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वसीयतें अपने नाम लिखवा लेने से कुछ नहीं होता

वसीयतें अपने नाम लिखवा लेने से कुछ नहीं होता

छत्तीसगढ़ करीब 10 माह से कार्यवाहक राज्यपाल के भरोसे चल रहा है। अगला राज्यपाल कोई राजनेता होगा या राजनेता, होगा इसको लेकर कयास लगाये जा रहे हैं। हालांकि चर्चा में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा ताई महाजन, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज आदि का नाम भी चर्चा में है पर सूत्र बताते हैं कि छग में कांग्रेस की सरकार भारी बहुमत से बनने तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण किसी पूर्व नौकरशाह को यहां की जिम्मेदारी दी जा सकती है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहले राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय थे। तो बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक थे, दूसरे राज्यपाल लेफ्टिनेट जनरल (सेवानिवृत्त) के.एम.सेठ थे जो सेना में पदस्थ रहे थे। तीसरे राज्यपाल ई.एस.एल. नरसिम्हन थे जो राज्यपाल बनने के पहले इंटेलिजेन्स ब्यूरो (आईबी) के प्रमुख रह चुके थे। वे 1968 बैच के आईपीएस थे। बाद में शेखर दत्त राज्यपाल बनाये गये जो थल सेना में पदस्थ रहे बाद में म.प्र. काडर के 1969 बैच के आईएएस थे। वे अविभाजित म.प्र. के समय रायपुर संभाग के कमिश्नर रह चुके थे। दरअसल नरसिम्हन आंध्रप्रदेश के राज्यपाल बनने उत्सुक नहीं थे पर पीएमओ के दखल के चलते उन्हें हटना पड़ा। शेखर दत्त उस समय पीएमओ के शक्तिशाली नौकरशाह पुलक भट्टाचार्य के करीबी रिश्तेदार थे। खैर नरसिम्हन छग से गये और वर्तमान में आंध्र तथा तेलंगाना के राज्यपाल की संयुक्त जिम्मेदारी सम्हाल रहे हैं।

बहरहाल केन्द्र में सरकार बदली और 2014 में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी जाहिर है कि कांग्रेस समर्थक राज्यपालों को बदलना था। छग के पांचवे राज्यपाल शेखर दत्त ने 23 जनवरी 2010 को कार्यभार सम्हाला था। जनवरी 2015 में उनका कार्यकाल पूरा होता पर अपना कार्यकाल पूरा होने के 7 माह पूर्व ही शेखर दत्त ने इस्तीफा दे दिया। (कारण जो भी हो) उसके बाद पंजाब के एक बड़े राजनेता रहे बलराम दास टंडन को छग का राज्यपाल बनाया गया वे भारत की आजादी, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बंटवारे के गवाह थे तथा जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में एक रहे। 14 अगस्त 2018 को उनका निधन हो गया और 15 अगस्त 2018 को गुजरात की मुख्यमंत्री रही तथा म.प्र. की राज्यपाल आनंदी बेन को अस्थायी रूप से छग के भी राज्यपाल की जिम्मेदारी दी गई उसके बाद से वे ही म.प्र. और छग में कार्य देख रही है। देश में फिर मोदी की सरकार बन चुकी है और उम्मीद की जा रही है कि कोई स्थायी राज्यपाल छग में नियुक्त 15 अगस्त के पहले हो सकता है। बहरहाल छग में स्थायी राज्यपाल कोई राजनेता होगा या नौकरशाह इसका फैसला तो केन्द्र ही लेगा।

सीएम, गर्वनर, सीएस के बाद अब गायक कलेक्टर ....

छत्तीसगढ़ शासन ने 2006 बैच के आईएएस एस भारती दासन को राजधानी रायपुर का कलेक्टर बनाया है। छग की राजधानी रायपुर का कलेक्टर बनना बड़ी चुनौती तथा जिम्मेदारी का काम होता है। पहले ही छग राज्य बनने के पहले ही इंदौर, भोपाल के बाद रायपुर को विशेष महत्व मिलता था और यहां वरिष्ठ आईएएस अफसरों को बतौर कलेक्टर नियुक्त किया जाता था पर छग राज्य बनने के बाद डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल में वरिष्ठता का ध्यान कम रखा गया था। वैसे भारती दासन वरिष्ठ अफसर है उनकी नियुक्ति तो पूर्व कलेक्टर को हटाने के साथ ही हो जानी थी पर चुनाव आयोग में संलग्न होने के कारण उनकी नई नियुक्ति के लिए केन्द्रीय चुनाव आयोग से अनुमति लेकर ही उनकी नियुक्ति की गई। वैसे नये कलेक्टर एस.भारती दासन ने कार्यभार सम्हाल लिया है। सख्त अफसर, युवा अफसर के साथ ही उन्हें गायक अफसर भी माना जाता है।

यू-ट्यूब तथा फेसबुक में उनके तमिल तथा हिन्दी में गाये गये गीत सुने जा सकते हैं। वैसे कहा जाता है कि जो गायक होता है वह संवेदनशील भी होता है। वैसे रायपुर में पदस्थ कलेक्टरों का राज्यपाल, मुख्य सचिव आदि बनने का भी रिकार्ड है। रायपुर में देश के प्रसिद्ध आईएएस अफसर डीजी भावे (65-67) रहे तो अजीत जोगी, पूर्व मुख्यमंत्री छग (78-81) नजीब जंग, पूर्व राज्यपाल दिल्ली (81-83) सुनील कुमार पूर्व मुख्य सचिव छग (87-88) एम.के. राऊत, मुख्य सूचना आयुक्त (98-2000), सी.के. खेतान ( अप्रैल 3 से सितंबर 3), आर.पी. मंडल एसीएस (2004-2005), अमिताभ जैन एसीएस (2000-2003, दूसरी बार कुछ महीने 2004 में)भी पदस्थ रहे। हां ठाकुर राम सिंह की सेवानिवृत्ति के बाद ओ.पी. चौधरी अप्रैल 16 में कलेक्टर बने और उन्होंने 25 अगस्त 18 को अपनी नौकरी से इस्तीफा देकर भाजपा की सदस्यता ले ली वहीं उसके बाद डॉ. वसई राजू कलेक्टर 28 अगस्त 18 को बेमन से कलेक्टर बने क्योंकि उन्हें अपने मूल राज्य में लौटना था पर विधानसभा-लोकसभा चुनाव उन्हें चुनाव आयोग के निर्देश पर कराना था। बहरहाल भारती दासन पर राजधानी रायपुर में कलेक्टरी करना बड़ी चुनौती तो है ही....।

नंदीराज पर्वत का सच....

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल क्षेत्र के तहत बैलाडिला की एक पहाड़ी को बचाने के लिए करीब 20 हजार से अधिक आदिवासी स्वस्फूर्त एकत्रित हो गये थे, सरकार ने इस पहाड़ी को लौहअयस्क के खनन के लिए अडाणी समूह को दे दिया था। राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) ने बैलाडिला की एक पहाड़ी 'डिपाजिट 13 नंबरÓ को अडाणी समूह को उत्खनन के लिए लीज में दे दिया था। हालांकि इस मामले में छत्तीसगढ़ सरकार के मुखिया भूपेश बघेल ने हस्तक्षेप कर इस मामले को पूर्व की डॉ. रमन सरकार पर डाल दिया है पर इस मामले में तत्कालीन कलेक्टर तथा भाजपा में शामिल होकर विधानसभा चुनाव में पराजित होने वाले ओ.पी. चौधरी का नाम भी फिर चर्चा में है। ग्रामसभा की वैध अनुमति के बिना ही उन पर यह कार्यवाही का आरोप है।मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने डिपाजिट 13 के मामले में अवैध वन कटाई पर रोक लगाने, अवैध वन कटाई तथा 2014 में हुए फर्जी ग्रामसभा के खनन प्रस्ताव करने की जांच कराने सहित परियोजना से संबंधित कार्यों पर रोक लगाने के निर्देश दिये हैं।

बैलाडिला डिपाजिट 13 नंबर पहाड़ को नंदराज पर्वत कहा जाता है। आदिवासियों की मानें तो यह देवस्थान है। नंदराज पहाड़ और उसके सामने का पिटौड़ मेटा देवी का पहाड़ मानाजाता है जो पूज्यनीय है। बताया जाता है कि डिपाजिट-13 पहाड़ में 315.813 हेक्टेयर रकबे में अनुमानित 326 मिट्रिक टन लौह अयस्क का पता सर्वे में चला है। पूर्ववर्ती छग सरकार (डॉ. रमन), केन्द्र सरकार (मोदी सरकार) के बीच हुए करार के तहत संयुक्त उपक्रम एनसीएल का गठन किया गया था। लेकिन इसके बाद यह लीज निजी कंपनी अडाणी इंटरप्राइजेस लिमिटेड को 25 साल के लिए स्थानांतरित कर दी गई। अडाणी समूह ने सितंबर 2018 को बैलाडिला आयरन और माइनिंग प्राईवेट लिमिटेड यानी 'बी आईओ एसपीएलÓ नाम की कंपनी बनाई और दिसंबर 2018 को केन्द्र सरकार ने इस कंपनी को बैलाडिला में खनन की अनुमति देकर 25 साल की लीज दे दी। वन विभाग ने 2015 में पर्यावरण क्लीयरेंस दिया था।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 (1) के अनुसार संपूर्ण बस्तर संभाग पांचवी अनुसूचि में शामिल है। इस पर पंचायती राज अधिनियम 1996 लागू होता है। इसके अनुसार ग्रामसभा की अनुमति के बिना एक इंच जमीन भी केन्द्र या राज्य सरकार को नहीं दिया जा सकता है लेकिन फर्जी ग्रामसभा कर जमीनों का अधिग्रहण किया गया। ग्राम पंचायत हिरौली (जिसके तहत डिपाजिट 13 नबंर पहाड़ आता है।) की सरपंच बुधारी के अनुसार 2014 में एक फर्जी ग्रामसभा की बैठक कर खुदाई की अनुमति दे दी गई। असल में वह बैठक हुई ही नहीं, मात्र 104 लोगों की मौजूदगी बताकर प्रस्ताव पारित करने की बात की जा रही है। प्रस्ताव में कई ग्रामीणों के हस्ताक्षर है जबकि यह क्षेत्र निरक्षर है ऐसे में अंगूठे की जगह ग्रामीणों का हस्ताक्षर भी फर्जी है। ज्ञात रहे कि उस समय दंतेवाड़ा के कलेक्टर ओ.पी. चौधरी थे। हालांकि इस मामले की किरंदुल थाने में शिकायत भी की गई है जिसमें तत्कालीन कलेक्टर, एन.एम.डी.सी. के सीएमडी के खिलाफ फर्जीवाड़ा का मामला दर्ज करने की मांग की गई है। कुल मिलाकर पहले ही दंतेवाड़ा में आदिवासियों की जमीन के मामले में चर्चा में आये पूर्व कलेक्टर ओ.पी.चौधरी इस ग्रामसभा के मामले में भी परेशानी में आ सकते हैं।

और अब बस....

0 छत्तीसगढ़ में कुछ पुलिस महानिरीक्षकों के भी कार्यभार बदलने के संकेत मिल रहे हैं।
0 नान घोटाले मामले में एक आईएएस आरोपी का हाल ही में प्रदेश के मुखिया से बंगले में मुलाकात करना चर्चा में है।
0 भाजपा की सरकार में शुरू स्काईवॉक योजना कांग्रेस सरकार के लिए गले की हड्डी बन गई है।
0 मंत्रालय में कुछ प्रमुख सचिव- सचिव के भी कार्यभार बदले जाने की संभावना है।