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अमेजॉन की आग, कुदरत का कहर है, आखिरी चेतावनी है

सोनम शर्मा  | 23 Aug , 2019 03:56 PM
अमेजॉन की आग, कुदरत का कहर है, आखिरी चेतावनी है

रायपुर। अमेजॉन के वर्षावनों में लगी आग वैश्विक स्तर पर चिंता का सबब है। उन वर्षावनों का नष्ट होना हमारे फेफड़े खराब होने जैसा है। ये कुदरत की आखिरी चेतावनी है इंसानों को, कहीं उसे पानी और हवा/ऑक्सीजन का अभाव विलुप्त न कर दे। बदलते ऋतुचक्र की परवाह न करने वाले इंसान को कुदरत कहीं आग तो कहीं बाढ़ के रूप में रौद्र दिखा रही है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ऋतुचक्र में परिवर्तन हो रहा है। ग्लोबल वार्मिंग, ग्लोबल वार्मिंग चीखते-चीखते हम वर्षावनों में लगी आग से झुलसने लगे है। धरती को 20 प्रतिशत ऑक्सीजन देने वाले दुनिया के सबसे बड़े अमेजॉन वर्षावनों में अब तक की सबसे बड़ी आग लगी है। 74 हजार स्थान पर आग लग चुकी है। हजारों वर्ग किमी आग की जद में है और ये चिंता का विषय है। आये दिन  जंगलों में विनाशकारी आग की खबर अब आम होती जा रही है। जंगल का एक हिस्सा पहले ही इंसान का शिकार हो चुका है और अब कुदरत भी उस पर कहर ढा रही है। अगर आग की बात को छोड़ दें तो भी कुदरत की नाराजगी कम नहीं नजर आती। जगह-जगह विनाशकारी बाढ़, आंधी-तूफान, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि, ये सब खतरे की घण्टी है जिसे इंसान अरसे से अनसुना करता आ रहा है, जो धीमे-धीमे उसके अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है। अपने देश पर ही नजर डालें तो ब्रह्मपुत्र से ज्यादा अब दूसरी छोटी नदियां कहर बरपाती दिख रही है। राजस्थान जैसा सूखा प्रदेश अब बाढ़ की मार झेलता है। केरल का तो बहुत बुरा हाल है। महाराष्ट्र का विदर्भ और उससे लगा लातूर तक का इलाका सूखे से त्रस्त रहता था, वहां से भी बाढ़ की खबर आ जाती है। नए-नए इलाकों को बाढ़ अपना शिकार बना रही है।  समुद्र के किनारे बसे चेन्नई शहर के लोग पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं वहां राहत के लिए रेल से पानी पहुंचाया जा रहा है। कमोबेश ऐसी ही स्थिति बहुत से शहरों में बनती दिख रही है। छत्तीसगढ़ में भी बरसात का मौसम आगे खिसकता दिख रहा है। सावन की झड़ी का अता-पता नहीं रहता। इस साल तो जून की जगह जुलाई से बरसात शुरू हुई है। जुलाई शुरू होते-होते लबालब हो जाने वाले बांध अगस्त शुरू होने तक खाली ही रहे हैं। कहीं बरसात तो कहीं सूखा, कहीं आग तो कहीं भूस्खलन, भूकम्प,  बहुत से ज्वालामुखियों के सीने में दबी आग भी अब धधकने लगी है। ये सब संकेत है कुदरत के नाराज होने का, समय रहते पर्यावरण से छेड़छाड़ पर रोक लगनी चाहिए, उसका संरक्षण होना चाहिए। कुदरत ने जो कुछ दिया है, उसे संभालकर रखना जरूरी है, नहीं तो हवा-पानी के लिए भी तरसना पड़ जाएगा।

 

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