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04-12-2019
चंद्रयान-2, नासा से पहले ही खोज लिया था विक्रम लैंडर का मलबा:  इसरो प्रमुख 

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख के. सिवन ने कहा कि हमने पहले ही विक्रम लैंडर को ढूंढ लिया था। सिवन ने कहा, नासा से पहले हमारे ऑर्बिटर ने विक्रम लैंडर को ढूंढा था और इसकी जानकारी हमने अपनी वेबसाइट पर भी डाली थी। आप वहां जाकर देख सकते हैं। इसरो ने अपनी वेबसाइट पर 10 सितंबर को एक जानकारी अपडेट की है। इसमें लिखा है कि चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम की खोज कर ली गई है, लेकिन उससे अभी तक संपर्क स्थापित नहीं हो सका है। संचार स्थापित करने के लिए सभी संभावित प्रयास किेए जा रहे हैं। दरअसल, मंगलवार को  आई रिपोर्टों में दावा किया गया था कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की ओर से जारी तस्वीरों की मदद से चेन्नई के आइटी प्रोफेशनल शनमुगा सुब्रमण्यम ने वह लोकेशन खोज ली है, जहां क्रैश होने के बाद विक्रम का मलबा पड़ा है।
 

14-11-2019
2020 में एक बार फिर चांद पर जाएगा भारत, इसरो ने शुरू किया कार्य

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) सितंबर 2019 में पहली बार में चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करने में असफल रहा। अब जल्द ही इसरो चंद्रयान 3 को चंद्रमा की तरफ रवाना कर सकता है। सूत्रों का कहना है कि इसके लिए नवंबर 2020 तक की समयसीमा तय की गई है। इसरो ने कई समितियां बनाई हैं। इसके लिए इसरो ने पैनल के साथ तीन सब समितियों की अक्टूबर से लेकर अब तक तीन उच्च स्तरीय बैठक हो चुकी है। इस नए मिशन में केवल लैंडर और रोवर शामिल होगा क्योंकि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर ठीक तरह से कार्य कर रहा है। बीते दिनों ओवरव्यू (समीक्षा) कमिटी की बैठक हुई। जिसमें विभिन्न सब समितियों की सिफारिशों पर चर्चा की गई। समितियों ने संचालन शक्ति, सेंसर, इंजिनियरिंग और नेविगेशन को लेकर अपने प्रस्ताव दिए हैं।

एक वैज्ञानिक ने कहा कि कार्य तेज गति से चल रहा है। इसरो ने अब तक 10 महत्वपूर्ण बिंदुओं का खाका खींच लिया है। जिसमें लैंडिंग साइट, नेविगेशन और लोकल नेविगेशन शामिल हैं। सूत्रों का कहना है कि पांच अक्टूबर को एक आधिकारिक नोटिस जारी किया गया है। इस नोटिस में कहा गया है, 'यह जरूरी है कि चंद्रयान-2 की विशेषज्ञ समिति द्वारा लैंडर सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए की गई सिफारिशों पर ध्यान दिया जाए। जिन सिफारिशों को चंद्रयान-2 के एडवांस फ्लाइट प्रिपरेशन की वजह से लागू नहीं किया गया था।' दूसरे वैज्ञानिक ने कहा कि नए मिशन की प्राथमिकता लैंडर के लेग्स को मजबूत करना है। ताकि वह चांद की सतह पर तेज गति से उतरने पर क्रैश न हो। सूत्रों का कहना है कि इसरो एक नया लैंडर और रोवर बना रहा है। लैंडर पर पेलोड की संख्या को लेकर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। बात दें कि सितंबर में इसरो ने चंद्रयान-2 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने की कोशिश की थी जिसमें उसे सफलता नहीं मिल पाई। हालांकि ऑर्बिटर ठीक तरह से काम कर रहा है और वैज्ञानिकों का कहना है कि वह सात सालों तक अपना काम करता रहेगा।

 

02-11-2019
इसरो प्रमुख ने कहा, विक्रम लैंडर की कार्य योजना पर कर रहे हैं काम

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख के. सिवन ने कहा है कि वे विक्रम लैंडर की लैंडिंग के लिए कार्य योजना पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम विक्रम लैंडर की लैंडिंग के लिए प्रौद्योगिकी प्रदर्शित करना चाहते हैं। इसरो के 50 साल पूरे होने के मौके पर सिवन ने आईआईटी दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में यह बात कही। सिवन ने कहा कि आप सभी लोग चंद्रयान-2 मिशन के बारे में जानते हैं। तकनीकी पक्ष की बात करें तो यह सच है कि हम विक्रम लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग नहीं करा पाए, लेकिन पूरा सिस्टम चांद की सतह से 300 मीटर दूर तक पूरी तरह काम कर रहा था। हमारे पास बेहद कीमती डेटा उपलब्ध है। मैं भरोसा दिलाता हूं कि भविष्य में इसरो अनुभव और तकनीकी दक्षता के माध्यम से सॉफ्ट लैंडिंग का हरसंभव प्रयास करेगा। चंद्रयान-2 कहानी का अंत नहीं है। हमारा आदित्य एल 1 सोलर मिशन, ह्यूमन स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम ट्रैक पर है। हम कई एडवांस सैटेलाइट्स को लॉन्च करने वाले हैं। एसएसएलवी दिसंबर-जनवरी में उड़ान भरेगा। 200 टन सेमी-क्रायो इंजन की टेस्टिंग और मोबाइल पर एनएवीआईसी सिग्नल भेजने पर भी जल्दी ही काम शुरू हो जाएगा। 

23-10-2019
चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम की लोकेशन ढूंढने में नासा फिर हुआ नाकाम

नई दिल्ली। चंद्रमा की सतह पर गायब हुआ चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम का लोकेशन ढूंढने में नासा फिर असफल हुआ है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने बताया कि लूनर रिकॉर्नेशन ऑर्बिटर (एलआरओ) को चंद्रमा की सतह पर चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर का कोई सबूत नहीं मिला है। बता दें कि सात सितंबर को चंद्रमा पर साफ्ट लैंडिंग के दौरान इसरो का लैंडर विक्रम से संपर्क टूट गया था। एलआरओ मिशन के प्रोजेक्ट साइंटिस्ट नोआ एडवर्ड पेट्रो ने बताया कि लूनर रिकॉर्नेशन ऑर्बिटर ने 14 अक्टूबर को चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर के लैंडिंग साइट के क्षेत्र में प्रवेश किया था लेकिन उसे लैंडर का कोई भी सबूत नहीं मिला।

नासा की टीम ने चेंज डिटेक्शन तकनीक के द्वारा एलआरओ के तस्वीरों की सावधानीपूर्वक जांच की और विक्रम का पता लगाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि इसका उपयोग चंद्रमा पर नए उल्कापिंड के प्रभाव को खोजने के लिए किया जाता है। एलआरओ मिशन के उप परियोजना वैज्ञानिक जॉन केलर ने आशंका जताई कि यह संभव है कि विक्रम किसी गढ्ढे की छाया में या खोज क्षेत्र के बाहर स्थित हो। कम अक्षांश के कारण लगभग 70 डिग्री दक्षिण में स्थित इस क्षेत्र के कई हिस्से गहरे अंधकार में भी हैं। बता दें कि इससे पहले भी एलआरओ ने 17 सितंबर को विक्रम के लैंडिंग साइट के उपर से उड़ते हुए कई हाई रिजॉल्यूशन फोटोज को लिया था, लेकिन उसमें भी विक्रम का कोई पता नहीं चल सका था।

23-10-2019
चांद पर काले दागों पर इसरो का खुलासा, बताई ये वजह...

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने इस बात का खुलासा किया है कि आखिर चांद पर क्यों काले दाग है। इसको लेकर इसरो ने दो तस्वीरें जारी की है, जो रंगीन है। ये पहली बार है जब इसरो ने रंगीन फोटो जारी की है। जारी हुई तस्वीरों में ये पता चल रहा है कि चांद की सतह पर काले दाग क्यों हैं? उसकी सतह पर इतने गड्ढे (क्यों हैं? ये खुलासा चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर में लगे डुअल फ्रिक्वेंसी सिंथेटिक एपर्चर राडार (DF-SAR) ने किया है। इस उपकरण ने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद सतह का अध्ययन किया है। आप इस उपकरण से ये पता कर सकते हैं कि कहां गड्ढे हैं? कहां पहाड़ हैं? कहां समतल जमीन है? और कहां पत्थर पड़े हैं?

इस उपकरण की खासियत ये है कि यह कम से कम चांद की सतह से 2 मीटर ऊंची किसी भी वस्तु की तस्वीर आराम से बनवा सकता है। इसके लिए इस उपकरण से दो प्रकार की किरणें निकलती हैं। उन किरणों के सतह से टकराने और उनके वापस लौटने के आंकड़ों को जुटाकर यह पता किया जाता है कि चांद की सतह पर क्या है? DF-SAR से पृथ्वी के इसरो सेंटर्स पर भेजी गई तस्वीरों से पता चलता है कि यह उपकरण चांद की सतह के ऊपर और सतह के नीचे की जानकारी देने में सक्षम हैं। साथ ही DF-SAR यह भी बता सकता है कि चांद की सतह पर कौन सा गड्ढा कब बना है? आखिर चांद की सतह पर बने गड्ढों से चांद के काले धब्बों का क्या लेना-देना है? असल में यही गड्ढे और उनकी परछाइयां ही चांद के चेहरे पर काले धब्बे से दिखाई पड़ते हैं। इन गड्ढों के बनने की की वजह चांद की सतह पर दर्जनों या उससे ज्यादा की संख्या में उल्कापिंड, क्षुद्र ग्रह और धूमकेतु के टकराना है। इनके टकराने की वजह से ही हजारों वर्षों से चांद की सतह पर ऐसे गड्ढे बन रहे हैं। DF-SAR यह भी बता सकता है कि चांद की सतह पर कौन सा गड्ढा कब बना है? चांद पर गड्ढों की संख्या की बात करें तो इसका सही आंकड़ा किसी भी देश की अंतरिक्ष एजेंसी या वैज्ञानिकों के पास नहीं हैं। लेकिन एक अनुमान के अनुसार चांद पर 5185 गड्ढे ऐसे हैं जो 19 किमी से ज्यादा चौड़े हैं। 10 लाख गड्ढों की चौड़ाई करीब एक किलोमीटर है। जबकि, करीब 50 लाख गड्ढे ऐसे हैं जिनकी चौड़ाई करीब 10 मीटर या उससे अधिक है।

18-10-2019
आईआईआरएस पेलोड ने किया कमाल, ली चांद के सतह की पहली चमकदार तस्वीर

नई दिल्ली। चंद्रयान-2 ने चांद की सतह की पहली चमकदार तस्वीर ली है। यह तस्वीर चांद के उत्तरी हिस्से की है। यह कमाल चंद्रयान-2 पर पर लगे इमेजिंग इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर(आईआईआरएस) पेलोड ने किया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बीते गुरुवार को संयोगवश करवाचौथ के दिन चांद की सतह की यह तस्वीर ट्विटर पर साझा की है। इस स्पेक्ट्रोमीटर को इस तरह से डिजाइन किया गया है जिससे वह चंद्रमा की सतह से परावर्तित होने वाले सूर्य के प्रकाश को माप सके और चांद की सतह पर मौजूद खनिजों का पता लगा सके। तस्वीर में चांद की सतह पर कुछ महत्वपूर्ण समरफील्ड, स्टेबिंस और किर्कवुड गड्ढे नजर आ रहे हैं।

इससे पहले 4 अक्तूबर को इसरो ने चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर पर लगे हाई रिजोल्यूशन कैमरे से ली गई तस्वीर जारी की थी। हालांकि, वह स्पष्ट नहीं थी। चंद्रयान-2 को सात सितंबर को चांद के दक्षिणी सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करनी थी, लेकिन आखिरी क्षणों में इसरो का लैंडर विक्रम से संपर्क टूट गया। हालांकि, चांद के आसमान में चक्कर लगा रहे चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर मुस्तैदी से काम कर रहा है। वहीं, विक्रम की तलाश इसरो और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी कर रहा है।

यह है मकसद

आईआईआरएस का मुख्य मकसद चंद्रमा की उत्पत्ति और विकास के बारे में पता लगाना है। इसे सतह पर पड़ने वाली सूर्य की रोशनी और परावर्तित किरणों के आकलन के जरिये अंजाम दिया जाता है। इस दौरान चांद के निर्माण में खनिजों और तत्वों का भी विश्लेषण किया जाता है।

तस्वीर का आकलन कुछ ऐसे

सूर्य की परावर्तित रोशनी अलग-अलग जिन गड्ढों से गुजरी, उनके नाम दिए गए हैं। जैसे गड्ढे का मध्यवर्ती स्थान (स्टेबिंस), गड्ढे की सतह (स्टेबिंस और समरफील्ड), बडे़ गड्ढे के भीतर बने छोटे गड्ढे (समरफील्ड) और गड्ढों के अंदरूनी घेरा(किर्कवुड)। इन्हीं गड्ढों पर पड़ी रोशनी और उसके अलग-अलग रंगों के परावर्तन से सतह का शुरुआती आकलन किया गया है।

 

06-10-2019
फ्लाइट में इसरो प्रमुख के. सिवन का गर्मजोशी से स्वागत, सेल्फी लेने के लिए लग गई होड़

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के चेयरमैन के. सिवन अपनी सादगी के लिए जाने जाते हैं। उनकी सादगी एक बार फिर नजर आई। जब वह इंडियो की फ्लाइट से सफर कर रहे थे। इस दौरान फ्लाइट में क्रू ने उनका जोरदार स्वागत किया। इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में इसरो प्रमुख सिवन लोगों के साथ सेल्फी लेते दिखाई दे रहे हैं। साथ ही यात्री भी इसरो प्रमुख का गर्मजोशी और तालियों के साथ स्वागत करते दिखाई दे रहे हैं। इस दौरान इसरो प्रमुख के सिवन मुस्कुराते नजर आ रहे हैं। इसके साथ ही वह इस शानदार स्वागत के लिए लोगों को धन्यवाद दिया। बता दें कि इसरो प्रमुख सिवन अपने शांत स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। उन्हें चंद्रयान-2 मिशन के दौरान विक्रम लैंडर के फेल हो जाने पर पूरे देश से समर्थन मिला था। इस दौरान वह भावुक हो गए और उनकी आंखों से आंसू झलक पड़े थे। उसके बाद पीएम मोदी ने उनका न सिर्फ हौसला बढ़ाया बल्कि उन्हें गले लगा लिया था। पूरे देश ने भी के सिवन की इन कोशिशों की खूब सराहना की थी।

 

06-10-2019
अंतरिक्ष में इतिहास बनाने को तैयार है महिलाएं, एक साथ करेंगी स्पेसवॉक

नई दिल्ली। भारत के चंद्रयान-2 के असफल होने के बाद अंतरिक्ष में एक नया इतिहास बनने वाला है। दो महिलाएं मिलकर अंतरिक्ष में इतिहास बनाने जा रही हैं। ये दोनों एक साथ अंतरिक्ष में चहलकदमी करेंगी। विश्व के अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में ऐसा पहली बार है जब दो महिलाएं एक साथ स्पेसवॉक करने जा रही हैं। ये इतिहास 21 अक्टूबर 2019 को बनने वाला है। इन दो महिलाओं का नाम है जेसिका मीर और क्रिस्टीना कोच। ये दोनों नासा की एस्ट्रोनॉट हैं। ये दोनों फिलहाल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में हैं। 21 अक्टूबर को ये दोनों महिला एस्ट्रोनॉट्स स्पेस स्टेशन के सोलर पैनल में लगी लिथियम आयन बैटरी को बदलने के लिए आईएसएस से बाहर निकलेंगी। उसी दौरान ये स्पेसवॉक भी करेंगी। गौरतलब है कि पहले महिलाओं का स्पेसवॉक मार्च 2019 में होना था। लेकिन स्पेससूट नहीं होने के कारण इसे टाल दिया गया था। बता दें कि अक्टूबर 2019 में कुल पांच स्पेसवॉक होने वाले हैं। अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा ये सभी स्पेसवॉक आईएसएस की मरम्मत के दौरान आईएसएस से बाहर आने पर किए जाने वाले हैं। ये अलग-अलग तारीखों पर होंगे। अक्टूबर के बाद पांच स्पेसवॉक फिर से दिसंबर 2019 में किए जाने की योजना है।


11 अक्टूबर : क्रिस्टीना कोच और एंड्रयू मॉर्गन स्पेस स्टेशन से बाहर निकल कर स्पेसवॉक करेंगे।

16 अक्टूबर : जेसिका मीर और एंड्रयू मॉर्गन स्पेसवॉक करेंगे।

21 अक्टूबर : जेसिका मीर और क्रिस्टीना कोच आईएसएस से बाहर निकलेंगी और साथ स्पेसवॉक कर इतिहास बनाएंगी।

25 अक्टूबर : जेसिका मीर और लूका परमितानो स्पेसवॉक करेंगे।

31 अक्टूबर : ओलेग स्क्रीपोचा और एलेक्जेंडर स्कवोर्तसोव आईएसएस की मरम्मत करने के साथ-साथ स्पेसवॉक करेंगे।

 

05-10-2019
विक्रम में आ सकती है जान, आज से शुरू होगी संपर्क साधने की कोशिश

नई दिल्ली। चंद्रयान-2 इसरो के लिए एक बहुत बड़ा सपना था जो पूरा होते-होते अंत में टूट गया, लेकिन इसरो फिर से अपने उस टूटे सपने को पूरा करने की कोशिश में लग गया है। दरअसल इसरो ने चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर के हाई रिजोल्यूशन कैमरे से चांद की खींची तस्वीरें जारी की है। इस हाई रिजोल्यूशन कैमरे ने चंद्रमा के सतह की तस्वीर भेजी है। इस तस्वीर में चंद्रमा के सतह पर बड़े और छोटे गड्ढे नजर आ रहे हैं। इसरो ने कहा, आर्बिटर में मौजूद आठ पेलोड ने चांद की सतह पर मौजूद तत्वों को लेकर कई सूचनाएं भेजी हैं। आर्बिटर चांद की सतह पर मौजूद आवेशित कणों का पता लगा रहा है। ऑर्बिटर के पेलोड क्लास ने अपनी जांच में चांद की मिट्टी में मौजूद कणों के बारे में पता लगाया है। यह तब संभव हुआ है, जब सूरज की तेज रोशनी में मौजूद एक्स किरणों की वजह से चांद की सतह चमक उठी।

 आज से चांद पर होगा दिन, सौर पैनलों से विक्रम में आ सकती है जान

चांद की अंधेरी सतह पर बेसुध पड़े चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम को लेकर फिर उम्मीद जगी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अपने सौर पैनलों की मदद से विक्रम फिर काम शुरू कर सकता है। दरअसल, चांद पर शनिवार से दिन की शुरुआत हो रही है। ऐसे में विक्रम को लेकर कोई अच्छी खबर आने की उम्मीद बढ़ गई है। वहीं, भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने कहा है कि चांद के आसमान में चक्कर लगा रहा चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर सोडियम, कैल्शियम, एल्युमीनियम, सिलिकॉन, टाइटेनियम और लोहे जैसे महत्वपूर्ण खनिज तत्वों का पता लगाने के लिए काम कर रहा है। इसरो के मुताबिक, ऑर्बिटर का पेलोड अपने तय मकसद के लिए बेहतर तरीके से काम कर रहा है। वहीं, विक्रम की तलाश और उससे संपर्क करने की कोशिशों में जुटी अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने कहा है कि अब तक विक्रम से कोई आंकड़ा नहीं मिला है। खगोलविद् स्कॉट टायली ने ट्वीट कर विक्रम से संपर्क की प्रबल संभावना जताई है। उन्होंने कहा है कि विक्रम को खोजने में कामयाबी जरूर मिलेगी। बताया जा रहा है कि दिन होने के साथ ही विक्रम से संपर्क करने की कोशिशें तेज होंगी।

इसरो के एक वैज्ञानिक ने बताया कि हालांकि अब विक्रम से संपर्क करना बेहद मुश्किल होगा, लेकिन कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है। उनसे जब यह पूछा गया कि क्या चांद पर रात के समय बहुत ज्यादा ठंड में विक्रम सही सलामत रह सकता है, तो उन्होंने कहा, सिर्फ ठंड ही नहीं, बल्कि झटके से हुआ असर भी चिंता की बात है। हार्ड लैंडिंग के चलते विक्रम तेज गति से चांद की सतह पर गिरा होगा। इस झटके के चलते विक्रम के भीतर मौजूद उपकरणों को नुकसान पहुंच सकता है। चांद के चक्कर लगा रहे नासा के लुनर रिकॉनिएसेंस ऑर्बिटर ने जो तस्वीरें भेजी थीं, चांद पर रात होने के चलते उससे तस्वीरें साफ नहीं आ पाई थीं।

04-10-2019
अब अंतरिक्ष में होगा भारत का स्पेस स्टेशन, इसरो प्रमुख ने दी जानकारी

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इस समय एक साथ कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। एक तरफ जहां वैज्ञानिकों ने अब तक चंद्रयान-2  के विक्रम लैंडर से संपर्क की कोशिश में हार नहीं मानी है। वहीं दूसरी ओर भारत के पहले मानव मिशन गगनयान की भी तैयारी जारी है। इस बीच अब इसरो प्रमुख के. सिवन ने एक और बड़े प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी दी है। यह ऐसा है जो इसरो ने पहले कभी नहीं किया। डॉ. के. सिवन ने अंतरिक्ष में भारत के अपने स्टेशन के बारे में बात की है। कुछ महीने पहले के. सिवन ने बताया था कि भारत अपना स्पेस स्टेशन बनाने वाला है। अब इसके लिए इसरो अगले साल स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट करने जा रहा है।

कैसा होगा ये प्रयोग

इस प्रयोग के लिए इसरो दो सैटेलाइट्स को एक पीएसएलवी रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में भेजेगा। ये दो सैटेलाइट मॉड्यूल इस तरह तैयार किए जाएंगे, कि ये अंतरिक्ष में रॉकेट से बाहर आने के बाद एक दूसरे से जुड़ सकें। यही सबसे जटिल प्रक्रिया भी होगी।

स्पेस स्टेशन के लिए क्यों जरूरी है ये प्रयोग

इसरो प्रमुख के अनुसार जुड़ने की ये प्रक्रिया ठीक वैसी ही होगी जैसे इमारत बनाने के लिए एक ईंट से दूसरी ईंट को जोड़ना। छोटी-छोटी चीजें जुड़कर बड़ा आकार बनाती हैं। स्पेस स्टेशन बनाने के लिए भी ये प्रक्रिया सबसे अहम है। इस प्रयोग की सफलता से ही पता चलेगा कि हम स्पेस स्टेशन में जरूरी वस्तुओं और अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित तरीके से पहुंचा सकेंगे या नहीं। बता दें कि पहले 2025 तक ये रॉकेट छोड़ने की योजना थी।

ISS बनाने में कितना समय लगा था

इस वक्त इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) कार्य कर रहा है जिसे पांच देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों ने मिलकर बनाया है - अमेरिका (NASA), रूस (ROSCOSMOS), जापान (JAXA), यूरोप (ESA) और कनाडा (CSA)। इन सभी को मिलकर आईएसएस बनाने में करीब 13 साल लगे थे। इसके लिए भी डॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। ISS के लिए कुल 40 बार डॉकिंग की गई थी। इसरो प्रमुख ने कहा है कि स्पेस स्टेशन के लिए स्पेडेक्स पहले करने का मतलब ये नहीं कि हम गगनयान को टालेंगे। गगनयान दिसंबर 2021 में ही होगा। स्पेस स्टेशन के लिए स्पेडेक्स एक प्रायोगिक मिशन है। इस प्रयोग की सबसे जटिल प्रक्रिया होगी अंतरिक्ष में दो सैटेलाइट्स की गति कम कर उन्हें एक-दूसरे से जोड़ना। क्योंकि अगर गति कम नहीं हुई, तो वे आपस में टकरा जाएंगे। इस प्रयोग के लिए इसरो को सरकार ने फिलहाल 10 करोड़ रुपये दिए हैं। 

27-09-2019
नासा ने जारी की चंद्रयान-2 की तस्वीरें, किया ये बड़ा खुलासा

नई दिल्ली। चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर को लेकर नासा ने एक बड़ा खुलासा किया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने शुक्रवार को चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर की लैंडिंग वाली जगह की तस्वीरें जारी की है, जिसमें कहा गया है कि चांद की सतह पर विक्रम लैंडर की हार्ड लैंडिंग हुई। नासा ने चंद्रमा की परिक्रमा कर रहे अपने लूनर रिकॉनिस्सेंस ऑर्बिटर को विक्रम लैंडर के लैंडिंग साइट के ऊपर से गुजारा था, उसके ऑर्बिटर से कैद तस्वीरों को जारी किया है। नासा ने उस जगह की तस्वीरें भी जारी कीं हैं, जहां साउथ पोल पर विक्रम की लैंडिंग होनी थी। तस्वीर में धुल दिखी है। हालांकि, विक्रम कहां गिरा इस बारे में पता नहीं चला पाया है। नासा ने कहा कि विक्रम लैंडर की काफी हार्ड लैंडिंग हुई थी और चंद्रमा की सतह पर विक्रम लैंडर की लैंडिंग का सटीक स्थान अभी तक नहीं पता चल पाया है। गौरतलब है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 7 सितंबर को चंद्रमा की सतह पर लैंड करने से कुछ मिनट पहले देश के दूसरे चंद्र मिशन चंद्रयान -2 के विक्रम लैंडर से संपर्क खो दिया था।

नासा ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से ट्वीट किया, 'चंद्रमा की सतह पर नासा की हार्ड लैंडिंग हुई, यह स्पष्ट है। स्पेसक्राफ्ट किस लोकेशन पर लैंड हुआ यह अभी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। तस्वीरें केंद्र से 150 किलोमीटर दूरी से ली गई हैं। अक्टूबर में  लूनर रिकॉनिस्सेंस ऑर्बिटर दोबारा प्रयास करेगा।' 'गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के एलआरओ मिशन के डिप्टी प्रोजेक्ट साइंटिस्ट जॉन कैलर ने एक बयान में कहा कि एलआरओ 14 अक्टूबर को दोबारा उस समय संबंधित स्थल के ऊपर से उड़ान भरेगा जब वहां रोशनी बेहतर होगी। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चंद्रयान-2 के विक्रम मॉड्यूल का सात सितंबर को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने का प्रयास तय योजना के मुताबिक पूरा नहीं हो पाया था। लैंडर का आखिरी क्षण में जमीनी केंद्रों से संपर्क टूट गया था। नासा अब 14 अक्टूबर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव से अंधेरा छंटने के बाद एक बार फिर अपने लूनर रिकॉनेसा ऑर्बिटर (एलआरओ) के कैमरे से विक्रम लैंडर की लोकेशन जानने और उसकी तस्वीर लेने की कोशिश करेगा। बता दें कि पहले भी एजेंसी ऐसी कोशिशें कर चुकी है, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली।

18-09-2019
इसरो ने देशवाशियों को कहा धन्यवाद, लैंडर विक्रम से संपर्क की उम्मीदे हुई खत्म

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान-2 को देसवासियों से मिले अपार समर्थन के लिए सभी का धन्यवाद कहा है। यह देश का दूसरा चंद्र मिशन था। सात सितंबर को चंद्रमा की सतह पर पहुंचने से कुछ ही मिनट पहले इसरो का लैंडर विक्रम से संपर्क टूट गया था। जिसके कारण अभियान को आंशिक असफलता का सामना करना पड़ा था। आंशिक असफलता इसलिए क्योंकि ऑर्बिटर लगातार चंद्रमा के चक्कर काट रहा है और उसकी तस्वीरें भेज रहा है। संपर्क टूटने के बाजजूद देशवासियों और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो की हौसलाफजाई की थी। जिससे खुश होकर इसरो ने मंगलवार शाम को ट्वीट करते हुए सभी का धन्यवाद किया। इसरो ने ट्वीट कर कहा, 'हमारे साथ खड़े रहने के लिए आपका शुक्रिया। हम दुनियाभर में सभी भारतीयों की आशाओं और सपनों को पूरा करने की कोशिश करते रहेंगे।

हमें प्रेरित करने के लिए शुक्रिया।’ अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत को गौरवान्वित करने वाले इस संगठन ने दुनियाभर में बसे भारतीयों के सपनों को साकार करने का भरोसा दिलाया है। अपनी 47 दिनों की यात्रा के दौरान चंद्रयान-2 ने कई मुश्किल पड़ाव पार किए थे। आखिर में उसे लैंडर विक्रम के जरिए रोवर प्रज्ञान को चांद की सतह पर उतारना था। इस प्रक्रिया के तहत विक्रम की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग कराई जानी थी लेकिन गति अनियंत्रित होने के कारण उसने हार्ड लैंडिंग की और वैज्ञानिकों का उससे संपर्क टूट गया। चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर ने बाद में चांद की सतह पर तिरछे पड़े लैंडर विक्रम की तस्वीर भेजी जिसके बाद उससे दोबारा संपर्क स्थापित करने की उम्मीद जाग गई थी। इसरो ने भी उससे संपर्क स्थापित करने की कई कोशिशें की लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। इससे रोवर प्रज्ञान के जरिए चांद की सतह की जानकारी इकट्ठा करने में बेशक बाधा आई लेकिन दुनिया ने न केवल इसरो का लोहा माना बल्कि उसकी प्रशंसा भी की।

 

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