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मजाक के लिए हिन्दू देवीदेवता ही क्यों? क्या अंधविश्वास अन्य धर्मों में नहीं है? ये कमाई का विवाद है या साजिश?

अनिल पुसदकर  | 20 Jan , 2021 11:30 AM
मजाक के लिए हिन्दू देवीदेवता ही क्यों? क्या अंधविश्वास अन्य धर्मों में नहीं है? ये कमाई का विवाद है या साजिश?

रायपुर। देश फिर जाने अनजाने तनाव के एक दौर से गुजर रहा है। यह तनाव बाहरी नहीं है बल्कि अंदरूनी है और ये बेवजह दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। तनाव पैदा हुआ तांडव से। तांडव एक वेब सीरीज जिसे डायरेक्ट किया अली अब्बास ने और दुर्भाग्य से इस कथित पॉलीटिकल वेब सीरीज में रिलीजियस डायलॉग्स और सीन भी ठूस दिए गए हैं। कॉमेडी और कमाई के नाम पर इस तरह का हेटेरोजेनियस मिक्सचर देश में एक बड़ा हिस्सा पचा नहीं पा रहा है और वह इसके विरोध में उतर आया है। उनके सवाल भी वाजिब है। क्या कॉमेडी और कमाई के नाम पर सिर्फ हिंदू देवी देवताओं को ही कैरेक्टर बनाया जा सकता है? क्या अंधविश्वास के नाम पर रूढ़िवाद तोड़ने के नाम पर सिर्फ हिंदू धर्म ही टारगेट पर लिया जा सकता है? क्या अंधविश्वास अन्य किसी धर्म मैं नहीं है? क्या रूढ़ियां अन्य किसी धर्म में नहीं है? क्या मजाक उड़ाने के लिए सिर्फ हिंदू देवी देवताओं को ही कैरेक्टर बनाया जाना चाहिए? क्या ऐसे कैरेक्टर दूसरे धर्मों में नहीं है? यह सारे सवाल काफी समय से देश को सोचने पर मजबूर करते आ रहे हैं सताते आ रहे हैं और दहलाते भी आ रहे हैं। काफी समय से इस बेहद जहरीले मुद्दे को यूं ही छोड़ा जा रहा है। इसका ठोस हल निकालने की बजाए इसे पॉलिटिकल इश्यू बना कर छोड़ दिया जा रहा है। सौभाग्य से अभी तक कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ है लेकिन तांडव से फिर एक बार तांडव होने की आशंका बन गई है। जो अब यह कह रही है कि पानी सर से गुजर रहा है। ऐसी प्रवृत्ति पर अंकुश लगना बहुत जरूरी है। अगर यह सब कमाई का मामला है तो कमाई के लिए बहुत सारे अनछुए टॉपिक इस देश में बिखरे पड़े हुए हैं और अगर यह कमाई का मामला नहीं है तो फिर यह जाने-अनजाने देश को अस्थिरता की ओर धकेलने की साजिश है। इसकी जांच भी होनी चाहिए और उस पर अंकुश भी लगना चाहिए और दोषी को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

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