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क्या पब्लिसिटी/मार्केटिंग राजनीति से ज्यादा महत्वपूर्ण है? क्या फ़िल्म की कमाई देश के नुकसान से ज्यादा सुकुन देगी?

अनिल पुसदकर  | 07 Jan , 2020 10:49 PM
क्या पब्लिसिटी/मार्केटिंग राजनीति से ज्यादा महत्वपूर्ण है? क्या फ़िल्म की कमाई देश के नुकसान से ज्यादा सुकुन देगी?

रायपुर। बॉलीवुड की सुपरस्टार दीपिका पादुकोण का अचानक जेएनयू पहुंच जाना सुर्खियों में बना हुआ है। दीपिका पादुकोण 10 मिनट वहां रुकी मगर ना उन्होंने कुछ कहा और ना ही उस आंदोलन के बारे में अपनी राय जाहिर की। बस खामोश रही। अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और चली गई। कारण क्या था? यह वही जाने। लेकिन उनके वहां अचानक पहुंच जाने से बहुत से सवाल सामने आते हैं? क्या बॉलीवुड की मशहूर हस्तियों को इस तरह जाने अनजाने किसी आंदोलन को हवा देने के लिए पहुंच जाना? और बिना समर्थन दिए वहां से निकाल जाना जायज है? क्या अचानक किसी आंदोलन स्थल पर पहुंचना और उस आंदोलन के समर्थन पर कुछ न कहना? और वहां से निकालना? आपकी ईमानदारी पर सवाल नहीं खड़े करते? क्या शोमैनशिप के बिजनेस से जुड़े लोगों का इस तरह अचानक किसी भीड़ को अपने बिजनेस के लिए इस्तेमाल करना जायज है? क्या फिल्म स्टारों को इस तरह राजनीति का अपने फिल्म के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल करना जायज है? क्या आप किसी विचारधारा के समर्थक हैं? क्या आपने कभी इससे पहले इस विषय पर बात की है? या फिर आप राजनीतिक विचारधारा से जुड़ी हुई है? अगर आपके जवाब हां है तो आपको स्पष्ट करना पड़ेगा कि आप किस और खड़े हैं? आपको तय करना पड़ेगा कि आप किस और खड़े है? अगर आप यह नहीं तय कर पाते तो आपको अपनी फिल्म की पब्लिसिटी के लिए अपनी फिल्म की कमाई के लिए अपने फिल्म को हिट करने के लिए इस तरह एक बड़े महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दे को इस्तेमाल करना कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। शर्मनाक ही कहा जा सकता है इस तरह एक फिल्म को पॉपुलर बनाने के लिए एक फिल्म को हिट बनाने के लिए एक फिल्म से जमकर कमाई करने के लिए किसी ज्वलनशील मुद्दे में अपनी उपस्थिति से घी डालना। 

 

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