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नरमदिल और काम के प्रति समर्पित थे पृथ्वीराज

नरमदिल और काम के प्रति समर्पित थे पृथ्वीराज

 

मुंबई। अपनी कड़क आवाज, रौबदार भाव भंगिमाओं और दमदार अभिनय के बल पर लगभग चार दशकों तक सिने प्रेमियों के दिलो पर राज करने वाले भारतीय सिनेमा के युगपुरूष पृथ्वीराज कपूर निजी काम के प्रति समर्पित और नरम दिल वाले इंसान थे।फिल्म इंडस्ट्री में पापा जी के नाम से मशहूर पृथ्वीराज अपने थियेटर के तीन घंटे के शो के समाप्त होने के पश्चात गेट पर एक झोली लेकर खड़े हो जाते थे ताकि शो देखकर बाहर निकलने वाले लोग झोली में कुछ पैसे डाल सके। इन पैंसो के जरिये पृथ्वीराज कपूर ने एक वर्कर फंड बनाया था जिसके जरिये वह पृथ्वी थियेटर में काम कर रहे सहयोगियों को जरूरत के समय मदद किया करते थे ।

पृथ्वीराज कपूर अपने काम के प्रति बेहद समर्पित थे। एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें विदेश में जा रहे सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल में शामिल करने की पेशकश की लेकिन पृथ्वीराज कपूर ने नेहरू जी से यह कह उनकी पेशकश नामंजूर कर दी कि वह थियेटर के काम को छोड़कर वह विदेश नहीं जा सकते। पश्चिमी पंजाब के लायलपुर (वर्तमान में पाकिस्तान) में 03 नवंबर 1906 को जन्में पृथ्वीराज कपूर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लयालपुर और लाहौर में पूरी की। उनके पिता दीवान बशेस्वरनाथ कपूर पुलिस उपनिरीक्षक थेबाद में उनके पिता का तबादला पेशावर में हो गया। उन्होंने आगे की पढ़ाई पेशावर के एडवर्ड कॉलेज से की। उन्होंने कानून की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। क्योकि उस समय तक उनका रूझान थियेटर की ओर हो गया था। महज 18 वर्ष की उम्र में ही उनका विवाह हो गया। वर्ष 1928 में अपनी चाची से आर्थिक सहायता लेकर पृथ्वीराज कपूर अपने सपनों के शहर मुंबई पहुंचे।

पृथ्वीराज कपूर ने अपने करियर की शुरूआत 1928 में मुंबई में इंपीरियल फिल्म कंपनी से जुड़कर की। वर्ष 1930 में बी पी मिश्रा की फिल्म ‘सिनेमा गर्ल’ में उन्होंने अभिनय किया। कुछ समय पश्चात एंडरसन की थियेटर कंपनी के नाटक शेक्सपियर में भी उन्होंने अभिनय किया। लगभग दो वर्ष तक फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करने के बाद उनको वर्ष 1931 में प्रदर्शित पहली सवाक फिल्म आलमआरा में सहायक अभिनेता के रूप में काम करने का मौका मिला। वर्ष 1933 में वह कोलकाता के मशहूर न्यू थियेटर के साथ जुड़े। वर्ष 1933 में प्रदर्शित फिल्म ‘राजरानी’ और वर्ष 1934 में देवकी बोस की फिल्म ‘सीता’ की कामयाबी के बाद बतौर अभिनेता पृथ्वीराज कपूर अपनी पहचान बनाने में सफल हो गये। इसके बाद उन्होंने न्यू थियेटर की निर्मित कई फिल्मों में अभिनय किया। इन फिल्मों में मंजिल, प्रेसिडेंट जैसी फिल्में शामिल है। वर्ष 1937 में प्रदर्शित फिल्म विधापति में पृथ्वीराज कपूर के अभिनय को दर्शकों ने काफी सराहा।

वर्ष 1938 में चंदूलाल शाह के रंजीत मूवीटोन के लिये पृथ्वीराज कपूर अनुबंधित किये गये। रंजीत मूवी के बैनर तले वर्ष 1940 मे प्रदर्शित फिल्म ‘पागल’ में पृथ्वीराज कपूर ने अपने सिने कैरियर में पहली बार एंटी हीरो की भूमिका निभायी। वर्ष 1941 में सोहराब मोदी की फिल्म ‘सिकंदर’ की सफलता के बाद वह कामयाबी के शिखर पर जा पहुंचे। वर्ष 1944 में पृथ्वीराज कपूर ने अपनी खुद की थियेटर कंपनी ‘पृथ्वी थियेटर’ शुरू की। पृथ्वी थियेटर में उन्होंने आधुनिक और शहरी विचारधारा का इस्तेमाल किया जो उस समय के फारसी और परंपरागत थियेटरों से काफी अलग था। धीरे धीरे दर्शकों का ध्यान थियेटर की ओर से हट गया क्योकि उन दिनों दर्शकों पर रूपहले पर्दे का क्रेज ज्यादा ही हावी था।

सोलह वर्ष में पृथ्वी थियेटर के 2662 शो हुये जिनमें पृथ्वीराज कपूर ने लगभग सभी में मुख्य किरदार निभाया। पृथ्वी थियेटर के प्रति वह इस कदर समर्पित थे कि तबीयत खराब होने के बावजूद भी वह हर शो में हिस्सा लिया करते थे। शो एक दिन के अंतराल पर नियमित रूप से होता था। पृथ्वी थियेटर के बहुचर्चित नाटकों में दीवार, पठान गद्दार और पैंसा शामिल है। पृथ्वीराज कपूर ने अपने थियेटर के जरिए कई छुपी प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका दिया। जिनमें रामानंद सागर और शंकर जयकिशन जैसे बड़े नाम शामिल है।

साठ का दशक आते आते पृथ्वीराज कपूर ने फिल्मों में काम करना काफी कम कर दिया। वर्ष 1960 में प्रदर्शित के. आसिफ की मुगले आजम में उनके सामने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे। इसके बावजूद पृथ्वीराज कपूर अपने
दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फिल्म ‘आसमान महल’ में पृथ्वीराज कपूर ने अपने सिने करियर की एक और न भूलने वाली भूमिका निभायी। वर्ष 1968 में प्रदर्शित फिल्म तीन बहुरानियां में पृथ्वीराज कपूर ने परिवार के मुखिया की भूमिका निभायी जो अपनी बहुरानियों को सच्चाई की राह पर चलने के लिये प्रेरित करता है। इसके साथ ही अपने पौत्र रणधीर कपूर की फिल्म ‘कल आज और कल’ में भी पृथ्वीराज कपूर ने यादगार भूमिका निभायी। वर्ष 1969 में पृथ्वीराज कपूर ने एक पंजाबी फिल्म ‘नानक नाम जहां है’ में भी अभिनय किया। फिल्म की सफलता ने लगभग गुमनामी में आ चुके पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री को एक नया जीवन दिया। फिल्म इंडस्ट्री में उनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुये उन्हें 1969 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। फिल्म इंडस्ट्री के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के से भी उन्हें सम्मानित किया गया। इस महान अभिनेता ने 29 मई 1972 को दुनिया को अलविदा कह दिया।

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