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12-05-2020

रायपुर। मल्लूराम शर्मा उर्फ मल्लू पहलवान की पहलवानी का रायपुर में हर कोई दिवाना था। आज भी उनके करतब के किस्से अमिट है। मल्लूराम ने रुस्तमे हिंद स्व.दारा सिंह को कुश्ती की चुनौती दी थी। 1946 में एक ईरानी की चुनौती पर साइंस कॉलेज रायपुर में सीना फूलाते ही लोहे की मोटी जंजीर को तोड़कर शरीर से अलग कर दिया था। 1950 के आस-पास देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के रायपुर आगमन पर मल्लूराम ने उनके समक्ष जमीन पर लेटकर हाथी का पैर सीने पर रखवाया था। इस करतब को पंडित नेहरू के साथ ही भीड़ में मौजूद सभी सांसे रोके देखते ही रह गए। ऐसे थे मल्लूराम, उनका सम्मान छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी व डॉ. रमन सिंह तक कर चुके हैं।

ऐसे ही मल्लूराम कई हैरतअंगेज करतब जैसे छाती पर लोहे की छड़ रखवाकर उसे छेनी से हथौड़े की मार से दो टुकड़े कराना। दांत से ढाई मन के लोहे के पाइप को उठाना, जल से भरी गुंडी को दांतों से उठाना, सिर पर बोतल व बोतल के ऊपर नारियल रखकर उसे लाठी के एक वार से फुड़वाना, छुरी की नोंक से काजल लगाना आदि किया करते थे। उनकी ख्याति को सुनकर फ्रांस की पत्रिका हेल्थ एंड स्ट्रैंथ ने उनकी तस्वीर को उनकी खूबियों के वर्णन सहित प्रकाशित किया था। पैदा होने के समय से मल्लूराम के दोनों पैर की ऐडी मुड़ी हुई थी। इसके बाद भी उनका हौंसला कम नहीं हुआ। बगैर जूते के तो वह चल नहीं सकते थे लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी बनने नहीं दिया। उन्हें किसी भी कोटे में नौकरी नहीं मिली लेकिन कभी निराश नहीं हुए। उन्होंने कापा में नौकरी की। मिलिट्री छावनी टूट गई तो सन 1946 में शासकीय साइंस महाविद्यालय रायपुर में स्टेनोग्राफर के पद पर नौकरी शुरू की। 1980-84 में विधि कॉलेज में लिपिक रहे। महंत कॉलेज में कार्यकर सेवानिवृत्त हुए। कार्य के साथ अपनी पहलवानी को मल्लूराम ने बखूबी साधा। पुरानी बस्ती के जैतूसावमठ अखाड़े में उनकी पहलवानी की तूती बोलती थी। 1941 में 20 वर्ष की आयु से पहलवानी शुरू किए थे। 5 फीट 11 इंच के मल्लूराम जब अपना 48 इंच का सीना फुलाते थे तो वह 56 इंच का हो जाता था। उम्र के आखिरी पड़ाव में भी 100 नंबर की बनियान ही उन्हें आरामदायक लगती थी।

ऐसी ही भीड़ में एक 10 वर्षीय लड़की अक्सर 20 वर्षीय मल्लूराम की पहलवानी का करतब देखने आया करती थी, जो उनकी जीवन साथी बनी। आज 10 मई को दोनों की शादी की 78वीं सालगिरह है। आज दोनों इस दुनिया में नहीं है। मल्लूराम शर्मा का निधन 24 अगस्त 2016 को और उनकी धर्मपत्नी शांता शर्मा का निधन 7 अप्रैल 2017 को हुआ। लिली चौक में मल्लूराम की धर्मपत्नी स्व.शांता शर्मा मायका था। अक्सर पुरानी बस्ती के जैतूसाव मठ अखाड़े में होने वाले करतब को देखने परिवार के साथ पहुंचती थीं। विशेषकर नागपंचमी पर लोग मल्लूराम शर्मा के करतब देखने अखाड़ा पहुंचते थे। कई अनोखे व जोखिम भरे शक्ति प्रदर्शन मल्लूराम किया करते थे। सीने पर 10 मन का पत्थर रखकर घन से फोड़ना प्रमुख था। सन 1950 में तत्कालीन कलेक्टर एमपी दुबे की उपस्थिति में उन्होंने अपने सीने पर पत्थर रखकर फुड़वाया था। उनके सहयोगी मनराखन लाल हथौड़े से पत्थर तोड़ते थे,जब तक पत्थर टूट ना जाए। प्रदर्शन के दौरान मल्लूराम के सीने पर फोड़ा गया पत्थर आज भी पुरानी बस्ती निवासी अनंत यदु के दरवाजे पर रखा हुआ देखा जा सकता है। पत्थर महाराजबंध तालाब से उठा  कर लाया गया था। मल्लूराम शर्मा ने यह करतब रायपुर में कई स्थानों में दिखाया था। राजकुमार कॉलेज में भी उन्होंने इस कला का प्रदर्शन किया। महंत लक्ष्मीनारायण दास कॉलेज के प्रोफेसर आरके कपूर, स्व.शारदाचंद तिवारी, हिम्मतलाल मानिकचंद आदि प्रबुद्धजनों ने प्रदर्शन का आयोजन करा कर मल्लूराम को प्रोत्साहित किया।

मल्लूराम शर्मा के बड़े भाई स्व.रेवाप्रसाद उपाध्याय भी मंझे हुए पहलवान थे। उनकी प्रेरणा से ही मल्लू ने पहलवानी शुरू की थी। बड़े भाई की आज्ञा का पालन करते हुए मल्लूराम ने कभी रायपुर के बाहर अपने बल का प्रदर्शन नहीं किया। मल्लूराम शर्मा जीवनभर महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कार्य किए। विशेषकर ब्राह्मण समाज की लड़कियों की शिक्षा के लिए जोर दिया क्योंकि आमतौर पर पहले लड़के की जल्दी शादी कर दी जाती थी। अपनी बेटी को भी पढ़ा लिखाकर काबिल बनाया, उनकी बेटी किरणमई तिवारी भी नगर निगम एजुकेशन ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त हुई।

16-04-2020

रायपुर। एक बार उसने टेबल टेनिस का बल्ला थामा तो बस वही उसका सबसे प्यारा साथी बन कर रह गया। आज भी टेबल टेनिस के लिए उसका प्यार कम नहीं हुआ है। टेबल टेनिस का चमकता सितारा आज छत्तीसगढ़ में टेबल टेनिस की नई पौध तैयार करने में लगा हुआ है। हम बात कर रहे हैं टेबल टेनिस के शानदार सितारे विनय बैसवाड़े की। स्कूल जीवन से ही टेबल टेनिस से उसका प्यार हुआ जो आज भी बरकरार है। अखंड मध्यप्रदेश में वे तीन बार विजेता रहे और दो बार उपविजेता। जब छत्तीसगढ़ बना तो आपने वर्ग में वह 8 बार विजेता रहे और 5 बार विजेता बनने से चुप कर रनर अप रहे। ऑल इंडिया इंस्टिट्यूशनल टेबल टेनिस टूर्नामेंट में 7 बार उन्होंने कांस्य पदक जीते और अखिल भारतीय पब्लिक सेक्टर टेबल टेनिस टूर्नामेंट में 4 बार विजेता बनकर कप उठाने का गौरव हासिल किया। अखिल भारतीय जीवन बीमा निगम टेबल टेनिस स्पर्धा में 4 बार विजेता और 8 बार उपविजेता रहे विनय बैसवाड़े। 2008 के अखिल भारतीय कारपोरेट ओलंपिक में भी विजेता बनने का गौरव हासिल किया था विनय बैसवाड़े ने। राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाओं में भाग लेने की तो शायद गिनती उन्हें भी याद नही होगी और अखंड़ मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ की टेबिल टेनिस टीम के कितनी बार कप्तान रहे ये भी वे शायद बता नही पाएंगे। झारखंड में हुए 34वें. राष्ट्रीय खेलों में उन्होंने छत्तीसगढ़ की टेबल टेनिस टीम की कप्तानी की। कोच तो वे जाने कितनी बार बने और अपनी टीम को पदक भी दिलाते रहे।

2005 में पुणे नेशनल रैंकिंग टेबल टेनिस प्रतियोगिता में क्वार्टर फाइनल खेलकर देश के टॉप 08 खिलाड़ियों में स्थान भी बनाया था। वे अंतरराष्ट्रीय अंपायर भी है और उन्होंने बहरीन में हुए टेबल टेनिस के जूनियर वर्ल्ड कप में शानदार बेदाग अंपायरिंग भी की। उनकी खेल प्रतिभा का लाभ टेबल टेनिस संघ के प्रदेश अध्यक्ष शरद शुक्ला ने उन्हें संघ का महासचिव बनाकर उठाया और वे महासचिव के रूप में संघ को लगातार प्रगति की ओर ले जाने में कोई कसर नही छोड़ रहे है। स्वभाव से बेहद शर्मीले विनय सच मे विनय की प्रतिमूर्ती है। छत्तीसगढ़ को अपनी इस विलक्षण खेल प्रतिभा पर गर्व है। टेबल टेनिस संघ का उपाध्यक्ष होने के नाते मुझे भी उनपर गर्व है। सौ सौ सलाम इस शानदार खिलाड़ी को।

14-04-2020

रायपुर। बचपन से फुटबॉल के दीवाने थे वे। जब मौका मिलता वे फुटबॉल लेकर घर के आंगन में या सामने मैदान में खेलने में रम जाते थे। फुटबॉल के लिए उनबकी दीवानगी यूँही नहीं थी। वे खुद भी फुटबाल के जादूगर थे। बहुत कम उम्र में ही उन्हें स्कूल नेशनल खेलने का मौका मिला और फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। हम बात कर रहे हैं शहर के अपने समय के मशहूर फुटबॉल सितारे नॉटली कॉस्टर की। नॉटली कॉस्टर यानी फुटबॉल,फुटबॉल यानी नॉटली कॉस्टर। दूर-दूर से लोग उनका खेल देखने आते थे। फुटबॉल तो मानो उनके पैर से प्यार करती थी। उनके पैरों से लिपटे ही रहा करती थी। कमाल की जादूगरी थी उनके पैरों में। और तेजी तो मानो वे हवा से बातें करते थे। जब मैदान में उतरते थे, चारों ओर से शुरू होता नॉटली नॉटली नॉटली। 1960 में वे इंफाल में स्कूल नेशनल खेलें। 61 में इंदौर 62 में कोलकाता में उन्होंने स्कूल नेशनल में अपनी कला का जौहर दिखाया।

साल 70 आते आते वे संतोष ट्रॉफी के लिए मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व करने लगे। 70 में कोलकाता 71 में बेंगलुरु 72 में चेन्नई और 73 में गोवा में उन्होंने फुटबॉल के मैदान में अपनी जादूगरी दिखाई। उसके बाद स्टेट बैंक मैं उनका चयन हो गया और वे स्टेट बैंक की तरफ से खेलने लगे। भोपाल सर्कल की ओर से वे 75 से 79 तक खेलते रहे। अहमदाबाद, विजयवाड़ा और कोलकाता में उन्होंने अपनी कला का जौहर दिखाया। स्टेट बैंक से ही रिटायर होने के साथ ही उन्होंने फुटबॉल को भी अलविदा कह दिया। स्टेट बैंक में चुने जाने से पहले उन्होंने होलीक्रॉस बैरन बाजार स्कूल में पढ़ाया भी। उनका शिष्य होने का सौभाग्य मुझे भी मिला। उस दौर में फुटबॉल में भिलाई का दबदबा हुआ करता था। भिलाई जिमखाना क्लब की ओर से वे खेला करते थे और उनके साथ खेला करते थे डॉक्टर सुबीर मुखर्जी,जहीर भाई,आनंद वर्मा और मोहित खान यह पांचो खिलाड़ी तब पांच पांडव कहलाया करते थे। उसके बाद पीपीएसए यानी पूर्व प्रवीर संघ यहां बना और वे आखिर तक पीपीएस के लिए खेलते रहे। नॉटली कॉस्टर उस दौर एक चमकता नक्षत्र फुटबॉल का जिसने छत्तीसगढ़ को फुटबॉल के नक्शे पर अलग पहचान दी।

12-04-2020

रायपुर। क्रिकेट का जादू जब सिर पर चढ़कर बोलने लगा था तब शहर में क्रिकेट के एक से बढ़कर एक सितारे हुए उनमें से एक है डॉ.अजय पाठक। अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ.पाठक आज हड्डियां जोड़ते हैं लेकिन एक समय था कि अपनी फिरकी यानी स्पिन गेंद से भी अच्छे से अच्छे बल्लेबाज की हड्डियां चटकाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। ऊंची कद काठी का फायदा उन्हें मिलता था। अपनी ऑफ ब्रेक के बीच वे फास्टर वन फेंक कर बल्लेबाज को चकमा दे देते थे। उनकी फास्टर वन कमाल की व अचूक होती थी। सितारों से सजी साइंस कॉलेज की टीम को तो उन्होंने बिलासपुर में अकेले अपने दम पर करारी शिकस्त दी थी। उस मैच में मेडिकल कालेज की ओर से खेलने वाले अकेले स्टार प्लेयर थे। स्कूल से ही अजय पाठक का खेलों के लिए जबरदस्त रुझान था। हॉकी क्रिकेट के अलावा भी स्कूल में वे फुटबॉल भी खेलते थे। कॉलेज पहुंचे तो फुटबॉल छूटा और क्रिकेट और हॉकी में वे रविशंकर विश्वविद्यालय की टीम के लिए चुने गए। मेडिकल की पढ़ाई के कारण हॉकी भी छूट गई लेकिन क्रिकेट से प्यार उनका बना रहा। विश्वविद्यालय की टीम से शानदार प्रदर्शन के कारण उन्हें विजी ट्रॉफी के लिए चुना गया था।

उन्होंने इंटर यूनिवसिर्टी टूर्नामेंट में शानदार शतक भी जड़ा था। विजी ट्राफी के अलावा उनका रणजी ट्राफी में भी चयन हुआ था लेकिन मेडिकल कालेज की पढ़ाई भी उनके लिए तब जरूरी थी। अपने समय के बेहतरीन ऑलराउंडर रहे अजय पाठक। उनकी फास्टर वन उनका अचूक हथियार थी जो बल्लेबाज के समझ में नहीं आती थी। या तो वो स्टम्प चटखाती थी सेट और अगर अंदर घुसी तो पसली और सामने निकले पैर पर गहरी मार करती थी। समय बदला तो क्रिकेट भी छूटता चला गया और वे लॉन टेनिस में हाथ आजमाने लगे। लॉन टेनिस में भी उन्होंने अखंड मध्यप्रदेश की ओर से और छत्तीसगढ़ की ओर से सिविल सर्विसेस टूर्नामेंट में अपनी खेल प्रतिभा का परिचय दिया। अजय एक समय मेडिकल कॉलेज के अजेय बल्लेबाज हुआ करते थे। अपने समय के शानदार चमकते सितारे रहे हैं वे। आज का गॉस मेमोरियल ग्राउंड तब क्रिकेट मैचों के लिए मशहूर हुआ करता था। तब शहर के अलावा आसपास के कस्बो से भी लोग यंहा मैच देखने आया करते थे और उस दौर में डॉ.अजय पाठक का भी अपना एक बड़ा फैन ग्रुप हुआ करता था। उस दौर में वे क्रिकेट प्रेमियों के चहेते खिलाड़ियों में से एक थे। खेलों के अलावा डॉ.अजय पाठक संगीत प्रेमी भी है, सुरों को भी उन्होंने साध रखा है अच्छा गाते तो है सिटी भी बहुत ही सुरीली बजाते है,कभी मौका मिले तो इस फन का भी आनन्द भी आप चाहे तो उठा सकते हैं।

नोट : शाहिद खान, जगपाल, सुशील डेविड, अजय पाठक, प्रदीप सिंह, इंदर मलानी, अजय मसीह, सोमनाथ, अजय श्रीवास्तव, महमूद हसन, विजय सांगोई, शील।
 

10-04-2020

रायपुर। एक दौर था जब रायपुर का नाम हॉकी के राष्ट्रीय नक्शे पर शान से चमकता था। वह छत्तीसगढ़ की हॉकी का सुनहरा दौर था। राजनांदगांव का लालबाग बिलासपुर रेलवे की हॉकी और रायपुर का एथलेटिक क्लब हॉकी की शान हुआ करता था। तब हॉकी के सालाना कार्यक्रम का अंतिम पड़ाव हुआ करता था नेहरू मेमोरियल गोल्ड कप टूर्नामेंट। देश की सारी जानी मानी टीम व सितारे हॉकी का अपना जादू यहां दिखाने आते थे। सुभाष स्टेडियम कभी हॉकी के दीवानों से पटा रहता था। नए लड़के ग्राउंड में उतरने के लिए अपनी बारी का 3-4 दिन इंतजार किया करते थे। पोलैंड के खिलाफ जब भारत की टीम का यहां प्रदर्शन मैच हुआ था तब रायपुर के ही सुब्बी पांडे और अज्जू भाई को मैदान पर उतारा गया था। कुछ देर के लिए ही सही पूरा स्टेडियम तालियों से गूंज गया था। सारे लोगों ने अपने शहर के हॉकी के सितारों का जमकर स्वागत किया था। अज्जू भाई, सुब्बी पांडे के दौर के बाद हॉकी ने बहुत उतार-चढ़ाव देखें। क्रिकेट हॉकी पर हावी होता चला गया था लेकिन एक नाम ऐसा रहा नजीर का जो खुद अपनी नजीर बन गया। नजीर ने स्कूल से ही हॉकी पकड़ी और आज भी वो हॉकी ही थामे हुए हैं।

कोरोना ने जब सारी दुनिया में कहर मचा रखा है सारी दुनिया की रफ्तार थाम ली है तब भी नजीर भाई हॉकी उठाकर अपने ही घर में उससे अपना प्यार जताने से नही चूकते। हॉकी के लिए जो दीवानगी नजीर भाई में देखने मिलती है वो बेमिसाल है। आज भी नजीर यानि हॉकी और हॉकी यानि नजीर भाई। लॉक डाउन के पहले तक रोज सुबह शाम रोज निस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएं हॉकी की नई पौध तैयार करने के लिए दे रहे थे। हॉकी के लिए उनका प्यार बेमिसाल है। चाहे स्कूल के टूर्नामेंट हो कॉलेज के पुलिस के या फिर गोल्ड कप के शुरुआती मैच, उनकी हॉकी का जादू हर मैच में लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। उनके जादू को लोग आज भी याद करते हैं। उनके समकालीन बहुत से नाम हैं अगर उनको गिनाना शुरू करें तो बहुत लंबी दास्तान हो जाएगी। फिलहाल हॉकी के सुनहरे दिनों की नजीर नजीर भाई को सौ-सौ सलाम वे सलामत रहे और हॉकी इन नई पौध तैयार करते रहे।