GLIBS

जिन हाथों से पहले होती थी कचरे की बिनाई, अब उसी से होने लगी है कपड़ों की सिलाई

ग्लिब्स टीम  | 22 Nov , 2020 09:09 PM
जिन हाथों से पहले होती थी कचरे की बिनाई, अब उसी से होने लगी है कपड़ों की सिलाई

रायपुर। एक बच्चे की माँ गौरी सोनी की सुबह हमेशा कूड़े-कचरे के बीच होती थी। जब शाम का सूरज ढलने लगता था, तब वह कूड़े-कचरे की ढेर से निकलकर घर को लौटती थी। कमोवेश सुजाता साहू की जिंदगी भी गौरी जैसी ही थी। सूरज निकलने से पहले और अस्त होने के पहले पूरा दिन कचरों के ढेर में ही गुजर जाता था। एक ओर जहा सभी ओर दिन के उजाले होते थे लेकिन इनकी जिंदगी उजालों के बीच भी अंधेरों में रहने के समान थी। कचरों के ढेर में कुछ-कुछ सामान तलाशते-तलाशते अपनी दो जून की रोटी का जुगाड़ करना इनकी नियति बन गई थी। एक दिन प्रदेश के मुख्य सचिव आरपी मण्डल जब राजधानी के व्हीआईपी चौक से गुजर रहे थे, तब उनकी नजर कचरे के ढ़ेर में सामान तलाशते हुए महिलाओं पर पड़ी। कुछ महिलाएं अपने साथ बच्चे भी ली हुई थीं। उन्होंने अपनी कार रोकी और मैले कपड़े पहनी हुई कचरा बीनने वाली महिलाओं को अपने पास बुलाया। वे स्वयं भी कार से उतर गए और कचरा बीनने वालियों से उनके बारे में पूछने लगे। तब मुख्य सचिव ने उन्हें बताया कि राज्य शासन द्वारा आपके कल्याण के लिए योजना चलाई जा रही है।

आप कब तक ऐसे ही कचरों में अपनी जिंदगी गुजारती रहोगी ? काम सीखों और आत्म सम्मान के साथ जीना सीखों। कचरा बीनने वालों पर मुख्य सचिव की नजर, इनकी जिंदगी के लिए मानों एक नई उम्मीद की किरण और एक नया सबेरा लेकर आई। कुछ दिन बाद ही नगरीय प्रशासन विकास और श्रम मंत्री डॉ शिवकुमार डहरिया ने कचरा बीनने वाली महिलाओं से उनकी ही बस्ती के पास मुलाकात की। उन्होंने श्रम विभाग की योजना से जोड़ते हुए कचरा उठाने वाली गौरी यादव, सुजाता साहू सहित कई महिलाओं को सिलाई मशीन सहित अन्य जरूरत के सामान दिए। इनकी जिंदगी की नई सुबह की शुरुआत के बाद श्रम मंत्री डॉ. डहरिया की पहल इनकी अंधकारमय जिंदगी को नई रोशनी देने के साथ एक नई दिशा की ओर ले गई। उन्होंने इन कचरा बीनने वाली महिलाओं को श्रम विभाग की योजना से जोड़ते हुए इन्हें नुकसान से बचाने अपने ही हाथों से सभी को घर खर्च के लिए चेक भी दिए और सभी को सिलाई-कढ़ाई का अच्छे से प्रशिक्षण प्राप्त कर स्वरोजगार अपनाते हुए आत्मनिर्भर बनने और आत्मसम्मान के साथ जीने की सीख दी। आज लगभग दो महीने बाद गौरी, सुजाता सहित अन्य कई महिलाओं की परिस्थितियां बहुत बदल गई है। इनके हाथों में किसी के फेंके हुए कचरों के ढेर में समाई गंदगी नहीं बल्कि स्वच्छता और बीमारी से बचने का संदेश देने वाले हाथों से बनाएं मास्क, महिलाओं को सम्मान से जोड़ने वाला सलवार शूट, ब्लाऊज के परिधान के रुप में एक ऐसा हुनर भी है जो साफ-सुथरी भी है और धारण करने के योग्य है। 

 

Author/Journalist owns and is responsible for views/news published and the publisher/printer is in no way liable for such content.