GLIBS

हाथरस के सामूहिक दुष्कर्म मामले की मॉनिटरिंग करे इलाहाबाद हाईकोर्ट : सुप्रीम कोर्ट

ग्लिब्स टीम  | 15 Oct , 2020 05:55 PM
हाथरस के सामूहिक दुष्कर्म मामले की मॉनिटरिंग करे इलाहाबाद हाईकोर्ट : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि एक दलित युवती के साथ कथित गैंगरेप और बर्बरता के चलते हुई उसकी मौत को लेकर हाथरस केस की इलाहाबाद हाईकोर्ट को मॉनिटर करने की इजाजत दी जाती है। एक जनहित याचिका और वकीलों और कार्यकर्ताओं की तरफ से दायर कई याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत को यह कहा गया कि उत्तर प्रदेश में निष्पक्ष ट्रायल संभव नहीं है क्योंकि कथित तौर पर जांच को भटका दिया गया है।
मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस आशंका को खारिज करते हुए कहा,"उच्च न्यायालय को इससे निपटने देना चाहिए। यदि कोई समस्या है तो हम यहां हैं।" सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अलावा सुनवाई के दौरान हरीश साल्वे, इंदिरा जयसिंह और सिद्धार्थ लूथरा जैसे वकील कई पक्षों की तरफ से पेश हुए थे। कोई वकील इसके विरोध में बहस नहीं करना चाहते थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा- "हमें पूरी दुनिया की सहायता की जरूरत नहीं है।" सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि किसी भी मामले में पीड़ित की पहचान का खुलासा नहीं किया जाता है और उसके परिवार के सदस्यों और गवाहों को पूरी सुरक्षा और सुरक्षा दी जाती है।

पीड़ित परिवार की तरफ से पेश हुए वकील ने हाथरस केस को उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय राजधानी में ट्रांसफर किए जाने की मांग की। कार्यकर्ता और वकील इंदिरा जयसिंह ने राज्य में निष्पक्ष ट्रायल होने पर शंका जताते हुए गवाहों की सुरक्षा को लेकर दलीलें दी। शुरुआत में, सॉलिसिटर जनरल ने हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर हलफनामे का उल्लेख किया,जिसमें मामले में पीड़ित परिवार और गवाहों को प्रदान की गई सुरक्षा और सुरक्षा के बारे में विवरण दिया गया था। राज्य सरकार जिसने पहले ही केस सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया है और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच को सहमति दे दी है, उसने सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गवाहों की सुरक्षा और पीड़ित के परिवार को वकील दिए जाने के बारे में मांगे गए ब्यौरे पर हलफनामा दायर किया था। अनुपालन हलफनामे का उल्लेख करते हुए तुषार मेहता ने कहा कि पीड़ित के परिवार ने सूचित किया है कि उन्होंने वकील रख ली है और उन्होंने यह भी अनुरोध किया है कि सरकारी वकील को भी उनकी तरफ से इस मामले को देखना चाहिए।

 

Author/Journalist owns and is responsible for views/news published and the publisher/printer is in no way liable for such content.