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पवार चाचा-भतीजे के बीच मनमुटाव की ये है बड़ी वजह, पढ़े पूरी खबर

ग्लिब्स टीम  | 24 Nov , 2019 01:41 PM
पवार चाचा-भतीजे के बीच मनमुटाव की ये है बड़ी वजह, पढ़े पूरी खबर

नई दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार को आए 'भूचाल' के बाद मुंबई से लेकर दिल्ली तक की राजनीति गर्म है। शिवसेना जहां कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने का ख्वाब देख रही थी वहीं भाजपा ने बाजी मारते हुए एनसीपी के अजित पवार के साथ मिलकर सरकार बना ली। आखिर शरद पवार और अजित पवार में विवाद क्यों है...? बता दें कि यह कहानी साल 2004 से शुरू हुई। 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में जब एनसीपी को 71 और कांग्रेस को 69 सीटें मिली थी। लेकिन, शरद पवार ने भतीजे अजित के लिए मुख्यमंत्री पद लेने के बजाए कांग्रेस को दे दिया। राज्य में दी गई इस कुर्बानी के बदले शरद पवार को केंद्र में दो कैबिनेट और एक राज्यमंत्री का पद मिला। अजित पवार अपने चाचा के इस कदम से खुश नहीं थे। साल 2009 में विधानसभा चुनाव के दौरान अजित पवार अपने करीबियों को टिकट दिलाना चाहते थे लेकिन शरद पवार ने उनकी एक न सुनी।

2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान अजित अपने बेटे पार्थ को चुनाव लड़ाना चाहते थे लेकिन शरद पवार ने यह मांग पहले ठुकरा दी। बाद में जब अजित पवार ने जिद की तो शरद पवार ने टिकट को दे दिया लेकिन प्रचार से दूर रहे। नतीजन पार्थ चुनाव हार गए। वहीं शरद पवार अपनी बेटी सुप्रिया को चुनाव जिताने के लिए जी-जान से लगे रहे। अजित पवार को यह बात भी खूब खटकी, लेकिन उन्होंने शरद पवार के सामने इसका इजहार नहीं किया। 2019 के विधानसभा चुनाव में भी अजित पवार अपने खेमे के कुछ लोगों को टिकट दिलाना चाहते थे लेकिन शरद पवार ने फिर से उनकी मांगों को अनसुना कर दिया।

शरद पवार ने पोते को दिया टिकट, नहीं सुनी अजित की बात

इसके अलावा विधानसभा चुनाव के दौरान एक बात जो अजित पवार को और बुरी लगी वह अपने पोते रोहित पवार को चुनाव का टिकट देना था। शरद पवार ने अपने पोते रोहित को न केवल विधानसभा का टिकट दिया बल्कि उसे जिताने के लिए खूब प्रचार भी किया। विधानसभा चुनाव से पहले शरद पवार के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने एफआईआर दर्ज कर ली। तब उन्होंने ईडी ऑफिस जाने का फैसला किया लेकिन राज्य में चुनाव पूर्व गहमागहमी के माहौल को शांत करने के लिए अजित ने खुद कुर्बानी देने की पेशकश की। अजित ने शरद पवार से फोकस हटाने के लिए विधायक पद से इस्तीफा दे दिया जिससे चर्चा के केंद्र से शरद बाहर निकल गए। लेकिन, जब अजित पवार को ईडी का नोटिस आया तब उनके पक्ष में न तो शरद पवार न ही एनसीपी का कोई नेता सामने आया। बताया जाता है कि राज्य में सरकार गठन की बैठकों के दौर के बीच अजित ने हमेशा उद्धव के मुख्यमंत्री बनने का विरोध किया। लेकिन, शरद पवार ने उनका साथ नहीं दिया। यहां तक की ईवीएम को लेकर आरोप-प्रत्यारोप के बीच जब अजित पवार ने जमीनी स्तर पर काम करने की वकालत की तब भी शरद पवार ईवीएम में गड़बड़ी पर ही अटकें रहे।

 

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