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विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष-बच्चे है मां की ममता से दूर, मां घर-घर जाकर कर रही स्वास्थ्य परीक्षण 

राहुल चौबे  | 06 Apr , 2020 04:32 PM
विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष-बच्चे है मां की ममता से दूर, मां घर-घर जाकर कर रही स्वास्थ्य परीक्षण 

रायपुर। कोरोना वायरस के पहले केस के आने के साथ ही अपने घर से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उरला के एक कमरे में शिफ्ट हुई सरिता करियारी ने निजी जिम्मेदारियों के आगे लोगों की सेवा को तरजीह दी। क्वॉरेंटाइन हुए लोगों की देखभाल में लगी सरिता, 25 मार्च को लॉकडाउन वाले दिन ही स्वास्थ्य केंद्र चली गयी। अपनी 5 साल और 3 साल की बेटियों को नानी के घर छोड़ आई ताकि उनकी देखभाल हो सके। घर वालों का और पति का भी खूब साथ मिला। लेकिन 27 मार्च को जब वह एक मरीज़ की जांच कर रही थी तो उसको खबर मिली कि उसकी सासु माँ का देहांत हुआ। ''मेरी सास मेरा आदर्श थी। जिस समय मुझे खबर लगी कि वह अब इस दुनिया में नहीं रही मेरी आंख से आंसू नहीं रुक रहे थे, लेकिन मेरा काम मुझे आगे बढ़ने की सलाह दे रहा था। मैंने उस दुख को लोगों की सेवा से ज्यादा नहीं समझा। अपने फर्ज के लिए मैंने उन सब का नियमित चेकअप किया और काम में लग गयी ।‘’

सरिता का कहना है सास का देहांत हुआ जिसका उसको बहुत दुःख है लेकिन लोगों की सेवा और विपत्ति के समय देश के साथ खड़े होने का मौका कम ही मिलता है। ''जब हम अपने परिवार को छोड़कर लोगों की सेवा में लगे हैं तो लोगों को भी हमारे लिए अपने आप को सुरक्षित रखना होगा तभी हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण कर पाएंगे,’’ सरिता कहती है। स्वास्थ्य जांच के साथ साथ कोरोना वायरस के खतरे से भी लोगों को आगाह करने में लगी है। ससुराल के लोग सरिता के काम को समझते हैं और उन्होंने ही उसे कहा था कि ससुराल आने से बेहतर है प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में ही रहो क्योंकि लोगों को इस समय उसकी ज़्यादा ज़रूरत है ।  

प्रधानमंत्री द्वारा स्वास्थ्य कर्मियों के लिए पचास लाख के स्वास्थ्य बीमा की घोषणा के बारे में सरिता का कहना है यह ज़रूरी है लेकिन पैसों से ज्यादा वह मानव सेवा को महत्व देती है। ''मैं अपने बच्चों को भी इसीलिए नानी के घर रख आई हूं ताकि ज्यादा से ज्यादा समय लोगों की सेवा में दे सकूं। दुख तब होता है जब हम लोगों की मदद के लिए उनके घर 'डोर टू डोर’ कैंपेन के लिए जाते हैं और उनका हमारे प्रति रवैया अच्छा नहीं होता है । हम उनके स्वास्थ्य के लिए जाते हैं ना कि अपने स्वार्थ के लिए। माँ होने के नाते सरिता को बच्चों की भी बहुत याद आती हैं। शाम को जब बच्चों से वह बात करती हैं तो दिन भर की सारी थकान दूर हो जाती है और आने वाले दिन के लिए ऊर्जा भी मिलती है।

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