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आत्महत्या रोकथाम दिवस पर, जिंदगियां सहेजने के लिए फिक्र के साथ जिक्र है जरूरी  : सुरेश 

राहुल चौबे  | 10 Sep , 2020 11:58 AM
आत्महत्या रोकथाम दिवस पर, जिंदगियां सहेजने के लिए फिक्र के साथ जिक्र है जरूरी  : सुरेश 

रायपुर/जशपुर। खुदकुशी इंसान का व्यक्तिगत फैसला भर नहीं है। इसके पीछे उसके आसपास मौजूद विचार व्यवहार का एक पूरा तानाबाना होता है जो जिंदगी की डोर को धागे की तरह उलझा देता है। हर एक मन को बिखरने से बचाने की जागरूकता की आवश्यकता है। आत्महत्या की दर में भी बढ़ोतरी का प्रमुख कारण मानसिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याएं हैं। आत्महत्या करने वाले अनेक संकेत देते हैं परंतु समझ के अभाव में नजर अंदाज हो जाते हैं। यदि लोग व्यवहारिक संकेतों के प्रति सजग रहे तो आत्महत्या को रोक सकते हैं। इस साल वलर्ड सुसाइड प्रीवेंशन डे 10 सितंबर को मनाया जायेगा। आत्महत्या की प्रवृत्ति के खिलाफ सार्थक संवाद जरूरी है। जीवन अनमोल है इसकी फिक्र तो सबको रहती है,पर इसे बचाने के लिए जरूरी बातों का जिक्र नहीं किया जाता, जबकि जीवन का मोल समझना जरूरी है। जिंदगी सहेजने के लिए खुद का मनोबल और परिवेश का संबल जरूरी है।

कहानी है 35 वर्षीय व्यक्ति सुरेश कुमार (बदला हुआ नाम )की जो स्वास्थ्य विभाग द्वारा संचालित कोविड-19 के संबंध में प्रशिक्षण लेने रायपुर गया था। उस दौरान ही व्यक्ति के मन में विचार आने लगा कि भविष्य में उसे सैंपल लेने के लिए ड्यूटी भी लगाई जाएगी। कोविड-19 का संक्रमण उसे भी हो जाएगा। यह विचार उसके मन में लगातार घूमने लगे इस दौरान वह अकेला रहने लगा उसे नींद की अनियमितता होने लगी कोरोना के डर की वजह अत्यधिक घबराहट बेचैनी होने लगना, अचानक से आंखों के सामने अंधेरा छाना, अचानक से दिल की धड़कन बढ़ जाना उसे डराने लगे। उसने बताया लक्षण अत्यंत तेजी से बढ़ने के साथ ही उसे लगने लगा कि वह करोना संक्रमित हो जायेगा तो फिर परिवार के सभी सदस्यों को भी कोरोना हो जाएगा इससे अच्छा कि वह अपनी जान ले। ‘मेरे जीने से मेरे परिवार के जीवन को खतरा है। मेरे जीवन में सब कुछ बुरा हो रहा है, जिसका जिम्मेदार मैं स्वयं हूं।’ आत्महत्या का विचार और भविष्य जुड़ी चिंता, को लेकर उसने जिला अस्पताल के स्पर्श क्लीनिक में संपर्क किया, जहां से मिली राह ने उसके मन को बदल दिया और आज वह पुरी तरह से स्वस्थ है।

सुरेश कुमार (बदला हुआ नाम )का मानना है कि परिस्थितियों को पहचानना जरूरी है । आसपास के लोगों की सहायता और संबल से ऐसी दुखद घटनाओं को डाला जा सकता है परेशान व्यक्ति को समय रहते समझने समझाने की जिम्मेदारी हम सब की है । डॉ के आर खुसरो मनोचिकित्सक स्वास्थ्य विभाग जशपुर ने बताया,” अपनी बहन के साथ लक्षणों के साथ जिला अस्पताल के मनोरोग विभाग में संपर्क किया था व्यक्ति को मानसिक रोग के लक्षणों को कम करने हेतु आवश्यक दवाइयां दी गई साथ ही व्यक्ति को लक्षणों का सामना करते हुए अपने जीवन की गुणवत्ता को बनाए रखने हेतु मनोवैज्ञानिक उपचार चार सत्रों में प्रदान किया गया। उक्त व्यक्ति उपचार के चैथे सत्र में पूरी तरीके से ठीक हो गया आज व्यक्ति में भोजन नींद घबराहट व अन्य लक्षण विद्यमान नहीं है साथ ही अब व्यक्ति के मन में आत्महत्या का विचार भी नहीं आ रहा व्यक्ति अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा है।“

उन्होने बताया, “इन दिनों खुदखुशी के जो भी मामले सामने आ रहे हैं उसमें ज्यादातर लोग ऐसा कदम उठाने से पहले सोशल मीडिया पर अपने दिलो-दिमाग की उलझनों को साझा करते हैं। वह कभी सपने पूरे ना होने की शिकायत करते हैं तो कभी हालातों के प्रति असंतोष जताते हैं ऐसे में उनसे जुड़े लोगों का सतर्क रहना बहुत आवश्यक है ।उनके शब्दों में छिपे इशारों को समझना जरूरी है वर्चुअल हो या असल दुनिया इतनी जागरुकता जरूरी है ।“ कोविड-19 जैसी विषम परिस्थिति ने हर किसी को सुरक्षा भय और चिंता में घेर लिया है अनेक लोगों को वित्तीय संकट ने भी प्रभावित किया है व्यक्ति सामाजिक तौर पर भी अलग-थलग हो गया है कुल मिलाकर लोगों की मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ा है कुछ लोग जिनमें समाधान कौशल बहुत अच्छा है इस संकट का सामना करने में सफल हुए हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में आत्महत्या की दर 26.4प्रति लाख जनसँख्या है जो राष्ट्रीय दर 10.4 प्रति लाख जनसँख्या है। भारत में छत्तीसगढ़ चौथा सबसे ज्यादा आत्महत्याओं वाला प्रदेश है। प्रदेश में इन आंकड़ों में कमी लाने के उद्देश्य से मानसिक स्वास्थ्य पर स्वास्थ्य विभाग द्वारा बल दिया जा रहा है। हर जिले में एक स्पर्श क्लिनिक है जहाँ मानसिक स्वास्स्थ्य की सेवाएं निशुल्क उपलब्ध हैं।

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