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Poverty : यहां घर में दफनाएं जाते हैं शव... पढ़े पूरी खबर 

राजू यदु  | 14 Sep , 2018
Poverty : यहां घर में दफनाएं जाते हैं शव... पढ़े पूरी खबर 

पटना। इतनी गरीबी, ऐसी बेबसी कि जीते जी तो सम्मान नहीं मिला, मरने के बाद भी दो गज जमीन नसीब नहीं हो रहा है। देश में एक गांव ऐसा भी है जहां इंसान की मौत होने पर परिजनों के पास शव को जलाने के लिए पैसे नहीं होते। यहीं नहीं इस गांव में जब अपनों की मौत होती है तो उसे दफनाने के लिए शमशान घाट तक नहीं है। लिहाजा शव को अपने ही घर पर दफना देते हैं। आजाद भारत का यह कुरुप चेहरा मानवीय संवेदना तार-तार हो जाती है। इंसानों की रुह कांप जाती है। हम बात कर रहे हैं बिहार मधेपुरा जिले के  केवटगामा गांव की, जहां गरीबी की विभिषिका झेल रह लोग जानवरों से भी बदतर जिंदगी जी रहे हैं। 

गांव के लोगों के मुताबिक काफी समय से यहां के लोग अपने परिजनों के शवों को घर में ही दफनाते आ रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यहां पर फैली गरीबी है। इन लोगों की माली हालत ऐसी है कि चाहकर भी यह दाह संस्कार में खर्च होने वाली पूंजी को नहीं जुटा पाते हैं। शुरूआत में इसी खर्च से बचने के लिए लोगों ने पहले अपने परिजनों के शवों को नदी में फेंकना प्रारंभ किया था।

बाद में इस पर रोक लगा देने के चलते यह लोग शवों को नदी किनारे ही दफनाने लगे। नदी किनारे भी शव को दफनाने से रोक लगा दी। इसके बाद गांववालों के पास शव के अंतिम संस्कार का कोई और जरिया नहीं बचा और मजबूरीवश इन लोगों ने घर में या आंगन में ही शवों को दफनाया शुरू कर दिया।

स्थानीय लोग बताते हैं यहां गरीबी का आलम कुछ ऐसा है कि लोगों के पास शव को हिंदू रिति-रिवाज के तरीके से अंतिम संस्कार करने के लिए पैसे नहीं हैं। ऐसे में किसी की मौत इनके लिए परेशानी का सबब बन जाती है। शव जलाने के लिए लकड़ी खरीदने तक के पैसे का इंतजाम ये लोग नहीं कर पाते हैं। बताते चले कि केवटगामा टोला में 265 परिवारों में से 230 परिवार हैं। इन परिवारों को रहने के लिए तीन डेसिमिल जमीन के अलावा कुछ भी उपलब्ध नहीं है। इसी तीन डेसिमिल जमीन में ही इनमें अपना सारा कार्य करना पड़ता है।

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