GLIBS

यूएपीए कानून में संसोधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

ग्लिब्स टीम  | 06 Sep , 2019 01:37 PM
यूएपीए कानून में संसोधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने अवैध गतिविधियां (रोकथाम) कानून (यूएपीए) में किए गए संशोधनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र से शुक्रवार को जवाब मांगा। याचिकाओं में अवैध गतिविधियां (रोकथाम) कानून में किये गये संशोधनों को कई आधार पर चुनौती दी गई है। याचिकाओं में कहा गया है कि ये संशोधन नागरिकों के मौलिक आधिकारों का उल्लंघन करते हैं और एजेंसियों को लोगों को आतंकवादी घोषित करने की ताकत प्रदान करते हैं। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने सजल अवस्थी और गैर सरकारी संगठन असोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स की याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किए। संसद ने हाल ही में अवैध गतिविधियां (रोकथाम) कानून में संशोधनों को मंजूरी दी थी। इन संशोधनों के बाद सरकारी एजेंसियों को किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने का अधिकार मिल गया है।

अवैध गतिविधियां गतिविधि रोकथाम कानून में हाल ही में हुए संशोधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है। कानून में जो बदलाव किए गए हैं, उनके बदलावों को ही याचिका में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि यह कानून संविधान के अनुच्छे 14, 19 और 21 के खिलाफ है। बता दें कि संसद से पास किए गए इस कानून के अनुसार केन्द्र सरकार किसी भी व्यक्ति को आतंकवादी की श्रेणी में डाली सकती है। फिर वह चाहे किसी समूह के साथ जुड़ा हो या नहीं। अवैध गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए को साल 1967 में 'भारत की अखंडता तथा संप्रभुता की रक्षा' के उद्देश्य से पेश किया गया था और इसके तहत किसी शख्स पर 'आतंकवादी अथवा गैरकानूनी गतिविधियों' में लिप्तता का संदेह होने पर किसी वारंट के बिना भी तलाशी या गिरफ्तारी की जा सकती है। इन छापों के दौरान अधिकारी किसी भी सामग्री को ज़ब्त कर सकते हैं। आरोपी को ज़मानत की अर्ज़ी देने का अधिकार नहीं होता, और पुलिस को चार्जशीट दायर करने के लिए 90 के स्थान पर 180 दिन का समय दिया जाता है।

Author/Journalist owns and is responsible for views/news published and the publisher/printer is in no way liable for such content.