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दिल्ली की पुलिस तो फुटबॉल हो गई है, अगर यूनिवर्सिटी में नहीं घुसती तो क्यों नहीं घुसी और घुसी तो क्यों घुसी?

अनिल पुसदकर  | 07 Jan , 2020 11:05 PM
दिल्ली की पुलिस तो फुटबॉल हो गई है, अगर यूनिवर्सिटी में नहीं घुसती तो क्यों नहीं घुसी और घुसी तो क्यों घुसी?

रायपुर। पूरे देश में अगर सब से कोई निरीह प्राणी है तो शायद वह दिल्ली पुलिस है। जो पाए उस पर आरोप मढ़ देता है। केजरीवाल उन्हें केंद्र का एजेंट कहते हैं। तो दिल्ली के छात्र उन्हें नाकारा निकम्मा बताने से पीछे नहीं हटते। हाल ही में दो किस्से हुए। एक जामिया विश्वविद्यालय का और दूसरा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का। दोनों ही मामलों में पुलिस की भूमिका आरोपों में है। जेएनयू में जब छात्रों के दो गुट आपस में भिड़े और जमकर मारपीट हुई तो पुलिस कैंपस के अंदर दाखिल नहीं हुई। और इस बात पर पुलिस पर जमकर आरोप लगे कि पुलिस तमाशा ही बनकर खड़ी रही। उसने एक पक्ष को सपोर्ट किया। और उसने गुंडागर्दी रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इससे ठीक पहले जामिया विश्वविद्यालय में जब विश्वविद्यालय में पुलिस घुस गई थी। और हॉस्टल में घुसकर उसमें उपद्रवियों पर लाठीचार्ज किया था। तब भी उसकी भूमिका पर सवाल उठे थे। तब छात्रसंघो ने और नरेंद्र मोदी सरकार विरोधी लोगों ने पुलिस पर जमकर आरोप लगाए। और कहा कि पुलिस विश्वविद्यालय के अंदर कैसे घुसी? क्यों घुसी? किस अधिकार से घुसी? और जब जेएनयू में छात्र गुट मारपीट पर भिड़े तो पुलिस में विश्वविद्यालय परिसर में जाना जायज नहीं समझा। और वह कैंपस के बाहर खड़ी रही। तब भी उन्हीं लोगों ने फिर सवाल खड़े किए कि पुलिस कैंपस के बाहर क्यों खड़ी रही? कैंपस के अंदर क्यों नहीं घुसी? उसने मारपीट कर रहे लोगों पर नियंत्रण क्यों नहीं पाया? यानी पुलिस अगर कैंपस में घुसे तो क्यों घुसी? और अगर ना घुसे तो क्यों ना घुसी? पुलिस की ऐसी दुर्दशा ऐसी बदहाली ऐसी व्यवस्था किसी और प्रदेश में या किसी और देश में शायद ही देखने को मिले। हम अपनी ही पुलिस पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। जिसके दम पर हम रात को चैन से शहरों में सोते हैं। 

 

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