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पुलिस परिक्रमा:नक्सलियों के फरमान पर पुलिस वाले के परिवार को छोड़ना पड़ रहा है गांव? पुलिस का राज है या...

अनिल पुसदकर  | 17 Sep , 2020 09:52 PM
पुलिस परिक्रमा:नक्सलियों के फरमान पर पुलिस वाले के परिवार को छोड़ना पड़ रहा है गांव? पुलिस का राज है या...

रायपुर। छत्तीसगढ़ से नक्सलियों का सफाया करने की बात हर सरकार करती रही है। जो विपक्ष में रहता है वह कहता है कि इस सरकार के कार्यकाल में नक्सली वारदात बढ़ गई है और जो सरकार में रहता है वह छाती ठोंक कर कहता है कि हमने नक्सलियों पर अंकुश लगाने के लिए पूरी ताकत लगा दी है। अगर आरोप-प्रत्यारोप को छोड़ दें और जमीनी हकीकत की बात करें तो इससे बड़ी दुर्भाग्यजनक बात कोई हो ही नहीं सकती कि नक्सलियों के फरमान पर पुलिस वाले के परिवार को गांव छोड़ना पड़े। बीते सप्ताह पोलमपल्ली इलाके के पालामडू गांव के दो परिवार के 12 सदस्य,जिनमें 4 बच्चे भी शामिल हैं पोलमपल्ली गांव पहुंचे। उसके बाद हड़कंप मचा। दोनों परिवार में से एक परिवार पुलिस वाले का है और दूसरा नक्सलियों की नज़र में पुलिस के मुखबिर का। गांव छोड़ने की बात सामने आई तो बस्तर पुलिस अपनी आदत के अनुसार लीपापोती करने में लग गई। दोनों परिवारों को गांव छोड़ने का फरमान जग्गावरम इलाके में हुई नक्सली बैठक में जारी किया गया था। फरमान जारी होते ही दोनों परिवारों ने गांव छोड़ दिया। एक परिवार पुलिस वाले का है,जिस पर नक्सलियों का आरोप है कि वह ग्रामीणों को तंग करता था,दूसरा परिवार जो पलायन करने पर मजबूर हुआ उस पर नक्सलियों को पुलिस का मुखबिर होने का शक था। अब बताइए अगर कोई मुखबिर भी है तो क्या उसे गांव छोड़ना पड़ेगा? अगर कोई पुलिस में काम कर रहा है तो क्या उसके परिवार वालों को गांव छोड़ना पड़ेगा? तो पुलिस है किसकी? पुलिस है तो आखिर सरकार की? यानी सरकार की नौकरी करने पर आप उस सरकार के शासित राज्य में रह भी नहीं सकते तो फिर क्या माने? बस्तर के जंगलों में पुलिस का राज है या नक्सलियों का राज है? अगर नक्सलियों का राज है तो फिर पुलिस क्या कर रही है? और अगर पुलिस का राज है तो फिर पुलिस वाले के परिवार को गांव छोड़ने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ा? सवाल तो बहुत है और हर सवालों के जवाब शासन प्रशासन बिल्कुल रटे रटाये स्टाइल में देते आया हैं। ऐसा लगता है कि सन 2000 में जब छत्तीसगढ़ बना तब कुछ जवाब टाइप करके रख दिए गए थे। उसकी फोटोकॉपी होती है और वही सर्कुलेट कर दी जाती हैं। नया कुछ नहीं है। 2000 से 2020 तक की अवधि में सरकारे बदलती रही। अफसर बदलते रहे। अगर कुछ नहीं बदला है तो बस्तर में नक्सलियों का आतंक। यह कह सकते हैं कि बस्तर में अब भी अंदरूनी इलाकों में राज तो नक्सलियों का ही है? इसका खंडन करना बहुत आसान है। लेकिन अगर उनका राज नहीं होता तो क्या एक पुलिस वाले का परिवार गांव से पलायन करने पर मजबूर होता। फिर सबसे चौंका देने वाली बात सरेंडर की होती है। अब तक इतने नक्सलियों ने सरेंडर किया है कि उनकी गिनती असम्भव लगती है। इतने सरेंडर हुए हैं उससे कहीं ज्यादा नक्सली अभी भी बाहर है और जितने सरेंडर होते हैं उससे ज्यादा नक्सली भर्ती कर लेते हैं। तो एक बात समझ नहीं आती यह वन वे ट्रैफिक है टू वे ट्रैफिक है। आखिर नक्सली जब सरेंडर कर ही रहे हैं तो फिर नक्सलियों की संख्या कम होते होते अब तक खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। नक्सलियों की ताकत वैसी की वैसी ही बनी हुई है तो फिर कहीं न कहीं यह सवाल जरूर उठता है कि सरेंडर असली है या नकली? बहरहाल छत्तीसगढ़ की यह तीसरी सरकार पूरी ताकत लगा रही है कि नक्सलियों को रोक सके। उनका सफाया कर सके। लेकिन नक्सली भी पिछली सरकारों के 18 साल के कार्यकाल में जो हरकत करते थे वही हरकत आज भी कर रहे हैं। देखें और कितना जोर मारती है सरकार। देखते हैं और कितना दम दिखाते हैं पुलिस वाले। देखते हैं आखिर कब उनके ही जवान का परिवार गांव से पलायन करने पर मजबूर होता रहेगा। उस पर रोक लगेगी या फिर  सब ठीक ठाक है,कह कर खानापूर्ति कर ली जाएगी।

 

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