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जुझारू जीवट जोशीले जबर्दस्त जनहितैषी जननायक जोगी नहीं रहे,अफसरशाह से नेता बने जोगी का सफर समाप्त

अनिल पुसदकर  | 29 May , 2020 04:31 PM
जुझारू जीवट जोशीले जबर्दस्त जनहितैषी जननायक जोगी नहीं रहे,अफसरशाह से नेता बने जोगी का सफर समाप्त

रायपुर। संघर्ष की प्रतिमूर्ति छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री आखिर अपनी अंतिम लड़ाई जीत नहीं  पाए। मौत से आखिर वे हार ही गए। 9 मई से लगातार मौत से जूझ रहे थे अजीत जोगी और उनका यह संघर्ष आज पूरा हो गया। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री थे अजीत जोगी और उन्होंने छत्तीसगढ़ के विकास की आधारशिला रखी। एक दूरदर्शी नेता थे अजीत जोगी और छत्तीसगढ़ को भविष्य में किस दिशा में ले जाना है यह उन्होंने ही तय किया था। ढाई साल के कार्यकाल के बाद जब वे सत्ता से अलग हुए तो भी सत्ता में आने वाली भाजपा चाह कर उनके द्वारा चुने गए नए रायपुर को पूरी तरह बदल नहीं पाई। मामूली हेरफेर के बाद नई राजधानी वही बनी जहां जोगी चाहते थे। जोगी के कार्यकाल में आम आदमी की तूती बोलती थी। अफसरशाही पूरी तरह नियंत्रित थी और अफसरशाही की नकेल उनके हाथ में थी। बिगड़ैल से बिगड़ैल खिलाड़ियों को भी उन्होंने साध रखा था और उनकी प्रशासनिक क्षमता का लोहा ना केवल प्रदेश बल्कि सारे देश ने माना था। वे अजीत जोगी ही थे,जिन्होंने सबसे पहले अपनी गाड़ियों से लाल बत्ती उतारी थी और सायरन बजाना बंद करवा दिया था। उनके दौर में सड़क पर चलने वाले हर वाहन बराबर ही नजर आते थे। वीवीआईपी कल्चर को उन्होंने ठिकाने लगा दिया था। बाद में इस मामले में कोर्ट का फैसला जरूर आया लेकिन कोर्ट के फैसले के आने से बहुत पहले जोगी जी ने जनता की मंशा के अनुरूप वो फैसला ले लिया था। जोगी जनता की नब्ज़ पहचानते थे। वे रायपुर के कलेक्टर भी रहे और मुख्यमंत्री भी। दोनों ही कार्यकाल भुलाते नहीं भूलने वाले हैं। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता उनके कार्यकाल में चरम पर थी और बड़े-बड़े दिग्गज शुक्ल बंधुओं के साथ-साथ दिग्विजय सिंह की पूरी लॉबी के अलावा बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा एडं कंपनी को भी उन्होंने कड़ी टक्कर दी। एक समय ऐसा आया कि संगठन से लेकर सत्ता में सिर्फ और सिर्फ अजीत जोगी की ही तूती बोलने लगी। विद्याचरण शुक्ल को तो कांग्रेस छोड़ना पड़ गया था और बाकी विरोधी भी लगभग शांत हो गए। दुर्भाग्य से जोगी छत्तीसगढ़ के पहले आम चुनाव में कांग्रेस को विजय नहीं दिला पाए और कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई। सत्ता से बाहर होने का खामियाजा बाद में जोगी को भुगतना पड़ा। उनके राजनीतिक विरोधी धीरे धीरे संगठित हुए और एक समय ताकतवर होकर उन्हें कांग्रेस छोड़ने पर मजबूर करने में भी सफल रहे। उसके बाद भी जोगी ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी पार्टी बनाई। जोगी ने संघर्ष नहीं छोड़ा। वे जनता जनार्दन को सर्वोपरि रखते थे। वे कुशल वक्ता थे और हर विषय पर उनका ज्ञान विलक्षण था। अब जोगी नहीं हैं। छत्तीसगढ़ कि राजनीति में उनका स्थान हमेशा खाली रहेगा। उनका स्थान भरने लायक कोई जननायक फिलहाल नजर नहीं आता है।

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