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18-02-2020
जलवायु परिवर्तन पर जेफ बेजोस खर्च करेंगे 71 हजार करोड़ रुपये

नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के लिए एक बड़ा खतरा है। इससे लड़ने के लिए दुनिया के सबसे अमीर शख्स आईटी कंपनी अमेजन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेफ बेजोस ने करीब 71 हजार 419 करोड़ रुपये यानी 10 बिलियन डॉलर दान करने का ऐलान किया है। यह रकम उनकी कुल संपत्ति का 7.7 फीसदी है। जेफ बेजोस की संपत्ति करीब नौ लाख 28 हजार 444 करोड़ रुपये यानी 130 बिलियन डॉलर है। जेफ ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर बताया कि वे बेजोस अर्थ फंड की शुरुआत करेंगे। लिखा कि, आज मैं बेजोस अर्थ फंड के लॉन्च से बेहद खुश हूं। जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के लिए एक बड़ा खतरा है। इसलिए जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए मैं अभी तक के ज्ञात तरीकों और इससे निपटने के लिए नए तरीकों दोनों के लिए काम करने का इच्छुक हूं।'

आगे लिखा कि पृथ्वी को बचाने के लिए यह पहल जलवायु वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैर सरकारी संगठनों को फंड मुहैया कराएगी। ⁣⁣हम पृथ्वी को बचा सकते है। इस पहल से बड़ी कंपनियां, छोटी कंपनियां, विभिन्न देश, वैश्विक संगठन और व्यक्तिगत स्तर पर सभी एकजुट होंगे। बता दें कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए अमेजन के कर्मचारियों ने बेजोस पर पहल करने का दबाव बनाया था। इसके लिए अमेजन के 350 से अधिक कर्मचारियों ने जनवरी माह में हस्ताक्षर अभियान चलाया था, जिसमें कहा गया था कि साल 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को शून्य के स्तर पर लाया जाना चाहिए। सितंबर 2019 में जेफ बेजोस ने साल 2040 तक कंपनी को कार्बन न्यूट्रल और साल 2030 तक 100 फीसदी नवीकरणीय ऊर्जा और 2030 तक एक लाख इलेक्ट्रिक वाहन की डिलीवरी करने की भी घोषणा की थी। 

 

10-01-2020
चंद्र ग्रहण में आज सूतक मान्य नहीं, राशियों पर नहीं पड़ेगा प्रभाव

रायपुर। आज रात 10:35 से रात 3:31 तक पौष माह पूर्णिमा पर मध्य चंद्रग्रहण होगा। ग्रहण का स्पर्श रात 10:38 पर ग्रहण का मध्य रात 12:40 और मोक्ष काल रात 2 बजकर 42 मिनट पर होगा। ज्योतिषियों के मुताबिक इस ग्रहण का धार्मिक दृष्टि से कोई महत्व नहीं माना जाएगा क्योंकि इसमें सूतक आदि मान्य नहीं होगा। ज्योतिषों के अनुसार ग्रहण के दौरान चंद्रमा पृथ्वी की बिजाई छाया से गुजरेगा इसमें मामूली सी संक्रांति मलिन हो जाएगी। ज्योतिषीय गणित की दृष्टि से इसे ग्रहण नहीं माना जा सकता ग्रहण का गलत प्रभाव देशभर में नहीं पड़ेगा। वहीं धर्म शास्त्रों में इसे मद्दा ग्रहण कहते हैं। भारत में इस ग्रहण का असर ना के बराबर होगा इस ग्रहण पर सूतक नहीं लगेगा।

 

 

27-12-2019
ग्रामीणों और बच्चों ने सोलर फिल्टर के माध्यम से देखा सूर्य ग्रहण का नजारा

कोंडागांव। ग्राम बनजुगानी, कोदागांव, कोकोड़ी, कुसमा व कारसिंग के ग्रामीण एवं बच्चों समेत काफी संख्या में लोगों ने गुरूवार सुबह वर्ष का आखिरी सूर्य ग्रहण देखा, लेकिन कुछ हिस्सों में बादल छाए होने के कारण लोगों को निराशा हुई। प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन के कार्यकर्ताओं द्वारा यह दुर्लभ नजारा को सोलर फिल्टर के माध्यम से आसानी से सूर्यग्रहण के नज़ारे को दिखाया गया। गुरुवार को सुबह 08:17 बजे से 10:57 बजे के बीच सूर्यग्रहण लगा रहा जिसे देखने के लिए बच्चों एवं ग्रामीणों में कौतूहल का विषय रहा। ग्रामीण व बच्चों को सूर्यग्रहण में होने वाली सूर्य, पृथ्वी व चन्द्रमा के परिक्रमा व उनके अक्षीय-कक्षीय गति से के बारे में बताया गया। साथ ही उन्हें नग्न आंखों से सूर्यग्रहण को देखने से होने वाली परेशानियों व उन परेशानियों के कारणों से भी अवगत कराया गया। नग्न आंखों से न देखकर सोलर फिल्टर का इस्तेमाल कर दूरदर्शी के माध्यम से सूर्यग्रहण का नजारा देखकर सभी उत्साहित हुए। जिसमे खगोल विज्ञान की चर्चा कर गांव-समुदाय के लोग सूर्यग्रहण से भली भांति से परिचित हुए। साथ ही संस्था के कार्यकर्ताओं ने बताया कि जब चन्द्रमा अपने अक्षीय गति से गति करते हुए सूर्य व पृथ्वी के बीच आ जाती है तब सूर्यग्रहण का संयोग बनता है। ग्रामीणों व बच्चों ने सूर्यग्रहण के बारीकी को समझा।

26-12-2019
आग के छल्ले जैसा नजर आ रहा सूर्य, साल का आखरी ग्रहण आज

नई दिल्ली। सूर्यग्रहण के दौरान गुरूवार को सूर्य आग के छल्ले जैसा नजर आएगा। इसका कारण यह है कि इन दिनों  सूर्य पृथ्वी के अपेक्षाकृत निकट है, जबकि चंद्रमा दूर है। अत: चंद्रमा सूर्य को पूरा नहीं ढक पाएगा और इसकी परिधि नजर आती रहेगी। हालांकि, यह नजारा दक्षिण भारत के कुछ शहरों से ही नजर आएगा। शेष स्थानों से आंशिक सूर्यग्रहण दिखेगा। भारत में इससे पहले एन्यूलर सूर्यग्रहण 15 जनवरी 2010 को देखा गया था, जबकि अगला सूर्यग्रहण 21 जून 2020 को दिखाई देगा। यहां यह महत्वपूर्ण है कि अगले 100 वर्षों में भारत में केवल छह सूर्यग्रहण ही देखे जा सकेंगे, जो वर्ष 2020, 2031, 2034, 2064, 2085 और 2114 में दिखाई देंगे।

इस ग्रहण को रिंग ऑफ फायर नाम दिया गया है

एरीज के वैज्ञानिक शशिभूषण पांडे ने बताया कि एन्यूलर सूर्यग्रहण की विशेषता यह होती है कि इसमें चंद्रमा सूर्य की परिधि के अलावा शेष भाग को ढक लेता है, जिससे केवल इसकी परिधि दिखाई देती है, जो एक आग के छल्ले की तरह नजर आती है, इसीलिए इस ग्रहण को रिंग ऑफ फायर नाम दिया गया है।नैनीताल सहित उत्तर भारत के अधिकतर क्षेत्रों में हालांकि आंशिक सूर्यग्रहण ही दिखाई देगा, लेकिन दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों से एन्यूलर सूर्यग्रहण दिखाई देगा, जिनमें कोयंबटूर कोझिकोड, मदुरई आदि शहर शामिल हैं, जहां से सर्वाधिक एन्यूलर ग्रहण दिखाई देगा। पांडे ने बताया कि भारत में इस सूर्यग्रहण का सर्वाधिक कवरेज कोयंबटूर से होगा। इसके अलावा, एन्यूलर ग्रहण सऊदी अरब, कतर, यूएई, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका, मलयेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर और मरियाना आईलैंड इत्यादि से भी दिखाई देगा।

एरीज में विद्यार्थियों के लिए होंगे विशेष कार्यक्रम

26 दिसंबर को लगने वाले एन्यूलर सूर्यग्रहण को लेकर आर्यभट्ट शोध एवं प्रेक्षण विज्ञान संस्थान (एरीज) नैनीताल में विशेष तैयारियां की गईं हैं। डीएम सविन बंसल की पहल पर यहां विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों एवं आम नागरिकों के लिए सूर्यग्रहण दर्शन के अलावा वैज्ञानिकों से वार्ता, क्विज, निबंध, टॉक प्रतियोगिता होगी। इसमें विशेषकर विद्यार्थियों को सूर्यग्रहण से संबंधित वैज्ञानिक जानकारियां दी जाएंगी। एरीज के वैज्ञानिक शशिभूषण पांडे ने बताया कि डीएम सविन बंसल मुख्य अतिथि होंगे। उन्होंने बताया कि एरीज के निदेशक डॉ. दीपांकर बनर्जी सूर्यग्रहण के अध्ययन के लिए कोयंबटूर रवाना हो चुके हैं, जहां वे इस एन्यूलर सूर्यग्रहण का वैज्ञानिक अध्ययन करेंगे।

28-11-2019
आकाशगंगा में है इतना बड़ा ब्लैक होल कि समा सकते हैं 70 सूरज

नई दिल्ली। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने आकाशगंगा में एक बड़े ब्लैक होल की खोज की है। इसका आकार सूरज से करीब 70 गुना बड़ा बताया जा रहा है। सूरज पृथ्वी से 13,00000 गुना बड़ा है। जितना हमारे सौर मंडल का कुल वजन है, उसका 99.8 प्रतिशत अकेले सूरज का है। बता दें कि ब्लैक होल अंतरिक्ष का वो हिस्सा है, जहां भौतिक विज्ञान का कोई नियम काम नहीं करता। खबर के मुताबिक अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने जिस ब्लैक होल की खोज की है, उसे एलबी-1 नाम दिया गया है। पृथ्वी से एलबी-1 की दूरी 15 हजार प्रकाश वर्ष है।

नेशनल एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी ऑफ चाइना के प्रोफेसर ली जीफेंग के अनुसार आकाश गंगा में अनुमानित 100 मिलियन छोटे ब्लैक होल हो सकते हैं, लेकिन एलबी-1 जैसे आकार का ब्लैक होल चौंकाने वाला है।  एलबी-1 की खोज अंतराराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने चीनी टेलिस्कोप से की है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के खगोलविद् और ब्लैक होल के विशेषज्ञ पॉल मैक्नमारा ने बताया कि पिछले 50 वर्ष से ज्यादा समय से वैज्ञानिकों ने देखा है कि हमारी आकाशगंगा के केंद्र में कुछ बहुत चमकीला है। पॉल ने बताया कि ब्लैक होल में इतना मजबूत गुरुत्वाकर्षण है कि तारे 20 वर्ष में इसकी परिक्रमा कर पाते हैं। वहीं, हमारी सौर प्रणाली में आकाशगंगा की परिक्रमा में 23 करोड़ साल लगते हैं। 

20-11-2019
मार्स रोवर ने भेजी तस्वीरें, मंगल ग्रह पर हैं कीट-पतंगें!

ओहिया। दुनियाभर के वैज्ञानिक पृथ्वी के अलावा अन्य ग्रहों  पर भी जीवन की संभावनाएं खोजने में जुटे हैं। इसी क्रम में अमेरिका के एथेंस में ओहियो यूनिवर्सिटी के विलियम रॉमोजर ने हालिया अध्ययन में मंगल ग्रह पर जीवन के सबूत खोजने का दावा किया है। सेंट लुइस में एंटॉमोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका कांफ्रेंस में ओहियो यूनिवर्सिटी  ने एक अध्ययन जारी किया। इसमें कहा गया है कि जहां वैज्ञानिक यह तय करने की कोशिश कर रहे हैं कि लाल ग्रह पर जीवन है या नहीं। वहीं, डा. रॉमोजर के शोध से पता चलता है कि उन्होंने मंगल पर जीवन के सबूत हासिल कर लिए हैं। इसमें मार्स रोवर्स को मंगल की तस्वीरें भेजने के लिए धन्यवाद दिया गया है। मार्स रोवर की भेजी तस्वीरों का कई साल से अध्ययन कर रहे हैं डॉ. रॉमोजर
ओहियो यूनिवर्सिटी के मुताबिक डॉ. रॉमोजर मार्स रोवर की भेजी तस्वीरों का कई साल से अध्ययन कर रहे हैं। ये तस्वीरें ऑनलाइन उपलब्ध थीं। उन्होंने इन तस्वीरों में कीट-पतंगों जैसे स्वरूपों के कई उदाहरण खोजे हैं। ये स्वरूप मक्खियों  और रेंगने वाले जीवों की आकृतियों से मिलते-जुलते हैं। ये सबूत जीवाश्मों और जीवित कीट-पतंगों के रूप में हैं। डॉ. रॉमोजर ने कहा कि मंगल ग्रह पर हमेशा से जीवन था, जो आज भी मौजूद है। मंगल पर पाई गई आकृतियां और सबूत पृथ्वी के कीट-पतंगों से काफी समान हैं। इनमें कुछ के पंख थे। वे पंख फडफ़ड़ाते भी हैं। कुछ स्ट्क्चर्स में ग्लाइडिंग और उड़ान भरने की क्षमता के सबूत पाए गए हैं। डॉ. रॉमोजर ने कहा कि मंगल ग्रह पर कई पैरों वाली आकृतियां भी मिली हैं।  रोवर की ली गई कुछ तस्वीरों में मकड़ी, कॉकरोच जैसे कई आथ्र्रोपॉड  वाले जीवों के संकेत भी मिले हैं। उन्होंने कहा कि इन आकृतियों का स्वरूप भविष्य में मिलने वाली गहन जानकारी के आधार पर बदल भी सकता है।  

19-10-2019
 विज्ञान एवं तकनीकी विकास तथा भू-विज्ञान और जल संसाधन विषय पर हुआ व्याख्यान

रायपुर। 46वीं जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय विज्ञान, गणित एवं पर्यावरण प्रदर्शनी में जीवन की चुनौतियों के लिए वैज्ञानिक समाधान के तहत विज्ञान एवं तकनीकी विकास तथा भू-विज्ञान और जल संसाधन विषय पर वैज्ञानिक व्याख्यान हुआ। राजधानी रायपुर के शंकरनगर स्थित बीटीआई मैदान में बच्चों के लिए आयोजित इस प्रदर्शनी के अंतिम दिन पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर के पूर्व कुलपति एवं प्राध्यापक प्रोफेसर एसके पाण्डेय द्वारा ‘‘साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी फॉर इनक्लूसिव ग्रोथ’’ पर व्याख्यान दिया गया। प्रो. पाण्डेय ने छात्र-छात्राओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि विज्ञान हमारे जीवन का हिस्सा हैं और जवाहरलाल नेहरू जी का सपना था कि हम अपने जीवन में विज्ञान को हिस्सा बनाएं। हम पहले क्या थे और आज क्या हैं। इसकी तुलना हमें करना चाहिए। हमारी इस उन्नति का श्रेय केवल विज्ञान और तकनीकी को जाता है। विज्ञान क्या है? ज्ञान के क्रमबद्ध विकास को विज्ञान कहते हैं। किसी विषय पर ज्ञान इकट्ठा करना विज्ञान है। संपूर्ण ब्रम्हाण्ड में सबसे बुद्धिजीवी प्राणी मनुष्य है अतः मनुष्य का दायित्व है कि वह इसे समझे और अपनी आने वाली पीढ़ी को इसे बताए कि कोई घटना होती है तो क्यों और कैसे होती है। सभी चीजों के पीछे विज्ञान छिपा है और इस रहस्य को हमें ढूंढना है। यह किसी देश विशेष का नहीं है, बल्कि डेमोक्रेटिक, ऑब्जेक्टिव, सेल्फ-रेगुलेटिंग और ग्लोबल है। इसमें सवाल का उत्तर ढूंढते हैं और इसके लिए प्रयोग करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हम केवल एक हल प्राप्त कर संतुष्ट हो जाएं। इस हल में अनेक प्रश्न होते हैं और प्रत्येक का उत्तर हमें ज्ञात करना होता है। यह अनंत काल तक चलने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में जिसका हल हम नहीं ढूंढ पाते उसे अगली पीढ़ी के लिए छोड़ देते हैं। 
      
    कार्यक्रम में द्वितीय प्रवक्ता प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष भूविज्ञान विभाग पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर डॉ. निनाद बोधनकर ने अपने उद्बोधन में कहा कि हम केवल भौतिक, रसायन, गणित, जीवविज्ञान की बात करते हैं, लेकिन हमें इसके साथ जल को भी जोड़ना चाहिए। पानी में भौतिक, रसायन आदि हैं। पृथ्वी ही ऐसा ग्रह है जिसमें पानी पाया जाता है, लेकिन ऐसा क्या है कि पृथ्वी में ही पानी पाया जाता है। पानी 97 प्रतिशत उपलब्ध है जिसमें 3 प्रतिशत शुद्ध जल है। ग्लेशियर को लिया जाए तब 68 प्रतिशत पानी है। अतः पानी ठोस, द्रव और गैस तीनों रूप में विद्यमान है। यहां भौतिकी दिखाई देता है। यह समुद्र में वाष्पन द्वारा बादल रूप में बदलता है, जो वर्षा के रूप में प्राप्त होता है। पानी हिम पर्वत क्षेत्र में ठोस रूप में विद्यमान रहता है। समुद्र का जल खारा है, लेकिन कैसे हुआ यह हमें भौतिक विज्ञान बताता है। जब से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई है तब से पानी की मात्रा उतनी ही है न यह घटी है न ही बढ़ी है। मौसम परिवर्तन के पीछे का कारण पृथ्वी के घूर्णन है। सूर्य पृथ्वी के भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न प्रभाव डाल रही है, जिससे वाष्पन हो रहा है। यह बादल के रूप में रहता है जो वर्षा के रूप में जमीन में आता है जिससे विभिन्न तत्व इसमें मिल जाते हैं, जिससे इसकी रसायन बदल जाती है। पानी की गुणवत्ता बदल जाती है। पानी की समस्या औद्योगीकरण के कारण है। उपलब्ध पानी में कहीं आयरन तो कहीं कैल्शियम की मात्रा ज्यादा है। यह शोध का विषय है कि इसकी मात्रा सीमित से ज्यादा है, जो मनुष्य के शरीर के लिए हानिकारक है, इसलिए हमें नुकसान उठाना नहीं पड़े।  डॉ. बोधनकर ने कहा कि पूर्व की बात करें तो गैलिलियों ने टेलीस्कोप का अविष्कार किया, जिससे हम तारे को देख पाए। ब्रम्हाण्ड से जुड़ी कई घटनाएं वैज्ञानिकों ने बताई है, जिससे हम इसे समझ पाएं एवं पृथ्वी, आकाशगंगा, मिल्कीवे आदि को समझ पाए। लोग कहते हैं कि शनि ग्रह को नहीं देखना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है। यह एक अद्भुत ग्रह है जिसका आनंद लेना चाहिए। आज हम चंद्रयान के द्वारा चांद पर पहुंच चुके हैं। इसकी सतह पर क्या है यह हमें जानना चाहिए। कोई क्षुद्रग्रह जीवन का किस प्रकार नुकसान कर सकता है। यह उसकी आकृति पर निर्भर करता है और इसे भी जानना आवश्यक है। हमारा सौर परिवार मिल्की-वे के चारों ओर घूम रहा है और सभी मिल्कीवे एक-दूसरे से दूर जा रही है। हमारी आकाशगंगा में पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन है। अन्य ग्रहों में जीवन नहीं है। हम ब्रम्हाण्ड के आखिरी छोर पर खड़े हैं। हमारी स्थिति तिनके के समान है। ब्रम्हाण्ड के रहस्यों को समझने के लिए भागीदारी आवश्यक है। देश में अंतरिक्ष विज्ञान पर काम हो रहा है। पुराने समय का कार्य अब बढ़ गया है और हम चंद्रयान तक पहुंच चुके हैं। 

14-09-2019
पृथ्वी की ओर बढ़ रहे हैं दो धूमकेतु, बुर्ज खलीफा जितना बड़ा है आकार

नई दिल्ली। दो बड़े धूमकेतु पृथ्वी की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं हालांकि ये पृथ्वी से टकराएंगे नहीं बल्कि नजदीक से गुजर जाएंगे। अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने बताया है कि इन धूमकेतुओं का आकार बुर्ज खलीफा जितना बड़ा है। बता दें कि बुर्ज खलीफा दुनिया की सबसे ऊंची इमारत है। पहली बार है जब कोई धूमकेतु पृथ्वी के इतने नजदीक से गुजरने वाला है। नासा ने ऐसी किसी भी आशंका को खारिज कर दिया है कि ये धूमकेतु हमारे ग्रह के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। ये धरती से करीब 3.5 मिलियन मील की दूरी से गुजर जाएंगे। नासा के मुताबिक जब से सोलर सिस्टम का निर्माण हुआ है तभी से ये धूमकेतु ऐसे ही हैं। इस बीच एक अन्य धूमकेतु सूरज की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इस धूमकेतु को हाल ही में तलाश किया गया है। हालांकि ये वाला धूमकेतु पृथ्वी से काफी दूर से गुजरेगा। माना जा रहा है कि ये सूरज से टकराने के बाद एक बार फिर से अंतरिक्ष में चला जाएगा।

06-08-2019
चंद्रयान-2 पहुंचा चंद्रमा के पास, पांचवी बार पृथ्वी की कक्षा सफलतापूर्वक बदली

नई दिल्ली। चंद्रयान-2 ने मंगलवार को दोपहर बाद पृथ्वी की कक्षा पांचवी बार सफलतापूर्वक बदली। इसके साथ ही अब यह चंद्रमा के और पास पहुंच गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने ट्वीट करके कहा,“आज चंद्रयान-2 ने पांचवीं बार पृथ्वी की कक्षा बदली। चंद्रयान-2 ने मंगलवार को अपराह्न तीन बजकर चार मिनट पर पांचवीं बार सफलतापूर्व कक्षा बदली। उन्होंने कहा कि चंद्रयान सभी मापदंड़ों पर सही ढ़ंग से काम कर रहा है। इससे पहले 24 जुलाई को अपराह्न 2.52 बजे पहली बार चंदयान ने कक्षा बदली थी। इसके बाद 26 जुलाई को दूसरी बार,29 जुलाई को तीसरी बार और दो अगस्त को चौथी बार चंद्रयान ने पृथ्वी की कक्षा बदली थी। चंद्रयान-2 का 22 जुलाई को दोपहर 2.43 बजे श्रीहरिकोटा (आंध्रप्रदेश) के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपण हुआ था, जिसके 16 मिनट बाद ही यान सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में पहुंच गया था। चंद्रयान-2 में ऑर्बिटर, लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) शामिल हैं, जो 48 दिन में तीन लाख 844 किमी की यात्रा पूरी करके चांद के दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करेगा। स्वदेशी तकनीक से निर्मित चंद्रयान-2 में कुल 13 पेलोड हैं। आठ ऑर्बिटर में, तीन पेलोड लैंडर ‘विक्रम’ और दो पेलोड रोवर ‘प्रज्ञान’ में हैं। पांच पेलोड भारत के, तीन यूरोप, दो अमेरिका और एक बुल्गारिया के हैं। चंद्रयान-2 के 20 सितंबर को चांद की सतह पर उतरने की संभावना है और चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद ऑर्बिटर एक साल तक काम करेगा। इसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी और लैंडर के बीच संपर्क स्थापित करना है।

 

04-08-2019
चंद्रयान-2 के कैमरे से ऐसी दिखती है पृथ्वी

नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान-2 द्वारा ली गई पृथ्वी की कुछ सुंदर तस्वीरें रविवार को जारी की। इसरो ने ट्विटर पर चंद्रयान-2 के एलआई4 कैमरे से ली गई पांच तस्वीरें जारी की है। इसरो ने ट्वीट कर कहा, “यह चंद्रयान-2 द्वारा ली गई पृथ्वी की सुंदर तस्वीरों का पहला सेट है। गौरतलब है कि देश के चंद्रमा के लिए दूसरे महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 को 22 जुलाई को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया था। वह 20 अगस्त को चंद्रमा की कक्षा में पहुंचेगा। 

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