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टी. बी. के कारण हॉर्ट हो गया था चुने की झिल्ली में बंद

ग्लिब्स टीम  | 22 Jan , 2020 05:53 PM
टी. बी. के कारण हॉर्ट हो गया था चुने की झिल्ली में बंद

रायपुर। अम्बेडकर अस्पताल के एडवांस्ड कार्डियक इंस्टीट्यूट में इलाज के लिये पहुंची मरीज के दिल को सुरक्षित रखने वाली झिल्ली पेरीकॉर्डियम (Pericardium) में चुना (कैल्शियम) जमने लगा था जिससे मरीज का दिल धीरे-धीरे कठोर होकर ठीक से धड़क नहीं पा रहा था। चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू एवं उनकी टीम ने 14 वर्षीय मरीज की इस जटिल बीमारी को समय रहते पहचान कर नई जिंदगी दी। दस दिन पहले इस मरीज का सफलतापूर्वक ऑपरेशन हुआ एवं मरीज सामान्य स्थिति में डिस्चार्ज होकर घर जाने को तैयार है।

ऐसे थे बीमारी के लक्षणमरीज को दो साल से सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। पहले दोनों पैरों में सूजन हुआ उसके बाद पेट में पानी भरने लगा। धीरे-धीरे बीमारी बढ़ने लगी एवं दो कदम चलना भी दूभर हो गया था। उसको टी. बी. की शिकायत थी जिसके लिए उसका टी. बी. का इलाज किया जा चुका था। छाती के एक्स-रे में भी फेफड़ा सामान्य दिख रहा था। फिर भी उसकी सांस फूल रही थी एवं खाना-पीना कम हो गया था फिर लोकल डॉक्टर ने गनियारी स्वास्थ्य केन्द्र भेजा जहां पर एम्स (AIIMS) दिल्ली के डॉक्टर निः शुल्क इलाज करते हैं। वहां पर इकोकॉर्डियोग्राफी करवाया उससे पता चला कि मरीज के हृदय के चारों ओर पायी जाने वाली झिल्ली पेरीकार्डियम में कैल्सियम (चुना) जमा हो गया है जिसके कारण वह हार्ट को चारों तरफ से दबा रहा है जिससे हार्ट ठीक से रक्त को पम्प नहीं कर पा रहा है। फिर मरीज को एम्स दिल्ली में रिफर किया गया ऑपरेशन के लिए परंतु मरीज वहां से जाने के लिए तैयार नहीं हुआ। फिर उन्होंने रायपुर के प्राइवेट अस्पताल भेजा जहां पर ऑपरेशन के लिए मना कर दिया गया फिर मरीज स्वतः ही एसीआई के हार्ट सर्जरी विभाग में डॉ. कृष्णकांत साहू के पास आकर जांच करवायी जिससे पता चला कि टी. बी. के कारण उसके हृदय के चारों ओर पायी जाने वाली पेरीकार्डियम झिल्ली जिसका काम हृदय को सुरक्षा देना होता है, के चारों ओर चुना जम गया है एवं हृदय में इस तरह चिपक गया था कि हृदय ठीक से पम्प (धडक) नहीं कर पा रहा था। इसके कारण उसके पैरों में सूजन एवं पेट में पानी भर रहा था व लिवर का आकार बहुत बड़ा हो गया था। इस बीमारी को “कैल्सिफाइड क्रॉनिक कंसट्रिक्टिव पेरीकॉरडाइटिस ( Calcified Chronic Constrictive Pericarditis)” कहा जाता है।

बीमारी नहीं आ रही थी पकड़ में
कैल्सिफाइड क्रॉनिक कंसट्रिक्टिव पेरीकाडारइटिस बीमारी में टी. बी. फेफड़ों को संक्रमित न करके हृदय की झिल्ली पेरीकार्डियम को संक्रमित करता है। चूंकि फेफड़ा सामान्य दिखता है इसलिए यह आसानी से एक्स-रे एवं सीटी स्कैन से पता नहीं चलता। इसके लिए हार्ट की इकोकॉर्डियोग्राफी की जाती है। मरीज को तीन महीने पहले गनियारी स्वास्थ्य केन्द्र से डॉ. कृष्णकांत साहू के पास भेजा गया। डॉ. साहू ने इस बीमारी को कन्फर्म करने के लिए हृदय एवं छाती का सी.टी. स्कैन करवाया जिससे यह देखा गया कि बीमारी कितनी फैल चुकी है एवं ऑपरेशन के लायक है कि नहीं। हृदय के सी. टी. स्कैन से पता चला कि इसके पेरीकार्डियम में ऑपरेशन यानी चुना जम गया है जो हृदय की मांसपेशियों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। बीमारी बहुत बढ़ गयी थी एवं ऑपरेशन करना बहुत ही हाई रिस्क था क्योंकि ऐसे मरीज का ऑपरेशन ”हॉर्ट लंग मशीन“ का उपयोग करके किया जाता है। चूंकि उस समय ए. सी. आई. में हार्ट लंग मशीन नहीं थी इसलिए मरीज को अन्य हॉस्पिटल में जाने की सलाह दी गई परंतु मरीज की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण कहीं नहीं जा पा रहे थे इसलिए कुछ दिन तक दवाईयों से काम चलाया फिर कुछ समय बाद ए. सी. आई. में हॉर्ट लंग मशीन आ गई एवं उसकी सहायता से हृदय का ऑपरेशन किया गया।

टीम वर्क से सफल हुआ ऑपरेशन
इस ऑपरेशन में हार्ट लंग मशीन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यदि यह मशीन नहीं होती तो यह ऑपरेशन असंभव था। कुछ ही दिन पहले यह मशीन ए.सी. आई. में आई है। परंतु केवल मशीन होने से ही ऑपरेशन नहीं होता उसके लिये दस परफ्यूजनिस्ट एवं अन्य सहायक उपकरण की आवश्यकता होती है। इस मरीज की सर्जरी अत्यंत आवश्यक थी अतः स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एक निजी अस्पताल में कार्यरत परफ्युजनिस्ट की मदद ली गई जो इस हॉर्ट लंग मशीन को चला सके। साथ ही साथ अन्य उपकरणों जैसे- ऑक्सीजनरेटर, कैनुला, ट्युबिंग की भी व्यवस्था की गई।यह बहुत ही हाई रिस्क सर्जरी थी इसलिए डी. ओ. टी (Death on Table Consent) कंसेट लिया गया क्योंकि ऑपरेशन करते समय कई बार हॉर्ट के फट जाने का खतरा होता है। छाती को बीचों-बीच आरी (Saw ) से काटकर खोला गया। हॉर्ट लंग मशीन का उपयोग करते हुए बहुत ही सावधानीपूर्वक हार्ट के चारों ओर चिपके हुए झिल्ली एवं चुने ( कैल्शियम ) को हृदय से अलग किया गया। इस ऑपरेशन को रेडिकल पेरीकार्डियेक्टामी (Radical Pericardiectomy) कहा जाता है। यह ऑपरेशन 3 घंटे चला एवं 2 यूनिट ब्लड की आवश्यकता हुई। इस ऑपरेशन के बाद मरीज को 4 दिनों तक आईसीयू यानी इंटेसिव केयर यूनिट में रखा गया। यदि इस बीमारी का सही समय में इलाज या ऑपरेशन नहीं होता तो मरीज का बचना मुश्किल हो जाता।ए. सी. आई. में शासन द्वारा संचालित डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना के अंतर्गत हार्ट के सभी बीमारियों में निः शुल्क उपचार की सुविधा उपलब्ध है। भविष्य में अन्य उपकरण एवं मानव संसाधन आने पर ओपन हार्ट, बाइपास सर्जरी, वॉल्व प्रत्यारोपण एवं बच्चों के हृदय रोग के ऑपरेशन भी प्रारंभ किये जा सकेंगे।


ऑपरेशन में शामिल टीम
कॉर्डियोथोरेसिक वैस्कुलर सर्जन एवं विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू के साथ डॉ. निशांत चंदेल, एनेस्थेटिस्ट व आईसीयू इंटेसिविस्ट डॉ. ओ. पी. सुंदरानी, एनेस्थेसियाटेक्नीशियन भूपेन्द्र, परफ्युजनिस्ट संदीप एवं डिगेश्वर के साथ सहयोगी नर्सिंग स्टॉफ राजेन्द्र व नरेन्द्र।

 

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