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11-11-2019
इस रहस्यमयी डिब्बे में बंद हैं चंद्रमा के राज, नासा ने 47 साल बाद खोला

नई दिल्ली। चांद  के रहस्यों को उजागर करने और वहां पानी व जीवन की संभावनाएं तलाशने के लिए स्पेस एजेंसियां  कई साल से शोध कर रही हैं। इसी के तहत अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 47 साल बाद वो डिब्बा खोला है, जिसमें चांद के रहस्य छिपे हैं। दरअसल इसमें चांद की मिट्टी और चट्टानों के सैंपल  हैं। इन्हें 1972 में नासा के अपोलो 17 चंद्र अभियान के दौरान लिया गया था। अब नासा इन पर शोध करके इनसे प्राप्त नतीजों को 2024 में लॉन्च होने वाले आर्टिमिस मिशन के लिए इस्तेमाल करेगी। नासा ने 1972 में अपने अपोलो 17 चंद्र मिशन के तहत तीन अंतरिक्ष यात्रियों को चांद पर भेजा था। इसमें यूगीन सरनन, हैरसिन स्मिथ और रोनाल्ड इवंस शामिल थे। इनमें से सरनन और स्मिथ ने चांद की सतह से मिट्टी और चट्टानों के नमूने लिए थे। नासा के सभी अपोलो मिशन के तहत चांद से करीब 386 किलोग्राम नमूने लाए गए थे। नासा ने 5 नवंबर को इनमें से कुछ नमूनों को खोला है।

इसे ह्यूस्टन में स्थित नासा के जॉनसन स्पेस सेंटर की लूनर क्यूरेशन लैबोरेटरी में वैज्ञानिकों ने खोला है। चांद से लाए गए कुल 386 नमूनों में से नासा ने कुछ नमूने सुरक्षित रख लिए थे। नासा का मानना था कि भविष्य में जब इनके अध्ययन की और बेहतर तकनीक आ जाएंगी तो इन्हें निकालकर शोध किया जाएगा। नासा के वैज्ञानिक डॉक्टर साराह नोबल ने कहा कि इस वक्त हम वे शोध भी करने में सक्षम हैं जो उस समय नहीं थे, जब ये नमूने लाए गए थे। उनके अनुसार इन नमूनों के अध्ययन से भविष्य में होने वाले चंद्र अभियानों में इस्तेमाल होने वाली तकनीकों और वैज्ञानिकों के शोध में काफी मदद मिलेगी। इससे नई संभावनाएं भी उजागर होंगी। नासा ने सभी नमनों में से दो सैंपल अध्ययन के लिए चुने हैं। इन्हें वैज्ञानिक नाम 73002 और 73001 दिया गया है। 73002 को नासा के वैज्ञानिकों ने पूरी तरह से खोल दिया है। जबकि 73001 को माना जा रहा है कि जनवरी 2020 में खोला जाएगा। इन दोनों नमूनों को दो फुट लंबे ट्यूब में लिया गया था। इन्हें चांद के लारा क्रेटर के पास हुए भूस्खलन की साइट से लिया गया था। नासा ने इनको खोलने से पहले इनका एक्सरे लिया था। ये सैंपल एक डिब्बे में रखे हैं। इनके अंदर सूखी नाइट्रोजन है। ऐसा इन्हें खराब होने से बचाने के लिए किया गया है।

19-10-2019
दो महिलाओं ने अंतरिक्ष में चहलकदमी कर रचा इतिहास

नई दिल्ली। अंतरिक्ष में पहली बार सिर्फ महिलाओं ने चहलकदमी कर नया इतिहास रच दिया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब बिना किसी पुरुष अंतरिक्ष यात्री के दो महिला अंतरिक्ष यात्रियों की जोड़ी ने स्पेसवॉक किया है। अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री क्रिस्टीना कोच और जेसिका मीर स्पेसवॉक करने वाली पहली महिला जोड़ीदार बन गई हैं। इस ऐतिहासिक वाकये को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के बाहर उस वक्त अंजाम दिया गया, जब क्रिस्टीना और जेसिका टूटे हुए बैटरी चार्जर को बदलने के लिए स्टेशन से बाहर अंतरिक्ष में चहलकदमी करती नजर आईं। यह मिशन वैसे तो इस साल मार्च में शुरू होने वाला था, मगर नासा के पास सिर्फ एक ही मध्यम साइज का सूट था। दरअसल नासा के पास अंतरिक्ष यात्रियों के लिए जो कपड़े थे, उनमें सिर्फ महिला-पुरुष जोड़ीदार की साइज वाले ही कपड़े थे।

421वें स्पेसवॉक ने बनाया इतिहास

अभी तक अंतरिक्ष में 420 स्पेसवॉक हुए, जिसमें हर बार पुरुष किसी न किसी रूप में शामिल रहे हैं। लेकिन, 421वें स्पेसवॉक में यह इतिहास रचा गया, जब सिर्फ महिलाओं ने यह इबारत लिखी। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में मौजूद सभी चार पुरुष भीतर ही रहे और जबकि क्रिस्टीना और जेसिका बैटरी चार्जर बदलने के लिए अंतरिक्ष में चहलकदमी करती नजर आईं। बैटरी चार्जर उस वक्त खराब हो गया था, जब एक पुरुष सदस्य ने पिछले हफ्ते स्टेशन के बाहर नई बैटरियां लगाईं थीं। अभी तक अंतरिक्ष में 15 महिलाओं ने किसी न किसी पुरुष साथी के साथ स्पेसवॉक किया है।

सूर्य की सीधी रोशनी नहीं मिलने पर बैटरियों की जरूरत

अंतरिक्ष स्टेशन वैसे तो सौर ऊर्जा से संचालित होता है। लेकिन, जब इसे सूर्य की सीधी रोशनी नहीं मिल पाती है तो इसे बैटरियों की जरूरत होती है। ऐसे में अंतरिक्ष स्टेशन पर रहने वाले यात्री बैटरियों को नियंत्रित करते हैं।

 

17-10-2019
नासा ने किया दावा, मंगल और चाँद पर हो सकेगा ये अनोखा काम

नई दिल्ली। नासा के वैज्ञानिक हमेशा नई नई खोज करते है और हर बार कुछ ऐसा करते ही की सबको चौंका देते है। इस बार भी वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसा कर दिखाया है कि आप सभी के होश उड़ जाएंग। दरअसल नासा के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम रूप से मंगल ग्रह और चंद्रमा जैसा वातावरण और मिट्टी तैयार कर उसमें फसल उगाने में सफलता पाई है। उनका मानना है कि यदि भविष्य में मंगल ग्रह और चंद्रमा पर मानव बस्तियां बसाई जाती हैं तो उनके लिए वहां खाद्य पदार्थ उगाए जा सकेंगे। नीदरलैंड के वगेनिंगेन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि मंगल और चंद्रमा पर उगाई गई फसल से बीज भी प्राप्त किए जाने की संभावना है ताकि नयी फसल की जा सके। उन्होंने हलीम, टमाटर, मूली, राई, क्विनोआ, पालक और मटर समेत दस अलग-अलग फसल उगाई। वगेनिंगेन यूनिवर्सिटी के वीगर वेमलिंक ने कहा, ‘जब हमने कृत्रिम रूप से तैयार की गई मंगल ग्रह की मिट्टी में उगे पहले टमाटरों को लाल होते देखा तो हम उत्साह से भर गए थे। इसका मतलब था कि हमने सतत कृषि पारिस्थितिकी तंत्र की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं।’ शोधकर्ताओं ने मंगल ग्रह और चंद्रमा की धरती के ऊपरी आवरण से ली मिट्टी में सामान्य मिट्टी मिलाकर कृत्रिम रूप से ऐसा वातावरण विकसित किया था।

27-09-2019
नासा ने जारी की चंद्रयान-2 की तस्वीरें, किया ये बड़ा खुलासा

नई दिल्ली। चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर को लेकर नासा ने एक बड़ा खुलासा किया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने शुक्रवार को चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर की लैंडिंग वाली जगह की तस्वीरें जारी की है, जिसमें कहा गया है कि चांद की सतह पर विक्रम लैंडर की हार्ड लैंडिंग हुई। नासा ने चंद्रमा की परिक्रमा कर रहे अपने लूनर रिकॉनिस्सेंस ऑर्बिटर को विक्रम लैंडर के लैंडिंग साइट के ऊपर से गुजारा था, उसके ऑर्बिटर से कैद तस्वीरों को जारी किया है। नासा ने उस जगह की तस्वीरें भी जारी कीं हैं, जहां साउथ पोल पर विक्रम की लैंडिंग होनी थी। तस्वीर में धुल दिखी है। हालांकि, विक्रम कहां गिरा इस बारे में पता नहीं चला पाया है। नासा ने कहा कि विक्रम लैंडर की काफी हार्ड लैंडिंग हुई थी और चंद्रमा की सतह पर विक्रम लैंडर की लैंडिंग का सटीक स्थान अभी तक नहीं पता चल पाया है। गौरतलब है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 7 सितंबर को चंद्रमा की सतह पर लैंड करने से कुछ मिनट पहले देश के दूसरे चंद्र मिशन चंद्रयान -2 के विक्रम लैंडर से संपर्क खो दिया था।

नासा ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से ट्वीट किया, 'चंद्रमा की सतह पर नासा की हार्ड लैंडिंग हुई, यह स्पष्ट है। स्पेसक्राफ्ट किस लोकेशन पर लैंड हुआ यह अभी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। तस्वीरें केंद्र से 150 किलोमीटर दूरी से ली गई हैं। अक्टूबर में  लूनर रिकॉनिस्सेंस ऑर्बिटर दोबारा प्रयास करेगा।' 'गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के एलआरओ मिशन के डिप्टी प्रोजेक्ट साइंटिस्ट जॉन कैलर ने एक बयान में कहा कि एलआरओ 14 अक्टूबर को दोबारा उस समय संबंधित स्थल के ऊपर से उड़ान भरेगा जब वहां रोशनी बेहतर होगी। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चंद्रयान-2 के विक्रम मॉड्यूल का सात सितंबर को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने का प्रयास तय योजना के मुताबिक पूरा नहीं हो पाया था। लैंडर का आखिरी क्षण में जमीनी केंद्रों से संपर्क टूट गया था। नासा अब 14 अक्टूबर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव से अंधेरा छंटने के बाद एक बार फिर अपने लूनर रिकॉनेसा ऑर्बिटर (एलआरओ) के कैमरे से विक्रम लैंडर की लोकेशन जानने और उसकी तस्वीर लेने की कोशिश करेगा। बता दें कि पहले भी एजेंसी ऐसी कोशिशें कर चुकी है, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली।

12-09-2019
विक्रम लैंडर से संपर्क स्थापित करने नासा ने भेजा हैलो संदेश

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) चांद की सतह पर पड़े लैंडर विक्रम से दोबारा संपर्क साधने की कोशिश कर रहा है। सात सितंबर को हार्ड लैंडिंग के बाद इसरो का इससे संपर्क टूट गया था। यदि विक्रम से इसरो का संपर्क स्थापित हो जाता है तो लैंडर और रोवर अपना काम शुरू कर देंगे और भारत के इस अंतरिक्ष अभियान 100 प्रतिशत सफलता मिल जाएगी। फिलहाल यह मिशन 95 प्रतिशत सफल है। इसी बीच दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसी राष्ट्रीय वैमानिकी एवं अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) ने चांद की सतह पर गतिहीन पड़े विक्रम लैंडर से संपर्क स्थापित करने के लिए उसे हैलो का संदेश भेजा है। अपने गहरे अंतरिक्ष ग्राउंड स्टेशन नेटवर्क के जरिए नासा का जेट प्रोपल्सन लैबोरेटरी (जेपीएल) ने लैंडर के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए विक्रम को एक रेडियो फ्रीक्वेंसी भेजी है। नासा के एक सूत्र ने इस बात की पुष्टि की। सूत्र ने कहा कि हां नासा/जेपीएल विक्रम से गहरे अंतरिक्ष नेटवर्क (डीप स्पेस नेटवर्क- डीएसएन) के जरिए संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। जिसके लिए इसरो सहमत है। विक्रम से संपर्क स्थापित करने की उम्मीदें दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। 14 पृथ्वी दिवस के बाद 20-21 सितंबर को जब चंद्रमा पर रात होगी तब विक्रम से दोबारा संपर्क स्थापित करने की सारी उम्मीदें खत्म हो जाएंगी। एक अन्य अंतरिक्षयात्री स्कॉट टिल्ले ने भी इस बात की पुष्टि की है कि नासा के कैलिफोर्निया स्थित डीएसएन स्टेशन ने लैंडर को रेडियो फ्रीक्वेंसी भेजी है। टिल्ले उस समय चर्चा में आए थे जब उन्होंने 2005 में गुम हुए नासा के एक जासूसी उपग्रह का पता लगाया था। लैंडर को सिग्नल भेजने पर चांद रेडियो रिफ्लेक्टर के तौर पर कार्य करता है और उस सिग्नल के एक छोटे से हिस्से को वापस धरती पर भेजता है जिसे कि 8,00,000 किलोमीटर की यात्रा के बाद डिटेक्ट किया जा सकता है। बुधवार को इसरो ने बताया था कि उसका लैंडर विक्रम से संपर्क चंद्र सतह से 2.1 किलोमीटर की ऊंचाई पर नहीं बल्कि 335 मीटर पर टूटा था। इसरो के मिशन ऑपरेशन कॉम्प्लेक्स से जारी तस्वीर से इस बात का खुलासा हुआ है। चंद्रमा की सतह से 4.2 किलोमीटर की ऊंचाई पर भी विक्रम लैंडर अपने पूर्व निर्धारित पथ से थोड़ा भटका लेकिन जल्द ही उसे सही कर दिया गया। इसके बाद जब चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर चंद्र सतह से  2.1 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंचा तो वह अपने पथ से भटक कर दूसरे रास्ते पर चलने लगा।

 

25-04-2019
मंगल ग्रह पर पहली बार आया भूकंप!

वाशिंगटन। क्या पृथ्वी के अलावा भी दूसरे ग्रहों में भूकंप आता है? इसका उत्तर नासा ने देते हुए कहा है कि हां। नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा)  द्वारा प्रक्षेपित रोबोटिक लैंडर 'इनसाइट' ने पहली बार मंगल ग्रह पर संभवत: भूकंप दर्ज किया है।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार लैंडर के भूकंपमापी यंत्र 'साइस्मिक एक्सपेरिमेंट फॉर इंटीरियर स्ट्रक्चर (एसईआईएस) ने छह अप्रैल को कमजोर भूकंपीय संकेतों का पता लगाया। 'इनसाइट' का छह अप्रैल को मंगल पर 128वां दिन था। नासा ने एक बयान में कहा कि संभवत: ग्रह के भीतर से भूकंपीय संकेत मिले हैं और ऐसा पहली बार हुआ है। इससे पहले सतह के ऊपर के वायु जैसे कारकों के कारण भूकंपीय संकेत मिलते थे। संकेत के सटीक कारण का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक अब भी डेटा की जांच कर रहे हैं। 

15-04-2019
Aliens: क्या मंगल ग्रह पर एलियंस ने बना रखा है अड्डा !

वाशिंगटन। नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) के प्रमुख ने आइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट (यूएफओ) विशेषज्ञ वैज्ञानिक स्कॉट सी वैरिंग ने दावा किया है कि मंगल ग्रह पर एलियंस का अड्डा है और यह अड्डा काफी पुराना है। उन्होंने यह चौंकाने वाला दावा 17 साल पहले ली गई एक तस्वीर के आधार पर किया है। बताया जा रहा है कि  2001 के मार्स ओडिसी मिशन के दौरान कथित तौर पर ओलंपस मोंस ज्वालामुखी के करीब एलियंस का यह अड्डा नजर आया था और इसकी तस्वीरें खींची गई थीं। वैज्ञानिकों के अनुसार ओलंपस मोंस ब्रह्मांड में मिला अब तक का सबसे बड़ा ज्वालामुखी है। यूएफओ विशेषज्ञ वैरिंग ने नासा की एक तस्वीर दिखाकर दावा किया कि तस्वीर में नीचे कोने पर एक पत्थर की संरचना देखी जा सकती है, जो कि एलियंस की बिल्डिंग है। वैरिंग के अनुसार जो बात ठीक से समझ आती है वह यह है कि एक चौकोर ढांचा एक पिरामिड जैसी जगह के साथ सुरंग के जरिए जुड़ा हुआ है। वैरिंग के कथनानुसार जिन एलियंस ने इसे बनाया है, वे न सिर्फ इस ग्रह के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं बल्कि उन्होंने खुद को सुरक्षित रखने के लिए सुरंगें भी बना रखी हैं। नासा की फोटो में दिखने वाला यह एलियन बेस मंगल पर फैले सैकड़ों बेस में से एक है। बता दें कि वैरिंग को यूएफओ विशेषज्ञ माना जाता है। उन्होंने एलियंस की गतिविधियों की जानकारी जुटाने के लिए मंगल ग्रह और चंद्रमा की ऐसी हजारों तस्वीरों का अध्ययन किया है। कई बार उनकी तस्वीरों में सिर्फ पत्थर और एलियन जैसी छायाएं नजर आती हैं। वैरिंग एलियंस के अस्तित्व पर पूरी तरह से विश्वास करते हैं।

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