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30-05-2020
‘इंडिया’ शब्द हटाकर ‘भारत’ या ‘हिंदुस्तान’ करने की मांग, 2 जून को होगी सुनवाई

 नई दिल्ली। देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई है, जिसमें केंद्र सरकार के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 1 में संशोधन करके इंडिया शब्द हटा कर देश का नाम भारत या हिन्दुस्तान रखने की मांग की गई है। यह अनुच्छेद देश के नाम और इलाके को परिभाषित करता है। अब सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर 2 जून को सुनवाई करेगा। बता दें कि इस याचिका पर 29 मई  को ही सुनवाई होनी थी लेकिन 29 मई को मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे के मौजूद न होने के कारण अन्य कुछ मामलों के साथ इस मामले की सुनवाई भी 2 जून तक के लिए टाल दी।

इंडिया शब्द गुलामी का प्रतीक :

दरअसल दिल्ली के रहने वाले एक व्यक्ति ने याचिका दाखिल कर कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 1 में संशोधन कर इंडिया शब्द हटा दिया जाए। कहा गया है कि अभी अनुच्छेद 1 कहता है कि भारत अर्थात इंडिया राज्यों का संघ होगा। याचिका में कहा गया है कि इसकी जगह संशोधन करके इंडिया शब्द हटा दिया जाए और भारत या हिन्दुस्तान कर दिया जाए। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने कहा है कि इंडिया शब्द गुलामी का प्रतीक लगता है। देश को मूल और प्रमाणिक नाम भारत से ही मान्यता दी जानी चाहिए। इससे लोगों में राष्ट्रीय भावना भी पनपेगी। इंडिया शब्द की जगह भारत करने से हमारे पूर्वजों के कठिन संघर्ष से प्राप्त आजादी के साथ न्याय होगा।

याचिकाकर्ता  द्वारा आर्टिकल 1 में संशोधन की मांग :

गौरतलब है कि याचिका में 1948 में तत्कालीन प्रस्तावित संविधान के आर्टिकल 1 पर हुई संविधान सभा की बहस का हवाला देते हुए कहा गया है कि देश का नाम भारत या हिंदुस्तान रखने के पक्ष में मजबूत धारणा थी। याचिका कहती है, ‘हालांकि, अब देश को इसका मूल और वास्तविक नाम भारत देने का वक्त आ गया है जो है, खासकर तब जब हमारे शहरों के नाम भारत की आत्मा से जोड़कर बदले जा रहे हैं।

29-05-2020
तलाकशुदा बेटी को क्यों नहीं मिलना चाहिए स्वतंत्रता सेनानी पेंशन का लाभ : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को केंद्र से पूछा है कि स्वतंत्रता सेनानी पेंशन का लाभ स्वतंत्रता सेनानी की तलाकशुदा बेटी को क्यों नहीं मिलना चाहिए? जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने तुलसी देवी की इस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। सरकार को जुलाई के आखिरी हफ्ते तक जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है। इससे पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने तुलसी देवी की याचिका को खारिज कर दिया था।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से हुई इस सुनवाई में याचिकाकर्ता महिला की ओर से पेश वकील दुष्यंत पाराशर ने पीठ से कहा कि उनकी मुवक्किल के पिता गोपाल राम स्वतंत्रता सेनानी थे, जिस कारण उन्हें स्वतंत्रता सेनानी पेंशन मिलता था। उनकी तलाकशुदा बेटी तुलसी उनके साथ रहती थी और वह पूरी तरह से अपने माता पिता पर आश्रित थी। पिता की मृत्यु के बाद तुलसी पूरी तरह से अपनी मां कौशल्या पर आश्रित हो गई। अपने जीवनकाल में कौशल्या ने जनवरी, 2018 में प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आग्रह किया कि स्वतंत्रता सेनानी पेंशन का लाभ उसके बाद बेटी को मिले, क्योंकि उनकी बेटी पूरी तरह से उसी पर निर्भर है और उसके पास आमदनी का कोई और जरिया भी नहीं है।

सितंबर 2018 में उनके इस आग्रह को नकार दिया गया, जिसके बाद तुलसी ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन योजना के प्रावधानों में इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है। जिसके बाद तुलसी ने हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की। याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत पाराशर ने पीठ के समक्ष पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की तरफ से साल 2016 में दिए उस फैसले का हवाला दिया जिसमें इसी तरह की राहत दी गई थी, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को प्रगतिशील और सामाजिक रूप से रचनात्मक दृष्टिकोण वाला बताया था। साथ ही पाराशर ने साल 2012 के उस सर्कुलर का भी हवाला दिया है, जिसमें तलाकशुदा बेटी को पेंशन देने का प्रावधान है।

26-05-2020
सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को स्वत: संज्ञान में लिया, 28 मई को होगी सुनवाई

नई दिल्ली। लॉक डाउन के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे प्रवासी मजदूरों की समस्याओं और मुसीबतों का सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 28 मई के लिए सूचीबद्ध किया है और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से इस मामले में सहयोग करने को कहा है।जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट इस मामले पर 28 मई को सुनवाई करेगा।कोर्ट ने कहा है कि इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार, दोनों ओर से कमियां रही हैं। कोर्ट ने कहा कि प्रवासी मजदूरों को आवास, भोजन और यात्रा की सुविधा देने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत है। बता दें कि लॉक डाउन के चलते लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर उन राज्यों में फंस गए थे जहां वह काम करने गए थे। आय और भोजन का कोई साधन न होने के चलते कई श्रमिक घर जाने के लिए पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा पर निकल गए थे। हालांकि, बाद में केंद्र सरकार ने इन मजदूरों को घर पहुंचाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन और बस सुविधा संचालित करने का फैसला किया था। मजदूरों के पलायन के बाद मानवता को शर्मसार कर देने वाली घटनाएं सामने आई हैं। कहीं, गर्भवती महिला ने सड़क पर ही बच्चे को जन्म दिया और उसके कुछ घंटे बाद फिर यात्रा शुरू कर दी। वहीं, कुछ मजदूरों की ट्रेन के नीचे आ जाने से हुई मौत ने भी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। 

 

25-05-2020
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और एयर इंडिया से कहा-लोगों की करनी चाहिए चिंता, विमान में बीच की सीट छोड़े खाली

नई दिल्ली। कोरोना वायरस के कारण पिछले लगभग दो महीने से देश में जारी लॉकडाउन के बीच सोमवार से घरेलू विमान सेवाओं  को शुरू कर दिया गया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस एसए बोबडे ने केंद्र सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि 'क्या कोरोना वायरस ये सोच कर काम करेगा कि वो घरेलू विमान में है या विदेश से आने वाले विमान में।' उन्होंने सरकार के वकील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को याद दिलाते हुए कहा कि सोशल डिस्टेंसिंग का नियम सरकार ने ही बनाया था और इससे समझौता नहीं हो सकता।सुप्रीम कोर्ट ने एयर इंडिया से साफ तौर पर कहा है कि अगले 10 दिनों तक पूर्ण उड़ाने चलाई जा सकती हैं लेकिन दस दिन बाद एयर इंडिया के विमान में बीच की सीट को खाली छोड़ना अनिवार्य होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना हर किसी के लिए अनिवार्य है। चूंकि 10 दिन के टिकट की बुकिंग पहले से हो चुकी हैं, इसलिए 10 दिन बाद बीच की सीट खाली छोड़ना अनिवार्य है।वहीं दूसरी तरफ इस पर केंद्र सरकार की तरफ से तर्क दिया गया कि विदेशी विमानों की कमी है। जबकि ज़्यादा से ज़्यादा पैसेंजर को भारत वापस लाना है। इस कारण सभी सीटों पर बुकिंग की जा रही है। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि जो टिकट बुक हुए हैं उसको कैंसल करके आने वाली उड़ानों के लिए किया जा सकता है।बता दें कि भारत सरकार 'वंदे भारत मिशन' के तहत दुनिया के अन्य देशों में फंसे भारतीय नागरिकों आज से विमान से वापस ला रही है। इसके तहत एयर इंडिया के सभी सीटों पर टिकट बुक किए गए हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और एयर इंडिया पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें लोगों की चिंता करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्य सीट को खाली नहीं रखने का सर्कुलर परेशान करने वाला है।

 

25-05-2020
ईद की छुट्टी के बाद भी महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में 

नई दिल्ली। न्याय की खातिर विभिन्न अवसरों पर आधी रात को सुनवाई करने वाला उच्चतम न्यायालय आज ईद उल फितर के अवकाश के बावजूद एक महत्वपूर्ण मामले की तत्काल(अर्जेंट) सुनवाई करेगा। मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति हृषिकेश राय की खंडपीठ बॉम्बे उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार और एयर इंडिया की अपील पर त्वरित सुनवाई करेगी। शीर्ष अदालत में ईद उल फितर की आज की छुट्टी पहले से निर्धारित थी, लेकिन रविवार देर रात सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री की ओर से संबंधित मुकदमे को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया।

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कोरोना महामारी से बचाव को ध्यान में रखते हुए विदेश से आने वाली उड़ान में एयर इंडिया को बीच की सीट खाली रखने का आदेश दिया है, जिसे केंद्र और एयर इंडिया ने शीर्ष अदालत में चुनौती दी है। एयर इंडिया के पायलट देवेन कनानी ने विमानों में बीच की सीट खाली ना रखे जाने को लेकर बॉम्बे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार के वंदे भारत मिशन के तहत विदेशों से भारतीयों को स्वदेश वापस लाने में अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में बीच की सीटें खाली नहीं रखी जा रही है, जो गत 23 मार्च के गृह मंत्रालय के सोशल डिस्टेंसिंग के आदेश का उल्लंघन है। इसके बाद उच्च न्यायालय ने बीच की सीटें खाली रखने का एयर इंडिया को निर्देश दिया था। अब केंद्र सरकार और एयर इंडिया ने उसे उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है। साथ ही न्यायालय से अर्जेंट सुनवाई के लिए आग्रह किया, जिसके बाद इस मामले को आज सुबह साढ़े 10 बजे सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश की बेंच के समक्ष सूचीबद्ध कर दिया गया।

19-05-2020
अशोक चतुर्वेदी को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत, ईओडब्ल्यू एसीबी में हुई दो एफआईआर पर लगा स्टे

रायपुर। सर्वोच्च न्यायालय से आज पाठ्य पुस्तक निगम के महाप्रबंधक अशोक चतुर्वेदी को थोड़ी राहत मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने अशोक चतुर्वेदी पर ईओडब्ल्यू एसीबी रायपुर में हुई एफआईआर के विरूद्ध याचिका पर सुनवाई हुई। एफआईआर पर स्टे लगाते हुए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में सुनवाई तक अशोक चतुर्वेदी को परेशान ना करने कहा गया। बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना के समक्ष सुनवाई हुई। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर 16/2019 और 19/2020 में स्थगन आदेश दिया है। कहा गया कि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई तक किसी भी प्रकार से याचिका कर्ता को परेशान ना किया जाए।

याचिका कर्ता के वकीलों ने बताया कि राज्य के बड़े उच्चाधिकारियों के दबाव में दुर्भावना वश बार-बार एफआईआर की जा रही है जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीरता से लेते हुए स्थगन आदेश जारी किया है। यह भी बताया गया कि तीन मामलों में पूर्व में उच्च न्यायालय से अंतरिम राहत दिए जाने के बावजूद अवमानना करते हुए एफआईआर पंजीबद्ध की गई, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने अवमानना याचिका की बात भी कही। मामले की पैरवी सुप्रीम कोर्ट के सीनियर अधिवक्ता मुकुल रोहोतगी और उनके साथी अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव, आशुतोष पाण्डेय, शशांक ठाकुर, एव्ही श्रीधर और हिमांशु सिन्हा ने की।

14-05-2020
ब्रिटेन की कोर्ट ने दिया विजय माल्या को झटका, अब लौटाना होगा भारत

नई दिल्ली। विजय माल्या को ब्रिटेन में बड़ा झटका लगा है। माल्या ने पिछले दिनों लंदन हाई कोर्ट के प्रत्यर्पण संबंधी फैसले के खिलाफ ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने की ब्रिटिश प्रशासन से अनुमति मांगी थी,जिसे अब खारिज कर दिया गया है। ऐसे में अब साफ है कि माल्या को भारत लौटना होगा। आज ही शराब कारोबारी विजय माल्या ने सरकार से 100 प्रतिशत कर्ज चुकाने के उनके प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए कहा। साथ ही उन्होंने सरकार से उनके खिलाफ मामले बंद करने की अपील भी की। माल्या ने हाल में घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज पर भारत सरकार को बधाई देते हुए अफसोस जताया कि उनके बकाया चुकाने के प्रस्तावों को बार-बार नजरअंदाज किया गया।

13-04-2020
सुप्रीम कोर्ट ने तब्लीगी जमात के मीडिया कवरेज पर अंतरिम निर्णय देने से किया इनकार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तब्लीगी जमात के मीडिया कवरेज को लेकर दायर याचिका पर कोई अंतरिम निर्णय देने से इनकार कर दिया है। अगले सप्ताह कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई की जाएगी। गौरतलब हो कि इससे पहले दिल्ली में निजामुद्दीन मरकज के तब्लीगी जमात और इसे लेकर मुसलमानों की छवि खराब करने की कोशिश करने का आरोप लगाते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद कुछ न्यूज चैनलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था। जमीयत अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी का कहना था कि हमारी शिकायत की बुनियाद पर कोर्ट सख्त रवैया अपनाएगा क्योंकि पहले भी इस सिलसिले में कड़ी हिदायत दी गई है।  मौलाना मदनी ने बताया था कि इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है क्योंकि तब्लीगी जमात की जो तस्वीर पेश की जा रही है, उससे लगता है कि मुल्क के अंदर कोरोना इन्हीं लोगों की वजह से आया है। इसके नाम पर पूरी मुस्लिम कौम को दागदार करने की कोशिश की जा रही है। कुछ टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर भी मुस्लिमों की छवि को गलत ढंग से पेश किया जा रहा है।मौलाना मदनी ने कहा कि बहुत से समझदार पढ़े लिखे हिंदू और कुछ मीडिया वाले ऐसे भी हैं, जो इसे नापसंद कर रहे हैं। खुशी की बात यह है कि खुद आरएसएस के नेता मनमोहन वैद्य का कहना है कि मुसलमानों की छवि खराब न की जाए। उन्होंने कहा कि बाहर से आने वालों में हिंदू भी हैं और मुसलमान भी, जो इस वायरस को लेकर आए हैं, लेकिन सिर्फ मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराना गलत है।

08-04-2020
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तब्लीगी जमात का मामला, सीबीआई जांच की मांग

नई दिल्ली। तब्लीगी जमात का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। अजय गौतम ने देश के प्रधान न्यायाधीश को एक पत्र लिखकर तब्लीगी जमात पर बैन लगाने व उसकी तमाम गतिविधियों पर रोक लगाने की गुहार की है। अजय गौतम ने गुहार लगाई है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिल्ली सरकार और गृह मंत्रालय को तब्लीगी जमात की सभी गतिविधियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने का निर्देश पारित किया जाना चाहिए। साथ ही इस पत्र में यह भी कहा गया है कि दिल्ली नगर निगम अधिनियम के तहत तब्लीगी जमात की निजामुद्दीन स्थित बिल्डिंग को गिराया जाए। इसके अलावा तब्लीगी जमात पर कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलाने के कथित आरोप की जांच सीबीआई से कराने की मांग की गई है। उन्होंने पिटीशन दाखिल करके मांग की है कि इसे जनहित याचिका के तौर पर देखा जाए और सुनवाई की जाए।

26-03-2020
 छत्तीसगढ़ की जेल में बंद कैदियों को पैरोल मिले या नहीं, हाई पॉवर कमेटी की बैठक में हुआ यह निर्णय

रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य की जेलों में परिरूद्ध 7 वर्ष या उससे कम सजा वाले कैदियों या विचाराधीन बंदियों को पैरोल अथवा जमानत पर छोड़ने के संबंध में हाई पॉवर कमेटी की बैठक हुई। सुप्रीम कोर्ट के द्वारा  में पारित आदेश के अनुपालन में विडियो टेली कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हाई पॉवर कमेटी की बैठक हुई। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा कार्यकारी अध्यक्ष राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की अध्यक्षता में हुई। बैठक में राज्य शासन की ओर से सुब्रत साहू अपर मुख्य सचिव गृह एवं जेल, एनके चन्द्रवंशी प्रमुख सचिव विधि विभाग, संजय पिल्ले अतिरिक्त महानिदेशक जेल और सिद्धार्थ अग्रवाल सचिव राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण शामिल हुए।
हाई पॉवर कमेटी ने इन बिन्दुओं पर निर्णय लिया कि, 7 वर्ष या उससे कम सजा वाले प्रदेश की जेलों में परिरूद्ध सभी पात्र कैदियों को प्रचलित अधिनियम एवं नियमों के तहत पैरोल पर रिहा करने विचार किया जाएगा। इनके न्यायालयों द्वारा जमानत पर छोड़ने पर विचार किया जाएगा। प्रदेश् की जिन जेलों में ओवर क्राउडिंग की समस्या है, वहां से बंदियों को अन्य जेलों में जहां जगह उपलब्ध है, स्थानांतरण करने के संबंध में अतिरिक्त महानिदेशक जेल विचार करेंगे।
बताया गया कि कोरोना वायरस के की रोकथाम के लिए जेल प्रशासन की ओर से आइसोलेशन वार्ड बनाने, नए बंदियों की स्क्रीनिंग, मेडिकल सहायता के संबंध में काम किया जाएगा। इसके साथ ही अन्य निर्णय भी लिए गए जिसके कठोरता से पालन की बात कही जा रही है।

23-03-2020
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को दिया आदेश, कहा- 7 वर्ष से कम के सजायाफ्ता कैदियों को दें पैरोल

नई दिल्ली। भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण के खतरे के मध्य सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला लिया है। फैसले के मुताबिक देश में मौजूद सभी जेलों में सजा काट रहे वे कैदी जिनकी सजा 7 वर्ष से कम है उन्हें पैरोल दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कैदियों को 6 सप्ताह के लिए पैरोल देने को कहा है। इस फैसले से जेलों में मौजूद हजारों कैदियों को पैरोल मिलने का रास्ता साफ हो गया है। ज्ञातव्य है कि कोरोना का खतरा दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। अब तक देश में 418 मामले सामने आ चुके हैं। यहीं नहीं 8 लोगों की मौत भी हो चुकी है। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आदेश देते हुए कहा कि राज्य सरकारें हाई पॉवर कमेटी का गठन करें। इस समिति में लॉ सेकेट्ररी, राज्य लीगल सर्विस ऑथोरिटी के चैयरमैन, जेल के डीजी को शामिल किया जाए। कमेटी तय करे कि 7 वर्ष की सज़ा वाले मामलो में किन सजायाफ्ता दोषियो और अंडर ट्रायल कैदियों को पैरोल या अन्तरिम ज़मानत पर छोड़ा जाए। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया है।

20-03-2020
Breaking : निर्भया के चारों गुनहगारों को तिहाड़ जेल में दी गई फांसी

रायपुर। निर्भया के चारों गुनहगारों को आखिरकार तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई है। ठीक साढ़े 5 बजे तय समय पर चारों दोषियों को फांसी दी गई। निर्भया को सात साल, तीन महीने बाद इंसाफ मिला है। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद  तय दिन और समय पर ही फांसी दी गई। तिहाड़ जेल के बाहर बड़ी संख्या में लोग मौजूद हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम है। चारों दोषियों विनय, अक्षय, मुकेश और पवन को एक साथ फांसी के फंदे पर लटकाया गया। इनके शवों को पोस्टमार्टम के लिए ले जाया जाएगा।

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