंडर जब चांद की सतह पर उतरने की कोशिश कर रहा था तो उसके सेंसर ने कई डाटा कमांड सेंटर को भेजे हैं। इनमें चांद के सतह की तस्वीर समेत कई दूसरे डाटा शामिल हैं। इस पर इसरो की टीम काम कर रही है।

06-08-2019
चंद्रयान-2 पहुंचा चंद्रमा के पास, पांचवी बार पृथ्वी की कक्षा सफलतापूर्वक बदली

नई दिल्ली। चंद्रयान-2 ने मंगलवार को दोपहर बाद पृथ्वी की कक्षा पांचवी बार सफलतापूर्वक बदली। इसके साथ ही अब यह चंद्रमा के और पास पहुंच गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने ट्वीट करके कहा,“आज चंद्रयान-2 ने पांचवीं बार पृथ्वी की कक्षा बदली। चंद्रयान-2 ने मंगलवार को अपराह्न तीन बजकर चार मिनट पर पांचवीं बार सफलतापूर्व कक्षा बदली। उन्होंने कहा कि चंद्रयान सभी मापदंड़ों पर सही ढ़ंग से काम कर रहा है। इससे पहले 24 जुलाई को अपराह्न 2.52 बजे पहली बार चंदयान ने कक्षा बदली थी। इसके बाद 26 जुलाई को दूसरी बार,29 जुलाई को तीसरी बार और दो अगस्त को चौथी बार चंद्रयान ने पृथ्वी की कक्षा बदली थी। चंद्रयान-2 का 22 जुलाई को दोपहर 2.43 बजे श्रीहरिकोटा (आंध्रप्रदेश) के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपण हुआ था, जिसके 16 मिनट बाद ही यान सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में पहुंच गया था। चंद्रयान-2 में ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) शामिल हैं, जो 48 दिन में तीन लाख 844 किमी की यात्रा पूरी करके चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करेगा। स्वदेशी तकनीक से निर्मित चंद्रयान-2 में कुल 13 पेलोड हैं। आठ ऑर्बिटर में, तीन पेलोड लैंडर ‘विक्रम’ और दो पेलोड रोवर ‘प्रज्ञान’ में हैं। पांच पेलोड भारत के, तीन यूरोप, दो अमेरिका और एक बुल्गारिया के हैं। चंद्रयान-2 के 20 सितंबर को चांद की सतह पर उतरने की संभावना है और चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद ऑर्बिटर एक साल तक काम करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी और लैंडर के बीच संपर्क स्थापित करना है।

 

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