GLIBS

कांग्रेस के भीतर बैठे दस दुश्मन

पंकज शर्मा  | 15 Jun , 2019 01:17 PM
कांग्रेस के भीतर बैठे दस दुश्मन

अपने पत्रकारीय जीवन में मैं ने तकरीबन ढाई दशक तक कांग्रेस के भीतर झांक-झांक कर खबरें बाहर निकालीं। उसके बाद अब कांग्रेस के भीतर काम करते-करते भी बारह बरस पूरी तरह पूरे हो गए हैं। मैं 1979 की मई में टाइम्स के बतौर प्रशिक्षु-पत्रकार बंबई पहुंचा था और उसी साल अक्टूबर में नई दिल्ली के नवभारत टाइम्स में भेज दिया गया। सातवीं लोकसभा की चुनावी चहल-पहल तब तक गरमाने लगी थी। दो-ढाई महीने बाद ही इंदिरा गांधी 353 सीटों के साथ फिर अपनी राजगद्दी पर लौट आईं। उन्हें पौने 43 फीसदी वोट मिले। करीब साढ़े आठ करोड़ मतदाताओं ने कांग्रेस के सिर पर दोबारा सेहरा बांध दिया। जनता पार्टी को पौने चार करोड़ वोट मिले। यानी कांग्रेस से आधे।

कोई चार दशक बाद आज हस्तिनापुर का दृश्य करीब-करीब वैसा ही, लेकिन उलट, है। भारतीय जनता पार्टी 303 सीट और सवा 37 फीसदी वोट ले कर राजगद्दी पर बैठी है। नरेंद्र भाई मोदी को पौने 29 करोड़ मतदाताओं ने अपना समर्थन दिया है। कांग्रेस को करीब 12 करोड़ ने। यानी भाजपा से आधे।

अब जब, कांग्रेस को बाहर से तो जो देखा-सो-देखा, भीतर से भी उसे बहुत कुछ देख लिया है; मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि न तो मोदी-शाह (मोशा) की भाजपा कांग्रेस की मुसीबत है और न मोहन भागवत के स्वयंसेवक। कांग्रेस की असली मुसीबत उसके अंत:पुर की गुदगुदी शैयाओं पर पैर पसारे बैठे उसके दस दुश्मन हैं। इन्होंने सोनिया-राहुल-प्रियंका की हर पुण्याई को पिछले दो दशक में कतरा-कतरा नष्ट किया है। जब तक यह शत्रु-दल कांग्रेस के परकोटे में मौजूद है; कोई राहुल, कोई प्रियंका, कोई सोनिया कांग्रेस को आज की खाई से खंीच कर बाहर नहीं ला सकते। कोई बुरा माने-तो-माने, लेकिन आइए, कांग्रेस के इन दस दुश्मनों में से पांच से मैं आपको आज सरेआम मिलवाता हूं और बाकी पांच से आपका तआर्रुफ अगले शनिवार खुलेआम करवाऊंगा।

1. अहंकार: कांग्रेस की चाय से ज्यादा गर्म उसकी केतली है। सोनिया, राहुल और प्रियंका निजी तौर पर बेहद सहज हैं। कुछ और भी हैं, जिन्हें यह गुण अपने पारिवारिक संस्कारों से मिला होगा, सो, वे आंखें तरेर कर नहीं विचरते हैं। मगर कांग्रेसी कुर्सियों पर बैठे नब्बे प्रतिशत चेहरे बेतरह ऐंठे हुए हैं। वे ह्यमैं तो साहब बन गयाह्ण भाव से सने हुए हैं। उनके पास सिर्फ़ अपने लिए और अपनों के लिए वक़्त है। मैं ऐसों को जानता हूं, जिन्होंने मुलाकात की गुजारिश करने वालों को दो-दो-चार-चार महीनों से नहीं, दो-दो-चार-चार साल से समय नहीं दिया है। इनमें खटारा हो रहे बुजुर्ग भी हैं और डाली-डाली कूद रहे छोकरे भी। क्या आपको लगता है कि आशीर्वाद-मुद्रा में टहल रहे इन महामनाओं के रहते राहुल कांग्रेस को आज के गड्ढे से बाहर ला पाएंगे?

2. खोखले हमजोली: छल-प्रपंच रच कर कांग्रेस की भावी अगुआई का वसीयतनामा अपने नाम लिखवा कर दूसरी कतार में जम कर बैठ गए इंतजामअलियों में से तीन चौथाई पूरी तरह खोखले हैं। वे अपने-अपने निजी और पारिवारिक मंसूबे पूरे करने की ख़्वाहिश लिए कांग्रेसी नेतृत्व के इर्द-गिर्द जमा हैं। उन्हें इससे कोई मतलब है ही नहीं कि कांग्रेस का क्या होता है। वे तो कांग्रेसी हाड़-मांस-रक्त से ले कर उसके हर अंग के व्यापार की महारत हासिल कर चुके हैं। शिखर-नेतृत्व की अधिकतर संकल्पनाएं, योजनाएं और निर्देश इसी निष्ठाविहीन गुसलखाने की नाली में बह जाते हैं। क्या आपको लगता है कि इन कारोबारियों के रहते राहुल कांग्रेस को आज की सुरंग से बाहर ला पाएंगे?

3. वैचारिक दिग्भ्रम: कांग्रेस जिस वैचारिक प्रक्रिया, सामाजिक-राजनीतिक दर्शन और सांस्कृतिक मूल्यों की प्रतिनिधि मानी जाती है, उनमें जरा-सा भी भटकाव भारतीय-मानस का मन खट्टा कर देता है। ह्यसर्वत्र संबंध पालनह्ण की विद्या से अलंकृत चेहरों ने खुद को कांग्रेस के भीतर उन आलों में स्थापित कर लिया, जहां से वे नीतियों के क्षीरसागर में अपने मतलब का पानी मिलाते रह सकें। इससे कई मौकों पर कांग्रेसी-विमर्श की धार कुंद हो जाती है। अंतर्विरोध की वजह से नीतिगत सघनता में आई कमियों से जन-मानस में कांग्रेस के प्रति विश्वास दिग्भ्रमित होता है। क्या आपको लगता है कि इन स्वयंभू विचारकों के रहते राहुल कांग्रेस को वानप्रस्थी होने से बचा पाएंगे?

4. जागीरदारी प्रथा: गुलामी, जमींदारी, जागीरदारी और सामंतशाही से लडने वाली कांग्रेस अपनी सांगठनिक व्यवस्था को इन कुरीतियों से बचा कर नहीं रख पाई। नेहरू-गांधी परिवार के त्याग और योगदान को बड़ी चालाकी से वंशवादी करार दे कर देश भर में निहित-स्वार्थों ने कांग्रेस के भीतर-ही-भीतर अपने हित-साधन का एक संघीय ताना-बाना गढ़ा और अपने-अपने सत्ता-द्वीप बना कर बैठ गए। उन्होंने कांग्रेस की पूरी सियासत कभी अपने कुनबों की मुट्ठी से बाहर नहीं जाने दी। बाकी सबका काम महज जाजम बिछाने भर का रह गया। आज देश के हर राज्य में यह जागीरदारी अपने चरम पर है और कांग्रेस की पैदल-सेना हाशिए पर गुलामों की तरह बेबस खड़ी है। क्या आपको लगता है कि इस चंगेजी-व्यवस्था के रहते राहुल कांग्रेस को राजनीति के नंदन-वन की सैर करा पाएंगे?

5. पिलपिले अग्रिम-संगठन: अब से कोई पंद्रह-सोलह साल पहले मैं ने कांग्रेस सेवादल का इतिहास लिखा था, इसलिए मैं कह सकता हूं कि नारायण सुब्बाराव हार्डीकर ने 96 साल पहले, 1923 में, जब सेवादल बनाया था तो कभी यह नहीं सोचा होगा कि आगे चल कर उसका स्वरूप ह्यचाकर-सेवाह्ण का हो जाएगा। हार्डीकर के सेवादल ने तो अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा दी थी। झंडा सत्याग्रह और असहयोग आंदोलन में सेवादल की भूमिका के बारे में जिन्हें मालूम है, वे यह देख कर माथा पीटते हैं कि आज का सेवादल तो संघ-कुनबे की फूंक तक का सामना करने की हालत में नहीं है। जबकि जिन केशव बलिराम हेडगेवार ने सेवादल की स्थापना के दो साल बाद उसकी नकल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनाया था, वे और हार्डीकर स्कूल में साथ-साथ पढ़े थे।

संघ का आज भारत पर कब्जा है और विदेशों में भी वह धमक जमा रहा है। सेवादल पिछले दस साल से अंतिम हिचकियां ले रहा है। कमोबेश यही हालत युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस और छात्र संगठन की है। देश और प्रदेशों की राजधानियों के दफ़्तरों में तो उनके कमरे गुलजार हैं, सभागारों में अग्रिम संगठनों के कर्ताधतार्ओं की व्यक्तिगत उपस्थिति की तस्वीरों से सोशल-मीडिया खदकता रहता है, मगर मैदानों में तो सूनेपन की ही सांय-सांय सुनाई देती है। इंटक जैसे मजदूर संगठन पर भी ऐसे मतलबपरस्त काबिज हो गए हैं, जिनकी दिलचस्पी श्रमिक-कर्मचारी इकाइयों को सक्रिय करने के बजाय परदेस-गमन की जुगाड़ में ज्यादा रहती है। क्या आपको लगता है कि  नियुक्ति-पत्र व्यवसाय की चपेट में आ गए ऐसे अग्रिम-संगठनों के बूते राहुल कांग्रेस को आज के दुर्दिनों से बाहर ला पाएंगे?

केंद्र से लेकर जिलों तक हर शाख पर मौजूद इस रेवड़ के बावजूद नरेंद्र भाई मोदी के खांडव-वन से सोनिया-राहुल कांग्रेस को भस्म होने से थोड़ा बचा कर यहां तक ले आए, यही क्या कम है? लेकिन यहां से आगे की नैया ऐसे नाविकों के भरोसे अब पार होने से रही! कांग्रेस की आस्तीन में आराम फरमा रही अमरबेल-प्रवृत्ति को झटकने में राहुल-सोनिया-प्रियंका ने अगर जरा भी मुरव्वत की तो यह आभासी-आवरण ऐसा चटकेगा कि फिर कोई फलसफा काम नहीं आएगा।

(लेखक न्यूज-व्यूज इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

Author/Journalist owns and is responsible for views/news published and the publisher/printer is in no way liable for such content.