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09-01-2021
कालिंजर दुर्ग, जहां कालकूट विष पीने के बाद भगवान शिव ने की थी तपस्या, आइए जानते हैं पूरा इतिहास

बांदा। कालिंजर अर्थात जिसने समय पर भी विजय पा ली हो। काल अर्थात समय एवं जय अर्थात विजय। इसे भारत के सबसे विशाल और अपराजेय दुर्गों में गिना जाता रहा है। प्राचीन काल में यह दुर्ग जेजाकभुक्ति( जयशक्ति चन्देल) साम्राज्य के अधीन था। बाद में यह 10वीं शताब्दी तक चन्देल राजपूतों के अधीन और फिर सोलंकियों के अधीन रहा। इन राजाओं के शासनकाल में कालिंजर पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक, शेरशाह सूरी और हुमांयू आदि ने आक्रमण किए लेकिन इस पर विजय पाने में असफल रहे। भारत के स्वतंत्रता के पश्चात इसकी पहचान एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर के रूप में की गयी है। 16वीं शताब्दी के फारसी इतिहासकार फ़िरिश्ता के अनुसार कालिंजर नामक शहर की स्थापना केदार नामक एक राजा ने 7वीं शताब्दी में की थी लेकिन यह दुर्ग चन्देल शासन से प्रकाश में आया। चन्देल काल की कथाओं के अनुसार दुर्ग का निर्माण एक चन्देल राजा ने करवाया था।

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार सागर मन्थन उपरान्त भगवान शिव ने सागर से उत्पन्न हलाहल विष का पान कर लिया था एवं अपने कण्ठ में ही रोक लिया था, जिससे उनका कण्ठ नीला हो गया था। तब वे कालिंजर आये व यहाँ काल पर विजय प्राप्त की। इसी कारण से कालिंजर स्थित शिव मन्दिर को नीलकण्ठ भी कहते हैं। तभी से ही इस पहाड़ी को पवित्र तीर्थ माना जाता है। पद्म पुराण में इस क्षेत्र को नवऊखल बताया गया है। इसे विश्व का सबसे प्राचीन स्थल बताया गया है। गमत्स्य पुराण में इस क्षेत्र को अवन्तिका एवं अमरकंटक के साथ अविमुक्त क्षेत्र भी कहा गया है। जैन धर्म के ग्रंथों तथा बौद्ध धर्म की जातक कथाओं में इसे कालगिरि कहा गया है। इस दुर्ग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ढेरों युद्धों एवं आक्रमणों से भरी पड़ी है। विभिन्न राजवंशों के हिन्दू राजाओं तथा मुस्लिम शासकों द्वारा इस दुर्ग पर वर्चस्व प्राप्त करने हेतु बड़े बड़े आक्रमण हुए हैं एवं इसी कारण से यह दुर्ग एक शासक से दूसरे के हाथों में चलता चला गया। किन्तु केवल चन्देल शासकों के अलावा कोई भी राजा इस पर लम्बा शासन नहीं कर पाया। इस दुर्ग में राजा महल और रानी महल नामक दो भव्य महल हैं। इसमें पाताल गंगा नामक एक जलाशय है। यहाँ के पांडु कुण्ड में चट्टानों से निरंतर पानी टपकता रहता है।

कहते हैं कि यहाँ कभी शिवकुटि होती थी, जहाँ अनेक शिव भक्त तप किया करते थे तथा नीचे से पाताल गंगा होकर बहती थी। उसी से ये कुण्ड भरता है। इस दुर्ग का एक महत्वपूर्ण स्थल कोटि तीर्थ है जहाँ एक जलाशय तथा आस.पास कई मंदिरों के ध्वंशावशेष के चिन्ह हैं। कोटि तीर्थ जलाशय के निकट चन्देल शासक अमानसिंह द्वारा एक महल बनवाया गया था। इसमें बुन्देली स्थापत्य की झलक दिखायी देती हैद्य वर्तमान में इसके ध्वंशावशेष ही मिलते हैं। प्रतीत होता है कि इसकी संरचना वास्तुकार ने अग्नि पुराण, बृहद संहिता तथा अन्य वास्तु ग्रन्थों के अनुसार की है। किले के बीचों.बीच अजय पलका नामक एक झील है जिसके आसपास कई प्राचीन मन्दिर हैं। यहाँ ऐसे तीन मन्दिर हैं जिन्हें अंकगणितीय विधि से बनाया गया है। दुर्ग में प्रवेश के लिए सात दरवाजे हैं और ये सभी दरवाजे एक दूसरे से भिन्न शैलियों से अलंकृत हैं। यहाँ के स्तंभों एवं दीवारों में कई प्रतिलिपियाँ बनी हुई हैं। मान्यता है कि इनमें यहाँ के खजाने का रहस्य छुपा हुआ है।  कालिंजर दुर्ग व्यवसायिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। यहाँ पर पहाड़ी खेरा एवं बृहस्पति कुण्ड में उत्तम किस्म की हीरा खदानें हैं।दुर्ग के निकट ही कुठला ज्वारी के सघन वनों में रक्त वर्णी चमकदार पत्थर मिलता है, जिससे किंवदंतियों अनुसार प्राचीन काल में सोना बनाया जाता था।

इस पत्थर को पारस पत्थर के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ की पहाड़ियों में परतदार चट्टानें व ग्रेनाइट पत्थर की बहुतायत है जो भवन निर्माण में काम आता है। वनों में सागौन, साखू व शीशम के पेड़ हैं, जिनसे काष्ठ निर्मित वस्तुएं तैयार होती हैं। इस पर्वत पर अनेक प्रकार की वनस्पति एवं औषधियाँ मिलती हैं। यहाँ उगने वाले सीताफल की पत्तियाँ व बीज भी औषधि के काम आते हैं। यहाँ के गुमाय के बीज एवं हरड़ का उपयोग ज्वर नियंत्रण के लिए किया जाता है। मदनमस्त एवं कंधी की पत्तियाँ भी उबाल कर पी जाती हैं। चन्देल काल के अनेक विद्वानों ने इसका वर्णन अनेक ग्रन्थों में किया है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं। प्रबोध चन्द्रोदय,रूपकषटकम,आल्हाखण्ड, पृथ्वीराज चौहान के राजकवि चन्दबरदाई ने पृथ्वीराज रासो में कालिंजर की प्रशंसा की है।  यहाँ की भूमि पर बैठकर ही अनेक ऋषियों मुनियों ने वेदों की ऋचाओं का सृजन किया था। यहीं नारद संहिता, बृहस्पति सूत्र, आदि की रचना हुई। आदि कवि वाल्मीकि ने यहीं वाल्मीकि रामायण का सृजन किया व महाकवि व्यास ने वेदों की रचना तथा कालांतर में गोस्वामी तुलसीदास ने भी निकट ही रामचरितमानस की रचना भी यहीं की थी जगनिक ने आल्हखण्ड ग्रंथ का सृजन किया, चन्देल नरेश गण्ड ने अनेक काव्यों का भावनात्मक सृजन यहीं किया, जिनके द्वारा महमूद गजनवी भी मित्र रूप में परिवर्तित हो गया।

 

23-12-2020
राष्ट्रीय किसान दिवस आज, किसानों के लिए नई नीति लागू करने वाले चौधरी चरण सिंह के जन्म दिन पर मनाया जाता है

रायपुर। भारत में हर साल राष्ट्रीय किसान दिवस 23 दिसंबर यानि आज मनाया जाता है। बता दें कि इसी दिन भारत के पांचवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ था, जिन्होंने किसानों के जीवन और स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए कई नीतियों की शुरुआत की थी। चौधरी चरण सिंह ने देश में किसानों के जीवन और स्थितियों को बेहतर बनाने के लिए कई नीतियों की शुरुआत की थी। साथ ही उन्होंने किसानों के सुधारों के बिल प्रस्तुत कर देश के कृषि क्षेत्र में भी अग्रणी भूमिका निभाई थी। भारत सरकार ने वर्ष 2001 में चौधरी चरण सिंह के सम्मान में हर साल 23 दिसंबर को किसान दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया।

क्योंकि त्याग और तपस्या का दूसरा नाम है किसान। वह जीवन भर मिट्टी से सोना उत्पन्न करने की तपस्या करता रहता है। तपती धूप, कड़ाके की ठंड तथा मूसलाधार बारिश भी उसकी इस साधना को तोड़ नहीं पाते। हमारे देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी आज भी गांवों में निवास करती है, जिनका मुख्य व्यवसाय कृषि है।

25-10-2020
नौ दिनों की तपस्या का पूर्ण फल सिद्धि और मोक्ष देने वाली मां सिद्धिदात्री को समर्पित है महानवमी

रायपुर। हिंदू पंचांग के अनुसार इस बार नवमी तिथि और दशमी तिथि इसी दिन मनाया जा रहा है। आज शाम को दशमी तिथि लगने के कारण दशहरा भी इसी दिन मनाया जाएगा। नवरात्र की नवमी तिथि के दिन देवी सिद्धिदात्रि देवी की पूजा अर्चना की जाती है। देवी सिद्धिदात्रि नौ दिनों की तपस्या का पूर्णफल प्रदान करती है। इनके नाम से स्पष्ट हो रहा है कि मां सभी प्रकार की सिद्धी और मोक्ष को देने वाली है। नवरात्र के अंतिम दिन मां की पूजा पूरे विधि विधान के साथ करने वाले उपासक की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। साथ ही यश, बल और धन की भी प्राप्ति होती है। मां सिद्धिदात्री के पास अणिमा, महिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, गरिमा, लघिमा, ईशित्व और वशित्व यह आठ सिद्धियां हैं। ये आठों सिद्धियां मां की पूजा और कृपा से प्राप्त की जा सकती हैं। मान्यता है कि सभी देवी-देवताओं को मां से ही सिद्धियों की प्राप्ति हुई हैं। हनुमान चालिसा में इन्हीं आठ सिद्धियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ‘अष्टसिद्धि नव निधि के दाता, अस वर दीन्ह जानकी माता’।

मां सिद्धिदात्री की स्तुति :
-या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः। 

मां सिद्धिदात्री बीज मंत्र : -
-ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:।

18-10-2020
नवरात्रि का दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी का दिन, माँ की कृपा से उम्र बढ़ती है और कुंडली के सारे दोष भी मिट जाते हैं

रायपुर। नवरात्र पर्व के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी माँ की पूजा-अर्चना की जाती है। साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। मान्यता है कि इनकी पूजा से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। मां ब्रह्मचारिणी ने अपने दाएं हाथ में माला और अपने बाएं हाथ में कमंडल धारण किया हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी ने भगवान भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए एक हजार वर्ष तक कठोर तपस्या की थी। इस दौरान मां ने फल-फूल खाकर बिताए और हजारों वर्ष तक निर्जल और निराहार रहकर तपस्या की। जिसकी वजह से उनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो साधक विधि विधान से देवी के इस स्वरुप की पूजा अर्चना करता है उसकी कुंडलिनी शक्ति जाग्रत हो जाती है। 

 मंत्र का करें जाप-
-नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। दधाना कर मद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।
-दधानां करपद्याभ्यामक्षमालाकमण्डल।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्माचारिण्यनुत्तमा।

इस विधि से मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से कई कष्ट दूर हो जाते हैं और मनुष्य की उम्र लंबी होती है। अगर आपकी कुंडली में बुरे ग्रह स्थित हैं तो उनकी स्थिति सुधर जाती है। सारे दोष मिट जाते हैं और अंत में मनुष्य सारे सुख भोगकर स्वर्ग को प्राप्त होता है।

07-01-2020
मुख्यमंत्री ने राजिम भक्तिन तेलिन माता जयंती की दी शुभकामनाएं

रायपुर। मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को राजिम भक्तिन तेलिन माता जयंती की बधाई और शुभकामनाएं दी है। भूपेश बघेल ने कहा है कि धर्मनिष्ठा और कर्मठ राजिम माता के नाम पर छत्तीसगढ़ की धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी राजिम का नाम पड़ा है। उन्होंने कहा कि भक्तिन तेलिन माता का त्याग, तपस्या और सत्कर्म हमे हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।

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