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20-11-2020
सेबी ने की सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल,कहा-सुब्रत रॉय को 62602 करोड़ रुपये जमा करने का आदेश दें

नई दिल्ली। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने सहारा समूह की दो कंपनियों से 62,602.90 करोड़ रुपये के भुगतान के निर्देश के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है। सेबी ने कहा है कि अगर ये कंपनियां न्यायालय के पहले के आदेशों पर अमल करते हुए इस धनराशि का भुगतान करने में विफल रहती हैं तो सहारा समूह के मुखिया सुब्रत रॉय को हिरासत में लिया जाना चाहिए। सेबी ने कहा है कि अवमाननाकर्ता रॉय और उनकी दो कंपनियां-सहारा इंडिया रियल इस्टेट कॉर्पोरेशन लिमिटेड और सहारा हाउसिंग इंवेस्टमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड निवेशकों से एकत्र की गई सारी राशि ब्याज के साथ जमा कराने के बारे में न्यायालय के विभिन्न आदेशों का ‘घोर उल्लंघन’ कर रहे हैं। सेबी ने कहा है कि सुब्रत राय और उनकी कंपनियों को कई बार राहत प्रदान किए जाने के बावजूद उन्होंने इस न्यायालय के आदेशों की अवहेलना की है और उनका अनुपालन करने में विफल रहे हैं।

न्यायालय में लंबित मामले में हस्तक्षेप के लिए 18 नवंबर को दाखिल आवेदन में सेबी ने कहा कि 'अवमाननाकर्ता लंबी ढील दिए जाने के बावजूद इस न्यायालय के आदेशों का अनुपालन नहीं कर रहे हैं' और उनकी देनदारियां रोजाना बढ़ती जा रही हैं। आवेदन में कहा गया है कि न्यायालय द्वारा 6 मई, 2016 के आदेश के तहत, जिसे समय समय पर बढाया गया, अवमाननाकर्ता, हिरासत से दी गई रिहाई का आनंद ले रहे हैं लेकिन उन्होंने इस न्यायालय के आदेशों पर अमल का कोई प्रयास नहीं किया है। सेबी ने न्यायालय से अनुरोध किया है कि इस साल 30 सितंबर की स्थिति के अनुसार देय 62,602.90 करोड़ रुपये की धनराशि सेबी-सहारा रिफंड खाते में तत्काल जमा कराने का निर्देश सहारा को दिया जाए। सेबी ने कहा है कि ऐसा करने में विफल रहने पर अवमाननाकर्ताओं को शीर्ष अदालत के 15 जून,2015 के फैसले में दिए गए निर्देशों के अनुसार हिरासत में लिया जाए। शीर्ष अदालत ने 31 अगस्त 2012 को सहारा समूह की दोनों कंपनियों को निवेशकों से ली गयी धनराशि 15 प्रतिशत ब्याज सहित वापस करने के लिए यह रकम सेबी के पास जमा कराने के बारे में अनेक निर्देश दिए थे।

19-11-2020
सुप्रीम कोर्ट का फैसला,सीबीआई जांच के लिए संबंधित राज्य से अनुमति लेना होगा अनिवार्य होगा

नई दिल्ली। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की छानबीन के अधिकार क्षेत्र के संबंध में अक्सर सवाल उठते रहे हैं। अक्सर यह सवाल सामने आता है कि क्या जांच के लिए सीबीआई को संबंधित राज्यों से अनुमति लेने की जरूरत होगी? अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अब सीबीआई जांच के लिए संबंधित राज्य से अनुमति लेना अनिवार्य होगा।एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि ये प्रावधान संविधान के संघीय चरित्र के अनुरूप है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम में,जिसमें शक्तियों और अधिकार क्षेत्र के लिए सीबीआई के लिए राज्य सरकार की सहमति की आवश्यकता है।

ये प्रावधान संविधान के संघीय चरित्र के अनुरूप है।अभी हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश जारी किया था और कहा था कि राज्य में जांच करने के लिए सीबीआई को दी गई अनुमति वापस ली जाती है। हालांकि जांच की अनुमति महाराष्ट्र सरकार के वापस लेने से फिलहाल चल रही छानबीन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर भविष्य में सीबीआई महाराष्ट्र में किसी नए मामले में जांच पड़ताल करना चाहती है, तो उसे राज्य सरकार से इजाजत लेने की जरूरत होगी, जब तक कि अदालत की तरफ से जांच के आदेश नहीं दिए गए हों। असल में सीबीआई दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम,1946 के जरिये शासित होती है। इसमें कहा गया है कि सीबीआई को जांच से पहले संबंधित राज्य सरकार की अनुमति लेनी होगी।

02-11-2020
विजय माल्या के प्रत्यर्पण पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगी स्टेटस रिपोर्ट

नई दिल्ली। शराब कारोबारी विजय माल्या को भारत लाए जाने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से रिपोर्ट मांगी है। सुप्रीम कोर्ट ने भगोड़े कारोबारी के प्रत्यर्पण को लेकर चल रही गोपनीय कानून प्रक्रिया पर केंद्र सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। केंद्र सरकार से छह सप्ताह में जवाब देने को कहा गया है। केंद्र सरकार ने 5 अक्टूबर को सर्वोच्च अदालत से कहा था कि माल्या को तब तक भारत प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता है कि जब तक एक ब्रिटेन में अलग 'गोपनीय' कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती है। जो कि प्रकृति में न्यायिक और गोपनीय है।'' केंद्र ने 5 अक्टूबर को न्यायालय को बताया था कि भगोड़े कारोबारी विजय माल्या का उस समय तक भारत प्रत्यर्पण नहीं हो सकता जब तक ब्रिटेन में चल रही एक अलग 'गोपनीय कानूनी प्रक्रिया का समाधान नहीं हो जाता।' केंद्र ने कहा था कि उसे ब्रिटेन में विजय माल्या के खिलाफ चल रही इस गोपनीय कार्यवाही की जानकारी नहीं है। सरकार का कहना था, 'ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालत ने माल्या के प्रत्यर्पण की कार्यवाही को बरकरार रखा है लेकिन अभी ऐसा नहीं हो रहा है।' शीर्ष अदालत ने इससे पहले माल्या की 2017 की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए उसे 5 अक्टूबर को न्यायालय में पेश होने का निर्देश दिया था। न्यायालय ने विजय माल्या को अदालत के आदेशों का उल्लंघन करके अपने बच्चों के खातों में चार करोड़ अमेरिकी डॉलर हस्तांतरित करने के मामले में 2017 में उसे अवमानना का दोषी ठहराया था।

 

 

02-11-2020
कमलनाथ स्टार प्रचारक विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने लगाई चुनाव आयोग के आदेश पर रोक

भोपाल। मध्‍यप्रदेश उपचुनाव के लिए कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्‍यमंत्री कमलनाथ को स्‍टार प्रचारकों की लिस्‍ट से हटाने के चुनाव आयोग के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। अब इसपर चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया आई है। चुनाव आयोग ने कहा है "सर्वोच्च न्यायालय सबसे सुप्रीम हैं। इस संबंध में उनकी तरफ से चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करने का अवसर दिया गया है, जिसे जल्द से जल्द दायर किया जाएगा।''बता दें कि 30 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने कमलनाथ को कांग्रेस के स्टार प्रचारकों की लिस्ट से हटाने का आदेश दिया था। चुनाव आयोग ने अपने आदेश में कहा था, "आदर्श आचार संहिता के बार-बार उल्लंघन और उन्हें (कमलनाथ को) जारी की गई सलाह की पूरी तरह से अवहेलना को लेकर आयोग मध्य प्रदेश विधानसभा के वर्तमान उपचुनावों के लिए मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का स्टार प्रचारक का दर्जा तत्काल प्रभाव से समाप्त करता है।" आयोग ने कहा था कि कमलनाथ को स्टार प्रचारक के रूप में प्राधिकारियों द्वारा कोई अनुमति नहीं दी जाएगी। 31 अक्टूबर को चुनाव आयोग के आदेश के खिलाफ कमलनाथ ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सोमवार को आयोग के फैसले पर स्टे लगा दिया है और कमलनाथ का स्टार प्रचारक का दर्जा बहाल कर दिया है। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं। तीन नवंबर को इन सीटों पर वोट डाले जाएंगे और 10 नवंबर को नतीजों का ऐलान होगा। 

31-10-2020
चुनाव आयोग के आदेश के खिलाफ कमलनाथ ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश उपचुनाव के लिए खुद को स्टार प्रचारकों की लिस्ट से हटाने के चुनाव आयोग के आदेश के खिलाफ कमलनाथ ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। चुनाव आयोग ने शुक्रवार को पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को कांग्रेस के स्टार प्रचारक से हटा दिया है। चुनाव आयोग ने आचार संहिता उल्लंघन के मामलों के बाद ये कार्रवाई करने की बात कही है। आयोग के स्टार प्रचारक का दर्जा छीने जाने के इस फैसले के खिलाफ शनिवार को कमलनाथ ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। आयोग ने शुक्रवार को जारी एक आदेश में कहा है कि आदर्श आचार संहिता के बार-बार उल्लंघन और कमलनाथ को जारी की गई सलाह की पूरी तरह से अवहेलना करने को लेकर आयोग मध्यप्रदेश विधानसभा के वर्तमान उपचुनावों के लिए उनका अपने राजनीतिक दल के लिए स्टार प्रचारक का दर्जा तत्काल प्रभाव से समाप्त करता है। कमलनाथ को स्टार प्रचारक के रूप में प्राधिकारियों की ओर से कोई अनुमति नहीं दी जाएगी। हालांकि कमलनाथ ने कहा है कि उनकी आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है लेकिन वो हार नहीं मानेंगे, प्रचार करते रहेंगे। कमलनाथ का स्टार प्रचारक का दर्जा खत्म करने पर कांग्रेस नेता, पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने कहा है कि स्टार प्रचारक की सूची का अधिकार राजनीतिक दलों का है, केंद्रीय चुनाव आयोग का नहीं है। 

 

26-10-2020
दिशा सालियान मौत मामला: सुप्रीम कोर्ट ने याचिक सुनने से किया इंकार,कहा-आप बॉम्बे हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मैनेजर दिशा सालियान की मौत के मामले में कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच की मांग करने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट जाने को कहा।
28 साल की दिशा की मौत 8 जून को पश्चिम मुंबई के मलाड स्थित एक इमारत की 14वीं मंजिल से गिरकर हो गई थी। यह मामला सोमवार को चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अगुआई वाली पीठ के सामने आया। चीफ जस्टिस के साथ जस्टिस एएस बोपन्ना और वी. रामासुब्रमनियन की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा, ''आप बॉम्बे हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? वे केस को जानते हैं और अच्छा फैसला करेंगे, वहां कोई दिक्कत हो तो आप यहां आ सकते हैं।"
याचिका को वकील पुनीत धांदा ने दायर की थी जिनका दावा है कि सालियान और राजपूत की मौत का आपस में कनेक्शन है, क्योंकि दोनों घटनाएं संदिग्ध परिस्थितियों में हुईं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील वीनीत धांदा ने कहा कि इसी तरह के जुड़े मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया गया है।
कोर्ट ने कहा, ''आपके पास केस हो सकता है या नहीं, लेकिन आप हाईकोर्ट क्यों नहीं जा रहे हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट में क्या बुराई है। वे सभी अधिकारियों को जानते हैं और उनके पास सबूत हैं। यदि आपको समस्या होती है तो यहां आइए।'' इसके साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की छूट दी और हाईकोर्ट जाने को कहा।
याचिका में कहा गया है, ' सुशांत सिंह राजपूत के मौत के बाद दिशा और सुशांत की मौत के बीच कई अफवाहों और साजिशों की बात हुई, क्योंकि दोनों की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई, वे दोनों अपने प्रोफेशनल करियर में पीक पर थे।'

16-10-2020
सुप्रीम कोर्ट ने उद्धव सरकार को हटाने वाली याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

मुंबई। महाराष्ट्र में सीएम उद्धव ठाकरे और राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के बीच सब कुछ ठीक नहीं है। दोनों की तरफ से लगातार हुई बयानबाजी से यह बातें साफ हो जाती है। इसी बीच महाराष्ट्र की उद्धव सरकार को हटाने और राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई थी। हालंकि सुप्रीमकोर्ट  ने इस पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। बता दें कि देश की सबसे बड़ी अदालत में दायर याचिका में कहा गया था कि महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे की अगवाई वाली सरकार को तुरंत बर्खास्त किया जाए। साथ ही राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लगाया जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई से साफ मना कर दिया है। 

15-10-2020
अमित और ऋचा जोगी के अधिवक्ताओं ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी को लिखा पत्र,नामांकन पत्र स्वीकार करवाने किया निवेदन

रायपुर/बिलासपुर। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने सुप्रीम कोर्ट के अपने अधिवक्ता (एओआर) पीएन पुरी के माध्यम से भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र लिखा है। उन्होंने कहा है कि उनके मुवक्किल ने 24 सितंबर को छत्तीसगढ़ शासन की ओर से छत्तीसगढ़ अनुसूचित जाति जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग अधिनियम 2013 में नियम विरुद्ध किए गए संशोधन को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका लगाई है। उपरोक्त संशोधन राज्य सरकार की ओर से केवल अमित जोगी के नामांकन पत्र को गैर-कानूनी तरीके से रद्द करने की दुर्भावना से किए गए हैं। पुरी ने यह भी जानकारी दी है कि अमित जोगी के कंवर जनजाति होने की पुष्टि स्वयं उच्च न्यायालय उनके विरुद्ध दायर चुनाव याचिका में कर चुकी है। इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की अवधि भी समाप्त हो चुकी है। अत: उच्च न्यायालय के इस फैसले ने अंतिम रूप धारण कर लिया है। साथ ही, उच्च न्यायालय ने उच्च स्तरीय छानबीन समिति की ओर से उनके पिता स्व.अजीत जोगी के जाति प्रमाणपत्र को निरस्त करने के आदेश में स्टे (रोक) लगा दी है। पुरी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त से सर्वोच्च न्यायालय के इस मामले में फैसले न आ जाने तक मरवाही उप-चुनाव के निर्वाचन अधिकारी को सरकार के राजनीतिक दबाव में न आकर अमित जोगी का नामांकन पत्र को रद्द न करते हुए उसे स्वीकार करने के निर्देश देने का निवेदन किया है।

अमित जोगी की धर्मपत्नी डॉ.ऋचा जोगी ने भी अपने अधिवक्ता गैरी मुखोपाध्याय के माध्यम  से भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र लिखा है। उन्होंने कहा है कि उनके मुवक्किल ने भी मुंगेली जिला सत्यापन समिति के समक्ष चल रहे प्रकरण की वैधानिकता के विरुद्ध उच्च न्यायालय में याचिका लगाई है। अगर 24 सितंबर को छत्तीसगढ़ शासन की ओर से छत्तीसगढ़ अनुसूचित जाति जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग अधिनियम 2013 में नियम विरुद्ध किए गए संशोधन को स्वीकार भी कर लें, तब भी उपरोक्त समिति को ऋचा जोगी का जाति प्रमाण पत्र निलंबित करने का मात्र अधिकार प्राप्त है। और जब तक उनका प्रमाण पत्र पूर्ण रूप से निरस्त नहीं किया जाता है, उसको स्वीकार करने के अलावा निर्वाचन अधिकारी के पास कोई दूसरा वैधानिक विकल्प नहीं है। मुखोपाध्याय ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त से सर्वोच्च न्यायालय के इस मामले में फैसले न आ जाने तक मरवाही उप-चुनाव के निर्वाचन अधिकारी को सरकार के राजनीतिक दबाव में न आकर अमित जोगी का नामांकन पत्र को रद्द न करते हुए उसे स्वीकार करने के निर्देश देने का निवेदन किया है।

15-10-2020
हाथरस के सामूहिक दुष्कर्म मामले की मॉनिटरिंग करे इलाहाबाद हाईकोर्ट : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि एक दलित युवती के साथ कथित गैंगरेप और बर्बरता के चलते हुई उसकी मौत को लेकर हाथरस केस की इलाहाबाद हाईकोर्ट को मॉनिटर करने की इजाजत दी जाती है। एक जनहित याचिका और वकीलों और कार्यकर्ताओं की तरफ से दायर कई याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत को यह कहा गया कि उत्तर प्रदेश में निष्पक्ष ट्रायल संभव नहीं है क्योंकि कथित तौर पर जांच को भटका दिया गया है।
मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस आशंका को खारिज करते हुए कहा,"उच्च न्यायालय को इससे निपटने देना चाहिए। यदि कोई समस्या है तो हम यहां हैं।" सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अलावा सुनवाई के दौरान हरीश साल्वे, इंदिरा जयसिंह और सिद्धार्थ लूथरा जैसे वकील कई पक्षों की तरफ से पेश हुए थे। कोई वकील इसके विरोध में बहस नहीं करना चाहते थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा- "हमें पूरी दुनिया की सहायता की जरूरत नहीं है।" सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि किसी भी मामले में पीड़ित की पहचान का खुलासा नहीं किया जाता है और उसके परिवार के सदस्यों और गवाहों को पूरी सुरक्षा और सुरक्षा दी जाती है।

पीड़ित परिवार की तरफ से पेश हुए वकील ने हाथरस केस को उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय राजधानी में ट्रांसफर किए जाने की मांग की। कार्यकर्ता और वकील इंदिरा जयसिंह ने राज्य में निष्पक्ष ट्रायल होने पर शंका जताते हुए गवाहों की सुरक्षा को लेकर दलीलें दी। शुरुआत में, सॉलिसिटर जनरल ने हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर हलफनामे का उल्लेख किया,जिसमें मामले में पीड़ित परिवार और गवाहों को प्रदान की गई सुरक्षा और सुरक्षा के बारे में विवरण दिया गया था। राज्य सरकार जिसने पहले ही केस सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया है और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच को सहमति दे दी है, उसने सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गवाहों की सुरक्षा और पीड़ित के परिवार को वकील दिए जाने के बारे में मांगे गए ब्यौरे पर हलफनामा दायर किया था। अनुपालन हलफनामे का उल्लेख करते हुए तुषार मेहता ने कहा कि पीड़ित के परिवार ने सूचित किया है कि उन्होंने वकील रख ली है और उन्होंने यह भी अनुरोध किया है कि सरकारी वकील को भी उनकी तरफ से इस मामले को देखना चाहिए।

 

06-10-2020
हाथरस कांड: सुप्रीम कोर्ट ने योगी सरकार से हलफनामा दाखिल करने कहा, अगले सप्ताह होगी सुनवाई

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हाथरस सामूहिक दुष्कर्म घटना को भयानक बताते हुए उत्तप्रदेश सरकार के कई सवाल पूछे। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को हलफनामा दाखिल कर बताने को कहा कि हाथरस मामले में गवाहों की सुरक्षा कैसे की जा रही है। मामले की सुनवाई अगले हफ्ते के लिए सूचीबद्ध की गई है।प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध एक जनहित याचिका की प्रतिक्रिया में प्रदेश सरकार ने उच्चतम न्यायालय से हाथरस मामले में सीबीआई जांच का निर्देश देने का अनुरोध किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट को बताया कि वह निष्पक्ष जांच में निहित स्वार्थों द्वारा उत्पन्न की जा रही बाधाओं से बचने के लिए सीबीआई जांच कराने का आदेश देने का अनुरोध कर रही है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने चीफ जस्टिस एसए बोबड़े, एएस बोपन्ना और वी रामासुब्रमणियन की पीठ को बताया कि उसने पहले ही केंद्र से हाथरस मामले में सीबीआई जांच कराने का अनुरोध किया है। योगी सरकार ने कहा कि सीबीआई जांच सुनिश्चित करेगी कि कोई निहित स्वार्थ से गलत और झूठे विमर्श नहीं रच पाएगा।

सरकार ने कहा कि इस मामले में तरह-तरह की बातें फैलाईं जा रही हैं, इस पर रोक लगाए जाने की जरूरत है।सुप्रीम कोर्ट ने कुछ याचिकाकर्ताओं से उनका मामले से संबंध पूछा और कहा कि हाथरस मामला काफी महत्वपूर्ण है, इसलिए उनकी सुनवाई की जा रही है। उच्चतम न्यायालय ने हाथरस मामले में वकीलों से कहा कि यह एक भयानक घटना है और हम अदालत में दलीलों का दोहराव नहीं चाहते।उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सुप्रीम कोर्ट ने यह बताने के लिए कहा कि हाथरस मामले में गवाहों और पीड़ित परिवार के सदस्यों की सुरक्षा कैसे की जा रही है? उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हम इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सामने कार्यवाही के दायरे के बारे में सभी से सुझाव चाहते हैं और हम इसका दायरा बढ़ाने के लिए क्या कर सकते हैं? पीठ ने यूपी सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसीटर जनरल से यह भी पछा कि क्या पीड़ित परिवार ने प्रतिनिधित्व के लिए कोई वकील चुना है?

 

04-10-2020
बैंक और कारोबारियों को एक साथ करोड़ों का चूना लगाने वालों को सालों से गिरफ्तार नहीं कर पा रही है पुलिस,आखिर क्यों?

रायपुर। एक जमीन को पंजाब नेशनल बैंक में बंधक रखा और करोड़ों रुपए का उस पर कर्ज ले लिया। फिर उसी जमीन को कुछ व्यापारियों को बेच दिया और करोड़ों रुपए उनसे भी हड़प लिये। मामला खुला तो पुलिस की लापरवाही का फायदा उठाकर सुप्रीम कोर्ट से जमानत ले ली। ऐशो आराम की ज़िंदगी जीते रहे,देश विदेश घूमते रहे और ठगी के शिकार न्याय के लिए दर दर भटकते रहे हैं। हालांकि इस मामले में आरोपी प्रकाश कलश को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है लेकिन उस पत्नी कंचन कलश और साला अभी भी फरार बताए जा रहे हैं। उन्हें जमानत नहीं मिली है लेकिन पता नहीं क्यों रायपुर पुलिस जो गरीबों को डंडे मार कर गिरफ्तार कर लेती है इस मामले में खामोश है।

मामला है धरमपुरा की जमीन का। धरमपुरा की जमीन को प्रकाश कलश,कंचन कलश और विक्रम राणा ने पंजाब नेशनल बैंक में बंधक रखकर उस पर कर्ज ले लिया था। दशमलव 167 हेक्टेयर जमीन जो बंधक रखी हुई थी उसी जमीन को जगदीश सिंह बग्गा,त्रिलोचन सिंह और परविंदर सिंह को तथा उसका एक टुकड़ा शरद गोयल को उन्होंने बेच दिया। जब मामला खुला तो पता चला करोड़ों रुपए की ठगी के शिकार हुए हैं। शरद गोयल,त्रिलोचन सिंह बग्गा और उनके साथ ही बैंक को भी करोड़ों का चूना लगाने में सफल रहे प्रकाश कलश उनकी पत्नी कंचन  कलश और उनका साला विक्रम राणा। इस मामले में ठगी के शिकार कारोबारी दर-दर भटक रहे हैं। उनमें से एक छत्तीसगढ़ रियल स्टेट के संचालक की उम्र काफी हो चुकी है। हैरानी की बात यह है की ढाई साल पहले मामला सिविल लाइन थाना जब दर्ज हुआ तब से लेकर आज तक पुलिस गिरफ्तारी में इंटरेस्ट दिखाने की वजह ना जाने क्यों कलश परिवार व विक्रम राणा को जमानत लेने के लिए समय देती आ रही है। इस मामले में प्रकाश कलश ने कोर्ट की शर्त पर 50 लाख रूपये जमा करके सुप्रीम कोर्ट से जमानत ले रखी है। ये उसकी बदनीयती का सबूत है।वो गिरफ्तारी से बचने के लिए कोर्ट में 50 लाख रुपये जमा करा सकता है लेकिन बैंक व अन्य कारोबारियों को जिन्हें उसने धोखा दिया है रकम नहीं लौटा रहा है। बहरहाल अन्य आरोपी कंचन कलश और विक्रम राणा की जमानत नहीं हुई है।

अब सवाल ये उठता है कि पुलिस इतना सब होने के बाद भी कंचन राणा और विक्रम की गिरफ्तारी क्यों नहीं कर रही है? क्या रायपुर पुलिस कंचन कलश और विक्रम राणा को गिरफ्तारी से बचने के लिए जमानत लेने के लिए समय दे रही है? या फिर ढाई साल होने के बावजूद उनकी गिरफ्तारी नहीं होना इस बात का प्रमाण है कि पुलिस उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती? या फिर इस बात का प्रमाण है कि उनके रसूख के सामने छत्तीसगढ़ पुलिस बौनी है? या फिर इस बात का सबूत है कि पुलिस के हाथ से ज्यादा लंबे हाथ प्रकाश कलश कलश और विक्रम राणा के है? या फिर इस बात का सबूत है कि रायपुर पुलिस में हिम्मत ही नहीं है कि वह बड़े लोगों को गिरफ्तार कर सके? देखना यह होगा कि क्या उम्रदराज हो चुके छत्तीसगढ़ स्टेट के संचालक को उनके जीते जी न्याय मिल सकता है? या फिर पुलिस ऐसे ही मामले को खींचते चली जाएगी और आरोपियों को जमानत लेने का मौका मिल जाएगा।और जिनको इन लोगों ने बैंक में  बंधक जमीन को धोखाधड़ी कर बेचा है वो उम्र भर न्याय के लिए भटकते रहेंगे।

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