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एम्स खुद बीमार और डीकेएस का भी बुरा हाल, मरीज रामभरोसे

सोनम शर्मा  | 25 Aug , 2019 01:22 PM
एम्स खुद बीमार और डीकेएस का भी बुरा हाल, मरीज रामभरोसे

रायपुर। राजधानी के एक नहीं दो दो सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल का बुरा हाल है। एम्स में 183 डॉक्टरों के पद खाली होना उस अस्पताल की कमज़ोरी और दयनीय हालत का सबूत है और छापों व जांच के कैंसर से जूझ रहे डीकेएस में भी 15 पद ख़ाली पड़े है। जो अस्पताल खुद कमी से जूझ रहे हो वो किसी को राहत या इलाज क्या दे पाएंगे? यानी मरीज़, डाक्टर नहीं होने पर रामभरोसे है। करोड़ों रूपए की मशीनों का न्यूनतम उपयोग ही हो पा रहा है, जो सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग ही माना जा सकता है। न्यूरो व कैंसर के विशेषज्ञ तो बहुत दूर की बात है, उदर यानी पेट की बीमारियों के विशेषज्ञ डाक्टरों का टोटा है सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल एम्स और डीकेएस में, ऐसे में उन्हें सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल कहा जाना चाहिए या नहीं, ये भी अब बड़ा सवाल है।

कैंसर के मरीजों का आंको सर्जन की बजाय जनरल सर्जन का ऑपरेशन करना, मरीजों की जान से खिलवाड़ करने के सिवाय कुछ नही है। उस पर ये दलील की आपरेशन रुक नहीं रहे हैं हो रहे है, समझ से परे है। ऐसी सोच रखने वालों को नए तरह के विश्व रिकार्ड के लिए दावा ठोंक देना चाहिए। ये हाल है राजधानी की सरकारी चिकित्सा व्यवस्था का जिसकी कब्र पर निजी फाइवस्टार कसाईखाने कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं। पता नहीं पिछली सरकार में राज्य की चिकित्सा व्यवस्था को राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार कैसे मिलते रहे है। अब सत्ता परिवर्तन के साथ आम आदमी की उम्मीदें भी जरूरत से ज्यादा बढ़ गई है, ऐसे में अस्पतालों की स्थिति में सुधार जरूरी है वरना डॉक्टरों के अभाव में बीमार अस्पतालो से बचकर आम मरीज़ फाइवस्टार कसाईखाने में कटने को मज़बूर होता रहेगा। 

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